“साक्ष्य अधिनियम की सख्त व्याख्या — बिना पूर्व याचिका और कारण बताए द्वितीयक साक्ष्य स्वीकार्य नहीं” – पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय
परिचय
साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act, 1872) भारतीय न्याय प्रणाली का मूल स्तंभ है, जो यह निर्धारित करता है कि न्यायालय में कौन-से साक्ष्य ग्राह्य हैं और किस प्रकार प्रस्तुत किए जाने चाहिए। इस अधिनियम के अंतर्गत “प्राथमिक साक्ष्य” (Primary Evidence) को सर्वोच्च महत्व दिया गया है, जबकि “द्वितीयक साक्ष्य” (Secondary Evidence) केवल विशिष्ट परिस्थितियों में ही स्वीकार्य होते हैं।
हाल ही में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट किया कि द्वितीयक साक्ष्य को प्रस्तुत करने के लिए आवेदन करने से पूर्व उचित याचिकाएँ, स्पष्ट कारण और विधिक अनुपालन अनिवार्य हैं। मात्र समानता (equity) या न्याय के हित के नाम पर द्वितीयक साक्ष्य स्वीकार नहीं किए जा सकते।
मामले की पृष्ठभूमि
इस मामले में याचिकाकर्ता ने एक ऐसे दस्तावेज़ के संबंध में द्वितीयक साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति मांगी, जिसकी मूल प्रति (original document) उसके पास नहीं थी। उसका तर्क था कि मूल दस्तावेज़ किसी अन्य पक्ष के पास है और उसके अभाव में वह अपनी बात सिद्ध नहीं कर पा रहा है।
हालांकि, न्यायालय के समक्ष यह स्पष्ट नहीं किया गया कि मूल दस्तावेज़ के अभाव का क्या कारण है, न ही यह बताया गया कि उसे प्राप्त करने के लिए किन विधिक प्रयासों का पालन किया गया। याचिकाकर्ता ने केवल यह कहा कि न्याय के हित में उसे द्वितीयक साक्ष्य देने की अनुमति दी जाए।
न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न
न्यायालय को यह तय करना था कि—
- क्या केवल न्याय और समानता के आधार पर द्वितीयक साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति दी जा सकती है?
- क्या याचिकाकर्ता ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 के अंतर्गत आवश्यक शर्तों का पालन किया है?
- क्या बिना पूर्व याचिका और ठोस कारण बताए द्वितीयक साक्ष्य स्वीकार किए जा सकते हैं?
न्यायालय का अवलोकन
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने मामले पर विचार करते हुए कहा कि—
“साक्ष्य अधिनियम का उद्देश्य न्यायालय को केवल प्रामाणिक और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर निर्णय करने में सक्षम बनाना है। जब कोई पक्ष द्वितीयक साक्ष्य प्रस्तुत करना चाहता है, तो यह उसका विधिक दायित्व है कि वह पहले स्पष्ट रूप से यह साबित करे कि प्राथमिक साक्ष्य क्यों उपलब्ध नहीं है।”
न्यायालय ने आगे कहा कि केवल “न्याय के हित” या “समानता” के आधार पर द्वितीयक साक्ष्य की अनुमति नहीं दी जा सकती।
“द्वितीयक साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति कोई अधिकार नहीं, बल्कि एक विधिक अपवाद (legal exception) है, जो तभी लागू होता है जब याचिकाकर्ता धारा 65 के अनुरूप सभी शर्तों का पालन करता है।”
संबंधित विधिक प्रावधान
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 63 और 65 में द्वितीयक साक्ष्य से संबंधित प्रावधान निहित हैं।
- धारा 63 – द्वितीयक साक्ष्य के प्रकारों को परिभाषित करती है, जैसे—
- प्रमाणित प्रतिलिपि (certified copy),
- फोटोकॉपी, टाइप की गई प्रति या हस्तलिखित प्रतिलिपि,
- मौखिक विवरण आदि।
- धारा 65 – उन परिस्थितियों को बताती है जब द्वितीयक साक्ष्य ग्राह्य होगा, जैसे—
- जब मूल दस्तावेज़ खो गया हो या नष्ट हो गया हो,
- जब वह किसी ऐसे व्यक्ति के कब्जे में हो जो उसे प्रस्तुत करने से इंकार कर रहा हो,
- जब दस्तावेज़ न्यायालय के कब्जे में हो,
- या जब उसका मूल स्वरूप प्राप्त करना असंभव हो।
न्यायालय ने कहा कि इन शर्तों में से किसी एक का स्पष्ट रूप से उल्लेख और प्रमाण याचिका में होना चाहिए, तभी न्यायालय द्वितीयक साक्ष्य को स्वीकार कर सकता है।
न्यायालय का निर्णय
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि—
