“तहसीलदार और थानेदार की उदासीनता पर Supreme Court of India ने कसा शिकंजा: Akola दंगों मामले में हिंदू-मुस्लिम अधिकारियों से बने SIT पर विभाजित राय”
प्रस्तावना
महाराष्ट्र के Akola में मई 2023 में हुई सांप्रदायिक हिंसा के संदर्भ में न्यायपालिका ने एक विशिष्ट दृष्टिकोण अपनाया है। जहां एक ओर अदालत ने पुलिस की “पूरी तरह से कर्तव्य-उपेक्षा” (dereliction of duty) पर कठोर टिप्पणी की है, वहीं दूसरी ओर उसने एक करवाही भी निर्देशित की है — एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन, जिसमें हिंदू तथा मुस्लिम समुदायों के वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल करने का निर्देश है।
हालाँकि, इस फैसले पर न्यायमूर्ति दो-राय वाले विभाजन का स्वरूप भी देखने को मिला है – समीक्षा याचिका पर सुनवाई के दौरान दोनों न्यायाधीशों ने इस निर्देश के संबंध में अलग-अलग मत प्रस्तुत किए।
इस आलेख में हम पूरे घटनाक्रम, संदर्भ, कानूनी पहलुओं, न्यायपालिका के विचार-विमर्श, विभाजन-राय की पृष्ठभूमि, और इससे जुड़ी चुनौतियों तथा संभावित प्रभावों पर विस्तृत रूप से चर्चा करेंगे।
पृष्ठभूमि – हिंसा की घटना और शिकायत
- मई 2023 में, Akola के पुराने शहर क्षेत्र में एक सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर सांप्रदायिक टकराव हुआ था। घटना में एक पुरुष की हत्या हुई और कई वाहन क्षतिग्रस्त हुए।
- मृतक का नाम Vilas Mahadevrao Gaikwad था और वह ऑटो-रिक्शा चला रहे थे। आरोप है कि उनसे यह रुख़ा गया कि वे मुस्लिम समुदाय से संबंध रखते हैं, जिसके कारण हमला हुआ।
- साथ ही, Mohammad Afzal Mohammad Sharif नामक 17 वर्षीय युवक ने दावा किया कि उसने इस हमले का साक्षीत्व किया था और उसके वाहन को भी आग लगा दी गई। उसकी अस्पताल में भर्ती के बाद पुलिस ने समयानुसार एफआईआर दर्ज नहीं की।
- पुलिस द्वारा निरीक्षण के अभावी रवैए ने न्यायपालिका को सक्रिय होने पर मजबूर किया। यह मामला जिस तरह से सामने आया, उसने कानून प्रवर्तन तंत्र की निष्पक्षता व जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न खड़ा किया।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश – SIT गठन एवं पुलिस पर टिप्पणी
- 11 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश दिया, जिसमें राज्य सरकार को निर्देश मिला कि वे गृह विभाग के माध्यम से एक विशेष जांच दल (SIT) गठित करें। यह दल वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का होगा, जिसमें हिंदू और मुस्लिम समुदायों दोनों के अधिकारी शामिल होंगे।
- अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि पुलिस बल में कम-से-कम इतना भरोसा होना चाहिए कि वे अपनी व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों, चाहे वो धर्म-भेद, जाति-भेद अथवा अन्य किसी प्रकार का हो, को त्याग कर कानून के प्रति समर्पित हों।
- साथ ही, शीर्ष न्यायालय ने कहा: “जब कोई पुलिस यूनिफॉर्म धारण करता है, उस समय उसे व्यक्तिगत रुझानों व पूर्वाग्रहों को पीछे छोड़ना अनिवार्य है।”
- पुलिस द्वारा तत्काल कार्रवाई नहीं करने, बयान दर्ज न करने और एफआईआर न लिखने जैसी लापरवाहियों को “पूरी तरह से कर्तव्य-उपेक्षा” कहा गया।
