असम में बांग्लादेश से “अनवरत प्रवेश” — एक सामाजिक-नैतिक आपदा और Gauhati High Court की चिंताएँ
उत्तर-पूर्व के राज्य Assam में पिछले कई दशकों से चल रही प्रवासी समस्या आज न केवल सामाजिक-राजनीतिक रूप ले चुकी है बल्कि न्यायिक दृष्टि से भी गंभीर रूप में उभर कर सामने आई है। विशेष रूप से Gauhati High Court ने हाल ही में इस प्रवाह को “अनवरत” (unabated) और “घातक” माना है, जिसका असर असम की जनसंख्या संरचना, सांस्कृतिक पहचान, संसाधन-वितरण और सामाजिक स्थिरता पर पड़ रहा है।
यह लेख इस समस्या की विविध परतों — ऐतिहासिक, कानूनी, सामाजिक-सांस्कृतिक और प्रशासनिक — को एक समग्र दृष्टि से देखेगा, साथ ही यह भी बताएगा कि उच्च न्यायालय ने किन आधारों पर इस प्रवाह को बहु-प्रभावकारी एवं खतरनाक बताया है। लेख में प्रयाप्त तथ्य, न्यायिक उद्धरण और विश्लेषण शामिल होंगे ताकि इस विषय पर एक बौद्धिक एवं दिशानिर्देशक चर्चा संभव हो सके।
१. पृष्ठभूमि — कैसे हुआ यह प्रवाह
असम-बांग्लादेश सीमावर्ती प्रदेश रहा है और यहाँ बांग्लादेश (पूर्व में ईस्ट पाकिस्तान) से प्रवासियों का आगमन दशकों से जारी रहा। इस प्रवाह को अनेक कारणों से जोड़ा गया है: सीमावर्ती स्थिति, कृषि-भूमि की उपलब्धता, आर्थिक अवसरों की तलाश, सामाजिक-समीकरण की प्रक्रिया। उदाहरण के लिए, एक शोध निबंध में उल्लेख है कि अब तक असम की मुस्लिम आबादी 1951 में करीब 24.68% थी, जो 2011 में 34.22% के आसपास पहुँच गयी; हालांकि वहाँ यह तर्क दिया गया है कि इसका कारण केवल प्रवास नहीं बल्कि उच्च जन्म-दर भी रहा है।
लेकिन इस प्रवाह की एक और दृष्टि है — न्यायालय द्वारा उद्धृत रिपोर्टों में इसे “असंतोषजनक आक्रमण (silent and invidious demographic invasion)” कहा गया है। उदाहरणस्वरूप, उच्च न्यायालय ने यह बताया कि कई जिलों में मुस्लिम-बहुसंख्यक स्थिति बनी है और यह प्रवाह राज्य की जनसंख्या संरचना को बदलने का कारण हो सकता है।
इतिहास में भी यह समस्या दर्ज है — 1930 के दशक में असम के अधिकारी ने कहा था:
“…the most important event in the province during the last 25 years … has been the invasion of a vast horde of land-hungry Bengali immigrants, mostly Muslims from the districts of eastern Bengal.”
