सुप्रीम कोर्ट ने कहा – “कोई नहीं मानता कि यह पायलट की गलती थी” : अहमदाबाद विमान दुर्घटना मामले में पिता की याचिका पर केंद्र व DGCA को नोटिस
🔷 प्रस्तावना
भारतीय न्यायपालिका ने एक बार फिर यह सिद्ध किया है कि वह केवल कानून की व्याख्या करने वाली संस्था नहीं, बल्कि न्याय की आत्मा को भी जीवित रखने वाली शक्ति है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने अहमदाबाद में हुई एयर इंडिया बोइंग 787-8 ड्रीमलाइनर विमान दुर्घटना के मामले में सुनवाई करते हुए एक अत्यंत संवेदनशील टिप्पणी की — “कोई भी इस देश में यह नहीं मानता कि यह पायलट की गलती थी।”
यह टिप्पणी अदालत ने उस समय की जब दिवंगत पायलट कैप्टन सुमीत सभरवाल के 91 वर्षीय पिता पुष्कर सभरवाल ने अपने बेटे के सम्मान और सच्चाई की खोज के लिए स्वतंत्र जांच की मांग करते हुए याचिका दायर की थी।
🔷 मामला क्या है?
अहमदाबाद विमान दुर्घटना का मामला उस त्रासदी से जुड़ा है जिसमें एयर इंडिया के बोइंग 787-8 ड्रीमलाइनर विमान के पायलट-इन-कमांड कैप्टन सुमीत सभरवाल की जान चली गई थी। यह दुर्घटना कई प्रश्नों को जन्म देती है — क्या तकनीकी खराबी थी, क्या संचालन में कोई त्रुटि हुई, या फिर सिस्टम फेल्योर इसका कारण था?
कैप्टन सुमीत सभरवाल के पिता, पुष्कर सभरवाल, जो स्वयं 91 वर्ष के वृद्ध व्यक्ति हैं, ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। उन्होंने आग्रह किया है कि इस दुर्घटना की स्वतंत्र और तकनीकी रूप से सही जांच कराई जाए, जिसकी निगरानी सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा की जाए।
🔷 सुप्रीम कोर्ट की भावनात्मक टिप्पणी
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची की पीठ ने अत्यंत संवेदनशील रुख अपनाया। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा –
“यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी, लेकिन आपको (पिता को) यह बोझ नहीं उठाना चाहिए कि आपके बेटे की गलती थी। किसी भी परिस्थिति में कोई भी यह नहीं कह सकता कि दुर्घटना के लिए पायलट जिम्मेदार था।”
न्यायमूर्ति बागची ने भी इस बात को स्पष्ट किया कि जांच रिपोर्ट में किसी भी पायलट पर कोई आरोप नहीं लगाया गया है। उन्होंने कहा –
“अभी तक किसी के खिलाफ कोई चार्ज नहीं है। रिपोर्ट में केवल दोनों पायलटों के बीच हुई बातचीत का उल्लेख है, किसी को दोषी नहीं ठहराया गया है।”
🔷 याचिकाकर्ता का पक्ष
याचिकाकर्ता के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि वर्तमान जांच विमान दुर्घटना और घटनाओं की जांच नियम, 2012 (Aircraft (Investigation of Accidents and Incidents) Rules) के नियम 9 के तहत केवल प्रारंभिक जांच (preliminary investigation) है।
जबकि वास्तविक, निष्पक्ष और पूर्ण जांच नियम 11 के तहत आवश्यक है, जिसमें विशेषज्ञों की भागीदारी और स्वतंत्र निगरानी होती है।
उन्होंने आगे कहा कि वॉल स्ट्रीट जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट में अज्ञात भारतीय सूत्रों के हवाले से यह कहा गया कि दुर्घटना पायलट की गलती से हुई। यह रिपोर्ट न केवल भ्रामक थी बल्कि पायलट की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाली भी थी।
🔷 न्यायालय की प्रतिक्रिया
इस पर न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की –
“तो आपका मामला वॉल स्ट्रीट जर्नल के खिलाफ होना चाहिए था। प्रेस में लगाए गए आरोपों का समाधान रिट याचिका के माध्यम से नहीं किया जा सकता। उसके लिए एक अलग विधिक मार्ग है।”
हालांकि अदालत ने इस बात को भी रेखांकित किया कि जब तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जाता, किसी मृत पायलट की गरिमा और सम्मान को बनाए रखना न्याय का मूल सिद्धांत है।
🔷 सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) और अन्य संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए मामले की गहन जांच आवश्यक है ताकि किसी निर्दोष व्यक्ति पर गलत आरोप न लगे।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने दोहराया –