- SIT को तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया।
- इसके अतिरिक्त, पुलिस उच्चाधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने तथा पुलिस बल के सदस्यों को धर्म-विभेद, जात-भेद या अन्य पूर्वाग्रहों के प्रति संवेदनशील बनाने हेतु प्रशिक्षण आयोजित करने का निर्देश भी दिया गया।
समीक्षा याचिका और विभाजित राय
- उक्त आदेश के बाद राज्य महाराष्ट्र ने इस गठन के निर्देश के विरुद्ध एक समीक्षा याचिका दाखिल की।
- सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति Sanjay Kumar ने समीक्षा याचिका खारिज कर दी और कहा कि इस मामले में SIT गठन उचित था क्योंकि “प्रारंभिक तथ्य-स्थिति इस बात का संकेत देती थी कि धार्मिक-खण्ड के दृष्टिकोण से एक पूर्वाग्रह संभव है”। उन्होंने यह भी कहा कि “धर्मनिरपेक्षता को सिर्फ संविधान में अंकित न छोड़ा जाए — उसे व्यवहार में उतारा जाना चाहिए।”
- दूसरी ओर, न्यायमूर्ति Satish Chandra Sharma ने इस भाग में सहमति नहीं जताई कि समुदाय-आधारित SIT का गठन स्वचालित रूप से उचित है। उन्होंने कहा कि समीक्षा याचिका को इस सीमित प्रश्न पर सुनवाई के लिए अनुमति दी जानी चाहिए कि क्या SIT में हिंदू एवं मुस्लिम समुदाय के अधिकारियों का पृथक चयन न्यायसंगत है या नहीं। इस प्रकार उन्होंने याचिकाकर्ता को खुली सुनवाई का अवसर देने का आदेश दिया।
- इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने “विभाजित निर्णय” (split verdict) दिया — जहां एक न्यायाधीश ने आदेश को कायम रखा, वहीं दूसरे ने समीक्षा के द्वार खोल दिए।
कानूनी एवं संवैधानिक विश्लेषण
- धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत
- संविधान में धर्मनिरपेक्षता (सैकुलरिज्म) को मूलभूत संरचना (basic structure) का अंग माना गया है। इस आदेश में न्यायपालिका ने कहा कि पुलिस में धार्मिक-आधारित पूर्वाग्रह स्वीकार नहीं है — क्योंकि वह संविधान द्वारा लाई गई जवाबदेही का उल्लंघन है।
- SIT में हिंदू एवं मुस्लिम अधिकारियों को शामिल करने का निर्देश, न्यायालय के अनुसार, धार्मिक-सूचक आरोपों की निष्पक्ष जाँच सुनिश्चित करने का माध्यम है।
- प्रशासनिक जवाबदेही एवं विधिक प्रवर्तन का दायित्व
- अनुसूचित अपराध के सूचना प्राप्त होने के बाद पुलिस को तुरंत कार्यवाही करनी होती है (उदाहरणस्वरूप धारा 154 CrPC)। न्यायालय ने कहा कि इस कर्तव्य का पालन नहीं हुआ।
- दायित्व की उपेक्षा या अवहेलना सिर्फ प्रक्रिया-विपरीत नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रश्न उठाती है — कि क्या सुरक्षा-प्रभु शासन का आधार (rule of law) बाधित हुआ है।
- अन्वेषण की निष्पक्षता और विविध प्रतिनिधित्व
- SIT गठन के द्वारा न्यायालय ने एक ऐसा तंत्र बनाने का प्रयास किया है जिसमें भिन्न-भिन्न समुदायों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हों ताकि जाँच-प्रक्रिया निष्पक्ष व पारदर्शी हो सके।
- हालांकि, इस दिशा में आलोचना यह है कि क्या धर्म-आधारित चयन से उलट स्वाभाविक रूप से अन्य प्रकार के पूर्वाग्रह (जाति, राजनीतिक, सामाजिक) से निपटना संभव होगा या नहीं।