इस प्रकार, यह प्रवाह केवल आधुनिक समस्या नहीं बल्कि पुरानी पीड़ा रही है — जो समय के साथ रूप बदलकर आज प्रमुख न्यायिक और सामाजिक बहस का विषय बन चुकी है।
२. कानूनी एवं न्यायिक दृष्टि
(क) प्रमुख न्यायिक टिप्पणियाँ
गुवाहाटी हाई कोर्ट ने हाल ही में अपने निर्णय में इस प्रवाह को “बाह्य आक्रमण (external aggression)” तक कहा है। न्यायालय ने यह टिप्पणी उस पृष्ठभूमि में दी जहाँ एक व्यक्ति को ‘घोषित विदेशी’ माना गया था और उसके खिलाफ रिट याचिका खारिज की गयी थी। वहीं न्यायालय ने कहा कि:
“When the issue of unabated influx from the specified territory is leading to demographic changes in the State … which … is leading to widespread civil discontent in the State of Assam…”
यह टिप्पणी बताती है कि इस प्रवाह को केवल पारंपरिक “प्रवास” के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसके सामाजिक-राजनीतिक प्रभावों को भी गंभीरता से लिया जा रहा है।
(ख) कानून-प्रावधान और प्रवाह
इस समस्या से जुड़ी मुख्य क़ानूनी व्यवस्थाएँ हैं:
- Citizenship Act, 1955 की धारा 6A, जिसे विशेष रूप से असम के लिए बनाया गया था, का उद्देश्य 1 जनवरी 1966 से 25 मार्च 1971 तक प्रवेश करने वालों को नागरिकता देना था।
- इसके साथ ही, Foreigners Act, 1946 तथा Immigrants (Expulsion from Assam) Act, 1950 जैसे कानूनों के तहत विदेशी माना गया व्यक्ति निष्कासन के दायरे में आता है।
उच्च न्यायालय ने यह भी कहा है कि प्रवास के कारण असम के सीमावर्ती जिलों में जनसंख्या वृद्धि राष्ट्रीय औसत से अधिक पाई गयी है और परिणामस्वरूप राज्य की अद्वितीय सांस्कृतिक, सामाजिक एवं राजनीतिक पहचान खतरे में है।
३. सामाजिक-सांस्कृतिक एवं जनसांख्यिकीय प्रभाव
(क) जनसंख्या संरचना में परिवर्तन
- न्यायालय ने उद्धृत किया है कि कुछ जिलों में मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक हो चुकी है।
- अन्य शोध बताते हैं कि प्रवास ही नहीं बल्कि उच्च जन्म-दर भी योगदान दे रही है; उदाहरण के लिए, बांग्लादेशी प्रवास अकेला कारण नहीं माना जा सकता।
- लेकिन न्यायालय द्वारा इसे व्यापक खतरे के रूप में देखा गया है: “their cultural survival will be in jeopardy … their political control will be weakened.”
(ख) सामाजिक तनाव और असम की पहचान
- असम में इस प्रवाह के कारण स्थानीय असमिया भाषी-संस्कृति समूहों का भय है कि वे कम-संख्या में रह जाएंगे। उदाहरण स्वरूप न्यायालय ने कहा है कि यह प्रवाह “असमिया लोगों को अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक बना सकता है।”
- इस प्रकार की चिंता का सामाजिक-राजनीतिक परिणाम भी हुआ है — छात्रों में आक्रोश, संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा, भाषा-संस्कृति का सवाल। इसके चलते असम आंदोलन जैसी घटनाएँ भी सामने आईं।
(ग) शासन-श्रोत और संसाधन विभाजन
- जब आबादी में अचानक वृद्धि होती है (अघोषित, प्रवासी समूहों के कारण), तो सार्वजनिक सेवाओं, भूमि, रोजगार, शिक्षा-स्वास्थ्य संसाधनों पर दबाव बढ़ता है।
- सीमावर्ती इलाकों में अवैध आश्रय-विकास, भू-अधिग्रहण और भूमि उपयोग परिवर्तन जैसी समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं।
४. असम की राजनीतिक-सुरक्षा चुनौतियाँ
- न्यायालय ने इस प्रवाह को राष्ट्रीय सुरक्षा एवं अखण्डता के दृष्टिकोण से भी माना है। उदाहरण के लिए, यह कहा गया है कि “the loss of lower Assam will sever the entire land mass of the North East from the rest of the country.”
- सीमावर्ती भू-भागों की संवेदनशीलता, असम से देश के अन्य राज्यों की भू-संपर्क स्थिति, मजदूरी-माइग्रेशन नेटवर्क आदि के कारण यहाँ यह समस्या सिर्फ सामाजिक नहीं बल्कि रणनीतिक भी बन गयी है।
- राजनीतिक रूप से, इस विषय ने असम आंदोलन, जनजागरण, पार्टी-राजनीति को प्रभावित किया है — प्रवासियों का प्रश्न अब सत्ता-विपक्ष दोनों के लिए राजनीतिक मुद्दा बन गया है।
५. न्यायालय ने क्या समाधान सुझाए?