“द्वितीयक साक्ष्य की अनुमति पाने के लिए केवल सामान्य आवेदन पर्याप्त नहीं है। याचिकाकर्ता को स्पष्ट रूप से यह बताना होगा कि कौन-सी परिस्थितियाँ धारा 65 के अंतर्गत उत्पन्न हुई हैं, और उसने मूल दस्तावेज़ प्राप्त करने के लिए क्या प्रयास किए।”
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि—
“ऐसी याचिका तभी स्वीकार्य होगी जब उसके साथ उचित अफिडेविट, प्रमाण, और साक्ष्य का स्रोत बताया गया हो। केवल यह कहना कि ‘मूल दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं है’ या ‘न्याय के हित में अनुमति दी जाए’ पर्याप्त नहीं होगा।”
अंततः न्यायालय ने द्वितीयक साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि आवेदन में पर्याप्त कानूनी आधार और पूर्व याचिकाएँ प्रस्तुत नहीं की गईं।
न्यायालय की टिप्पणी: समानता बनाम विधिकता
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न्यायालय का दायित्व केवल समानता के आधार पर निर्णय देना नहीं है, बल्कि विधि के दायरे में रहकर न्याय सुनिश्चित करना है।
“न्यायालय का कार्य केवल समानता या संवेदना पर आधारित निर्णय देना नहीं, बल्कि विधि के अनुरूप न्याय सुनिश्चित करना है। यदि कानून किसी प्रक्रिया को अनिवार्य करता है, तो उसका पालन किए बिना राहत नहीं दी जा सकती।”
यह टिप्पणी न्यायालय द्वारा विधिक प्रक्रिया की पवित्रता और साक्ष्य अधिनियम की सख्ती को दोहराती है।
महत्वपूर्ण नजीरें जिनका उल्लेख किया गया
न्यायालय ने अपने निर्णय में कुछ पूर्ववर्ती निर्णयों का उल्लेख किया, जिनमें यह सिद्धांत स्थापित किया गया था कि द्वितीयक साक्ष्य को प्रस्तुत करने से पहले आवश्यक विधिक औपचारिकताओं का पालन आवश्यक है, जैसे—
- J. Yashoda v. K. Shobha Rani (2007) 5 SCC 730
- सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि द्वितीयक साक्ष्य तभी स्वीकार्य है जब यह साबित किया जाए कि मूल दस्तावेज़ प्रस्तुत करना असंभव है।
- Smt. Kamla v. Smt. Rajbala, 2019 (P&H HC)
- यह कहा गया कि द्वितीयक साक्ष्य की अनुमति पूर्व याचिका और स्पष्ट परिस्थितियों के आधार पर ही दी जा सकती है।
- Ashok Dulichand v. Madahavlal Dube, AIR 1975 SC 1748
- न्यायालय ने कहा कि द्वितीयक साक्ष्य एक अपवाद है, जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
कानूनी प्रभाव और व्यावहारिक परिणाम
इस निर्णय का कानूनी प्रभाव बहुत दूरगामी है। यह उन सभी मुकदमों पर लागू होगा जहाँ पक्षकार द्वितीयक साक्ष्य प्रस्तुत करना चाहते हैं।
- अब केवल न्याय या समानता के नाम पर अनुमति नहीं मिलेगी।
- याचिकाकर्ता को हर बार यह बताना होगा कि—
- मूल दस्तावेज़ क्यों अनुपलब्ध है,
- उसे प्राप्त करने के लिए क्या-क्या प्रयास किए गए,
- और प्रस्तुत द्वितीयक साक्ष्य कितना प्रामाणिक है।
यह निर्णय उन अधिवक्ताओं और वादियों के लिए भी चेतावनी है जो बिना ठोस कारण दिए द्वितीयक साक्ष्य पेश करने की मांग करते हैं।
निष्कर्ष
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का यह निर्णय न केवल भारतीय साक्ष्य अधिनियम की व्याख्या को सुदृढ़ करता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में विधिक अनुशासन (legal discipline) की आवश्यकता को भी पुनः स्थापित करता है।
यह स्पष्ट संदेश देता है कि—
“कानून की सीमाओं के भीतर ही न्याय संभव है; समानता या सहानुभूति विधिक अनुपालन का विकल्प नहीं हो सकती।”
द्वितीयक साक्ष्य की अनुमति कोई सामान्य औपचारिकता नहीं, बल्कि एक गंभीर विधिक प्रक्रिया है, जिसके लिए याचिकाकर्ता को अपने दावे को तथ्यों और साक्ष्य से सशक्त बनाना आवश्यक है। यह निर्णय भविष्य में साक्ष्य प्रस्तुत करने की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, तार्किक और अनुशासित बनाएगा।
यह फैसला भारतीय न्यायपालिका की उस स्थायी सोच को पुष्ट करता है कि न्याय केवल भावना या समानता से नहीं, बल्कि विधिक सिद्धांतों के पालन से प्राप्त होता है। यह निर्णय अधिवक्ताओं और न्यायालयों के लिए मार्गदर्शक है कि द्वितीयक साक्ष्य की अनुमति तभी दी जानी चाहिए जब कानून की सभी शर्तें स्पष्ट रूप से पूरी की गई हों।