- विभाजित राय का महत्व
- विभाजन-राय इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाती है कि न्यायिक निर्णय-प्रक्रिया में “क्या उचित मात्र समुदाय-आधारित अधिकारी शामिल हो” यह विवादित विषय है।
- न्यायमूर्ति शर्मा ने समीक्षा खुली रखने की बात कही, इससे यह संकेत मिलता है कि “न्यायपालिका द्वारा हस्तक्षेप एवं निर्देश” का दायित्व हमेशा एकरूप नहीं है।
चुनौतियाँ एवं संभावित प्रभाव
चुनौतियाँ
- समीक्षा प्रक्रिया का अनिश्चित परिणाम: क्योंकि विभाजन-राय हुई है, समीक्षा सुनवाई के बाद भी दिशा तय नहीं है कि SIT गठन पर आगे क्या निर्णय होगा।
- प्राथमिकता-उउपेक्षा (prejudice) को बदलने में कठिनाई: पुलिस बल में सांस्कृतिक-सामाजिक पूर्वाग्रह सिर्फ धर्म-आधार पर नहीं, बल्कि अनेक आयामों पर होते हैं; SIT के गठन से उन सभी के विरुद्ध कैसे रणनीति बनेगी — यह स्पष्ट नहीं।
- समुदाय-आधारित गठन की संवेदनशीलता: “हिंदू एवं मुस्लिम अधिकारी” का चयन स्वयं एक संवेदनशील विषय है — चयन प्रक्रिया, संतुलन, निष्पक्षता एवं सार्वजनिक विश्वास निर्माण की चुनौतियाँ मौजूद होंगी।
- कार्य-निर्वाह एवं समय-सीमा: तीन महीने के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है, लेकिन हिंसा-उत्प्रेरक परिस्थितियों में समय-सीमा के भीतर गूढ़ जाँच व साक्ष्य जुटाने में बाधाएँ हो सकती हैं।
संभावित प्रभाव
- न्यायपालिका-प्रशासन संबंध पर असर: यह मामला दिखाता है कि जब पुलिस अथवा प्रशासनिक तंत्र निष्क्रिय रह जाता है, तो न्यायपालिका मार्गदर्शक कार्य करती है — इससे अन्य similar मामलों में प्रशासनिक जवाबदेही बढ़ सकती है।
- कानूनी प्रचलनों में बदलाव: इस तरह के निर्देश से आगे भविष्य में पुलिस में विविध-प्रतिनिधित्व एवं जवाबदेही के नए मानदंड बन सकते हैं।
- सामाजिक-विश्वास निर्माण: यदि SIT निष्पक्ष रूप से काम करता है, तो पुलिस-प्रशासन में भरोसा बढ़ा सकता है, खासकर उन समुदायों में जिन्हें लगता है कि उनकी शिकायतें उपेक्षित होती हैं।
- न्यायप्रक्रिया-विस्तार: समीक्षा याचिका तथा विभाजन-राय ने यह संकेत दिया कि न्यायिक समीक्षा-प्रक्रिया में अधिक खुलापन हो रहा है — इस प्रकार न्यायाधिकरण द्वारा निर्देशों के पुनर्विचार की संभावनाएँ बढ़ी हैं।
निष्कर्ष
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोरूपी संदेश दिया है: एक, यह कि पुलिस-प्रशासन में निष्पक्षता, जवाबदेही और संवेदनशीलता अनिवार्य हैं — विशेष रूप से सांप्रदायिक हिंसा जैसे मामलों में। दूसरा, यह कि न्यायपालिका-निर्देश व प्रशासनिक तंत्र में संतुलन-तालमेल आवश्यक है। SIT के गठन का निर्देश एक महत्वपूर्ण कदम है, परंतु यह तभी सार्थक होगा जब उसका गठन, कामकाज, रिपोर्टिंग, निष्पादन एवं निष्पक्षता के मानक स्पष्ट हों।
विभाजन-राय इस तथ्य को प्रकट करती है कि न्यायपालिका के भीतर भी यह समझ विकसित हो रही है कि “समुदाय-मूलक प्रतिनिधित्व” कैसे और कितनी सीमा तक उपयोगी होगा। अब यह प्रशासन, पुलिस बल एवं न्यायप्रणाली पर निर्भर करेगा कि वे इस निर्देश को सिर्फ कागज़ी आदेश बना कर न छोड़ें, बल्कि उसे वास्तविकता-परख में उतारें।