“Disclosure is Mandatory, Not Discretionary – Even for Minor Convictions”: सुप्रीम कोर्ट ने नियम 24-A की अनिवार्यता पर दिया जोर
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट किया कि सरकारी सेवाओं में अभ्यर्थियों द्वारा आपराधिक मामलों या दोषसिद्धियों का खुलासा (disclosure) करना कोई विवेकाधीन (discretionary) विषय नहीं बल्कि अनिवार्य (mandatory) कर्तव्य है। यह फैसला न केवल सार्वजनिक रोजगार में पारदर्शिता और ईमानदारी की भावना को मजबूत करता है, बल्कि “Rule 24-A” की प्रकृति और उद्देश्य पर भी गहरी रोशनी डालता है।
🔹 प्रसंग और पृष्ठभूमि
इस मामले की पृष्ठभूमि में एक ऐसा उम्मीदवार था जिसने सरकारी सेवा में आवेदन करते समय अपने खिलाफ दर्ज एक मामूली आपराधिक मामले की जानकारी छुपाई थी। यद्यपि वह अपराध गंभीर प्रकृति का नहीं था और उसमें उसे हल्की सजा मिली थी, फिर भी उसने आवेदन पत्र में “कोई आपराधिक मामला नहीं” घोषित किया। नियुक्ति के बाद, जब यह तथ्य प्रकाश में आया, तो विभाग ने उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया।
अभ्यर्थी ने तर्क दिया कि उसका अपराध मामूली (trivial) था, और वह “गलतफहमी” के कारण जानकारी देने से चूक गया। परंतु विभाग ने यह कहते हुए उसकी व्याख्या अस्वीकार कर दी कि “disclosure” एक कानूनी दायित्व है, न कि व्यक्तिगत विवेक का मामला।
🔹 न्यायालय के समक्ष प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि —
क्या किसी अभ्यर्थी द्वारा मामूली अपराध या सजा की जानकारी न देना “धोखाधड़ी” (fraud) या “मालिकाना ईमानदारी की कमी” (lack of integrity) माना जा सकता है?
और क्या ऐसे मामलों में Rule 24-A के तहत खुलासा करना अनिवार्य है, भले ही अपराध नगण्य क्यों न हो?
🔹 Rule 24-A का प्रावधान
“Rule 24-A” प्रायः राज्य सेवा नियमों और केंद्रीय सेवा नियमों में एक समान रूप से पाया जाने वाला प्रावधान है, जो यह कहता है कि —
“यदि कोई व्यक्ति किसी आपराधिक अपराध में दोषी पाया गया है या उसके खिलाफ किसी न्यायालय में आपराधिक मामला लंबित है, तो उसे उस तथ्य की सूचना आवेदन के समय देनी होगी। ऐसा न करने पर उसकी उम्मीदवारी निरस्त की जा सकती है या नियुक्ति रद्द की जा सकती है।”
यह नियम “character verification” और “public trust” का मूल आधार है।
न्यायालयों ने हमेशा यह माना है कि सरकारी सेवाओं में प्रवेश केवल योग्यता से नहीं, बल्कि चरित्र और सत्यनिष्ठा (integrity) से भी निर्धारित होता है।
🔹 सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अपने निर्णय में कहा —
“Disclosure of criminal antecedents is not a matter of choice; it is an absolute rule of law. Even if the conviction is for a minor or petty offence, the candidate must disclose it truthfully. Concealment, in any form, amounts to suppression of material fact.”
न्यायालय ने आगे कहा कि जब किसी व्यक्ति को यह अवसर दिया जाता है कि वह अपने पिछले आचरण का पूरा विवरण दे, तो उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह पूर्ण ईमानदारी और पारदर्शिता से जवाब देगा। यदि वह ऐसा नहीं करता, तो यह न केवल नियम 24-A का उल्लंघन है बल्कि सार्वजनिक सेवा के प्रति बेईमानी भी है।
🔹 ‘मामूली अपराध’ की दलील पर न्यायालय की प्रतिक्रिया
अभ्यर्थी ने यह दलील दी कि उसका अपराध मामूली था और वह किशोरावस्था में हुआ था, इसलिए उसे माफ किया जाना चाहिए। परंतु अदालत ने कहा कि —
“The nature or gravity of the offence is irrelevant for the purpose of disclosure. The rule does not distinguish between major and minor convictions. The obligation to disclose is universal.”
इस प्रकार, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि “Disclosure is mandatory, not discretionary.”
भले ही अपराध छोटा हो, खुलासा न करना स्वयं में एक गंभीर गलती है।
🔹 ईमानदारी और नैतिकता का प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में सत्यनिष्ठा (integrity) को सबसे ऊंचा गुण बताया। न्यायालय ने कहा कि सरकारी सेवाओं में कार्य करने वाला व्यक्ति राज्य का प्रतिनिधि होता है, और उसके चरित्र में कोई भी दाग लोकविश्वास (public trust) को कमजोर करता है।
न्यायालय ने कहा —
“Public employment is not a private right; it is a public trust. Honesty is the foundation of this trust. A candidate who suppresses material facts at the entry stage cannot be expected to uphold constitutional values while in service.”