- गुवाहाटी हाई कोर्ट ने यह सुझाव दिया है कि Foreigners Tribunals द्वारा लंबित मामलों की गति बढ़ाई जाए, उसकी प्रक्रिया सरल और शीघ्र होनी चाहिए ताकि विवाद लंबित न रहे।
- साथ ही, प्रवास-नियन्त्रण-प्रक्रियाओं (border control, पहचान-प्रमाणीकरण) को सुदृढ़ करने की तर्क-सहिता बनाई गयी है।
- न्यायालय ने यह माना है कि एक घोषित विदेशी नागरिक को सामाजिक-राजनीतिक अधिकार नहीं दिए जा सकते अर्थात नागरिकता-संबंधित संरक्षण सीमित होगा।
- इसके अतिरिक्त, केंद्र–राज्य एवं निर्वाचन आयोग, राजस्व विभाग को मिलकर राज्य में राजस्व-गाँवों की संख्या अचानक बढ़ने, मतदाता सूची में प्रवासी सम्मिलन तथा संवेदनशील सीमावर्ती भू-भागों में असामान्य जनसंख्या वृद्धि की जाँच करने का निर्देश दिया गया है।
६. आलोचनाएँ एवं विचार-विमर्श
यद्यपि प्रवास को समस्या के रूप में देखा गया है, लेकिन अनेक शोधकर्ताओं ने इसे यथार्थ रूप से “सबसे प्रमुख कारण” नहीं माना। उदाहरणस्वरूप, एक विश्लेषण कहता है:
“Illegal immigrants in Assam are estimated to number between 16 lakh and 84 lakh… But it is a myth that illegal Bangladeshi migrants are responsible for increase in Assam’s Muslim population.”
यह दर्शाता है कि सिर्फ विदेशी प्रवास को ही न देखने के लिए शोध-मुद्दे हैं — जैसे- सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन, जन्म-दर, शिक्षा-अवसर, असमिया एवं बंगाली भाषी समूहों का विभाजन आदि।
इसके अतिरिक्त, प्रवास को संज्ञान में लेते हुए भी मानवीय, संवैधानिक तथा अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों का अनुपालन आवश्यक है। “घोषित विदेशी” विकोर्स के सन्दर्भ में, न्यायालय ने यह भी कहा है कि किसी व्यक्ति को गलत तरीके से विदेशी घोषित नहीं किया जाना चाहिए — अर्थात् प्रमाण-विनियोग का ध्यान रखें।
७. निष्कर्ष
असम में बांग्लादेश से होने वाले “अनवरत प्रवाह” को अब सिर्फ स्रोत-मूल समस्या नहीं माना जा रहा, बल्कि वह जनसंख्या-रचना, सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान, संसाधन-वितरण एवं सुरक्षा-व्यवस्था को प्रभावित करने वाला बहुआयामी संकट माना जा रहा है। गुवाहाटी हाई कोर्ट ने इसे “डेमोग्राफिक आक्रमण” तक कहा है, जो राज्य की स्थिरता तथा असमिया पहचान के लिए जोखिम उत्पन्न कर रहा है।
हालाँकि, समस्या को हल करने के लिए सिर्फ प्रवास-नियंत्रण पर्याप्त नहीं है। इससे जुड़े सामाजिक-आर्थिक कारणों, न्यायिक प्रक्रिया-दुर्लव्धता, पहचान-प्रमाणीकरण की जटिलताएँ, संवैधानिक व मानवीय आयाम भी देखे जाने चाहिए। असम के लिए यह चुनौती है: कैसे वह अपने इतिहास-सांस्कृतिक अस्तित्व को सुरक्षित रखते हुए संवेदनशील तरीके से मानवीय दृष्टिकोण अपनाए और साथ ही प्रवास-संक्रमण को नियंत्रण में लाए।
अन्त में, यह कहा जा सकता है कि असम को न केवल प्रवासियों की सही पहचान व नियंत्रण करना होगा, बल्कि देश-राज्य-स्थानीय स्तर पर बेहतर नीतियाँ, सामाजिक समावेशन, पहचान का सम्मान और न्याय-प्रक्रियाओं की गति सुनिश्चित करनी होगी। तभी यह दूसरा रूप ले सकता है: समस्या से समाधान की ओर।