“जो भी इस त्रासदी का कारण रहा हो, लेकिन यह निश्चित है कि पायलट इसका कारण नहीं था।”
🔷 पिता का दर्द और न्याय की उम्मीद
91 वर्षीय पुष्कर सभरवाल का यह संघर्ष केवल अपने बेटे की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाने के लिए भी है, जो कई बार दुर्घटनाओं के बाद पायलट को ‘बलि का बकरा’ बना देती है।
उनका कहना है कि जांच तकनीकी रूप से दोषपूर्ण और अधूरी है तथा इसमें स्वतंत्रता का अभाव है।
उनका निवेदन है कि यदि इस तरह की दुर्घटनाओं की निष्पक्ष जांच नहीं होगी, तो भविष्य में भी सच्चाई छिपाई जा सकती है और निर्दोषों पर आरोप लगाए जा सकते हैं।
🔷 न्यायपालिका की संवेदनशीलता
सुनवाई के दौरान दोनों न्यायाधीशों की टिप्पणियों से यह स्पष्ट था कि अदालत केवल कानूनी पक्ष नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी मामले को देख रही है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत का यह कहना कि “आपको यह बोझ नहीं उठाना चाहिए कि आपके बेटे की गलती थी” केवल एक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक पिता के दर्द के प्रति न्यायालय की सहानुभूति का प्रतीक है।
इस प्रकार के निर्णय यह दर्शाते हैं कि भारतीय न्यायपालिका तकनीकी जांच के साथ-साथ मानवीय गरिमा और नैतिक न्याय को भी समान महत्व देती है।
🔷 दुर्घटनाओं की जांच की कानूनी प्रक्रिया
विमान दुर्घटनाओं की जांच Aircraft (Investigation of Accidents and Incidents) Rules, 2012 के अंतर्गत की जाती है।
- Rule 9 के तहत प्रारंभिक जांच (Preliminary Investigation) होती है, जो केवल घटनाओं की प्रारंभिक जानकारी तक सीमित रहती है।
- Rule 11 के तहत पूर्ण और स्वतंत्र जांच (Formal Investigation) होती है, जिसे विशेषज्ञ समिति के माध्यम से किया जाता है।
- यह जांच अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप (ICAO Guidelines) होनी चाहिए, ताकि रिपोर्ट निष्पक्ष और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणिक हो।
याचिकाकर्ता का दावा है कि DGCA ने केवल प्रारंभिक जांच की, जबकि इस दुर्घटना की गंभीरता को देखते हुए Rule 11 के तहत formal investigation आवश्यक थी।
🔷 मीडिया रिपोर्टिंग और न्यायिक मर्यादा
इस मामले ने यह भी प्रश्न उठाया कि मीडिया रिपोर्टिंग किस सीमा तक किसी मृत व्यक्ति की प्रतिष्ठा को प्रभावित कर सकती है।
वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता ने कहा कि “अनाम स्रोतों” के आधार पर यह बताना कि पायलट दोषी था, पत्रकारीय आचार संहिता का उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता अपने स्थान पर है, लेकिन जब रिपोर्टिंग किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा या न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करती है, तो न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक हो सकता है।
🔷 आगे की प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 10 नवंबर के लिए तय की है।
इस दौरान केंद्र सरकार और DGCA को अपने जवाब दाखिल करने होंगे, जिसमें यह स्पष्ट करना होगा कि अब तक जांच की क्या स्थिति है और क्या किसी स्वतंत्र समिति के गठन की आवश्यकता है।
🔷 निष्कर्ष
अहमदाबाद विमान दुर्घटना पर सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई केवल एक तकनीकी या कानूनी मामला नहीं है, बल्कि यह सत्य, सम्मान और न्याय के संघर्ष का प्रतीक बन चुकी है।
न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि जब तक किसी ठोस साक्ष्य के आधार पर दोष सिद्ध न हो, तब तक किसी भी पायलट को दोषी ठहराना न केवल अन्याय है, बल्कि मानवीय गरिमा के विरुद्ध भी है।
यह निर्णय भविष्य में विमान दुर्घटनाओं की जांच के लिए एक नया मानक (precedent) स्थापित करेगा — जिसमें केवल तकनीकी तथ्यों पर नहीं, बल्कि निष्पक्षता, पारदर्शिता और गरिमा के सिद्धांतों पर भी बल दिया जाएगा।