🔹 पूर्ववर्ती निर्णयों का संदर्भ
सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय में अपने ही कई पूर्ववर्ती फैसलों का उल्लेख किया, जैसे कि —
- Avtar Singh v. Union of India (2016) 8 SCC 471 –
इस मामले में न्यायालय ने कहा था कि सभी आपराधिक मामलों का खुलासा आवश्यक है, और न बताने पर नियोक्ता नियुक्ति रद्द कर सकता है। - Devendra Kumar v. State of Uttaranchal (2013) 9 SCC 363 –
इसमें कहा गया कि “Suppression of material fact is itself a fraud.” - Union Territory, Chandigarh v. Pradeep Kumar (2018) 1 SCC 797 –
यहां अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि उम्मीदवार ने किसी लंबित मामले की सूचना नहीं दी, तो उसे नौकरी से निकाला जा सकता है।
इन निर्णयों के आलोक में वर्तमान फैसला इस सिद्धांत को और सुदृढ़ करता है कि ईमानदारी सार्वजनिक सेवा का अपरिहार्य तत्व है।
🔹 मानव दृष्टिकोण बनाम विधिक दृष्टिकोण
न्यायालय ने यह भी स्वीकार किया कि हर व्यक्ति जीवन में किसी न किसी मोड़ पर गलती कर सकता है, विशेषकर युवावस्था में। परंतु न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून मानवीय दृष्टिकोण (human approach) को अपनाते हुए भी नियमों की अनिवार्यता (mandatory nature) को नजरअंदाज नहीं कर सकता।
इसलिए, यदि किसी व्यक्ति ने अपराध किया और दया की याचना करता है, तो उसे पहले अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए, न कि छुपानी चाहिए। छुपाने का कार्य व्यक्ति के नैतिक आचरण पर प्रश्न उठाता है।
🔹 नियोक्ता की विवेकाधीन शक्ति
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नियोक्ता (employer) के पास यह शक्ति अवश्य है कि वह अपराध की प्रकृति, समय और परिस्थितियों को देखकर अनुकंपा (compassionate view) ले सकता है।
परंतु यह शक्ति तभी प्रयोग की जा सकती है जब उम्मीदवार ने सच्चाई बताई हो।
यदि उसने तथ्यों को छिपाया है, तो उसे राहत नहीं दी जा सकती।
🔹 निर्णय का व्यापक प्रभाव
यह निर्णय सरकारी नौकरी में भर्ती प्रक्रिया की सत्यनिष्ठा और पारदर्शिता को मजबूत करता है। अब यह और भी स्पष्ट है कि —
- कोई भी अपराध या लंबित मुकदमा छिपाना कानूनी परिणाम लाएगा।
- मामूली अपराध हो या गंभीर, दोनों का खुलासा आवश्यक है।
- चयन प्रक्रिया में सत्य न बताने वाले उम्मीदवारों को नैतिक रूप से अयोग्य माना जा सकता है।
🔹 संविधानिक दृष्टि से विश्लेषण
यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर), और अनुच्छेद 311 (सिविल सेवकों की सुरक्षा) से भी जुड़ा हुआ है।
न्यायालय ने कहा कि समान अवसर का सिद्धांत तभी लागू हो सकता है जब सभी उम्मीदवार सत्य और पारदर्शिता से भाग लें। जो व्यक्ति अपने अतीत को छिपाता है, वह संविधान की इस भावना के विपरीत कार्य करता है।
🔹 निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय प्रशासनिक तंत्र में ईमानदारी और पारदर्शिता की संस्कृति को और मजबूत करता है। यह संदेश देता है कि —
“सत्य बोलना केवल नैतिक कर्तव्य नहीं, बल्कि कानूनी दायित्व है।”
Rule 24-A अब केवल एक औपचारिक प्रावधान नहीं, बल्कि एक नैतिक कसौटी (moral touchstone) है, जिस पर सरकारी सेवाओं की विश्वसनीयता टिकी हुई है।
अतः कोई भी अभ्यर्थी, चाहे उसका अपराध कितना भी छोटा क्यों न हो, उसे आवेदन करते समय अपने सभी आपराधिक मामलों या दोषसिद्धियों का स्पष्ट और पूर्ण खुलासा करना ही चाहिए।
निष्कर्षतः, यह निर्णय यह स्थापित करता है कि —
“Disclosure is Mandatory, Not Discretionary – Even for Minor Convictions.”
ईमानदारी ही सार्वजनिक सेवा की नींव है, और जो इसे प्रारंभिक चरण में ही तोड़ता है, वह स्वयं को उस सेवा के योग्य नहीं बना सकता।