“किशोरों का वयस्कों के रूप में मुकदमा चलाना केवल जघन्य अपराधों में ही संभव है, सभी गंभीर अपराध इसमें शामिल नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय”
भूमिका
किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 [Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015] भारतीय विधिक प्रणाली में एक ऐसा कानून है जो न केवल अपराध करने वाले बच्चों के सुधार और पुनर्वास पर केंद्रित है, बल्कि यह इस बात को भी सुनिश्चित करता है कि बच्चों के साथ वयस्क अपराधियों जैसा व्यवहार न किया जाए।
हाल ही में राजस्थान उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए यह स्पष्ट किया कि किसी किशोर को वयस्क की तरह मुकदमे का सामना केवल तभी करना होगा जब उसने “जघन्य अपराध (heinous offence)” किया हो, न कि हर “गंभीर अपराध (serious offence)” में।
यह फैसला न केवल किशोर न्याय प्रणाली की व्याख्या को स्पष्ट करता है, बल्कि बाल अधिकारों और सुधारात्मक न्याय की भावना को भी पुनर्स्थापित करता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला उस समय सामने आया जब एक किशोर पर गंभीर अपराध करने का आरोप लगाया गया था। किशोर की उम्र अपराध के समय 16 वर्ष से थोड़ी अधिक थी, और किशोर न्याय बोर्ड (Juvenile Justice Board) ने उसे वयस्क के रूप में ट्रायल का सामना करने के लिए भेजने की अनुशंसा कर दी थी।
हालांकि, किशोर ने इस आदेश को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी, यह कहते हुए कि उसका अपराध “जघन्य अपराध” की श्रेणी में नहीं आता, इसलिए उसे वयस्कों की तरह मुकदमे का सामना नहीं करना चाहिए।
मुख्य कानूनी प्रश्न
- क्या किशोर को वयस्क के रूप में ट्रायल किया जा सकता है यदि अपराध केवल “गंभीर (serious)” हो, न कि “जघन्य (heinous)” ?
- Juvenile Justice Act, 2015 की धारा 15 और 18(3) की व्याख्या किस प्रकार की जानी चाहिए?
- “Heinous offence” की परिभाषा (Section 2(33)) क्या केवल उन अपराधों तक सीमित है जिनकी सजा न्यूनतम सात वर्ष या उससे अधिक हो?
प्रासंगिक विधिक प्रावधान
1. धारा 2(33) — “Heinous Offence”
इस धारा के अनुसार —
“Heinous offences” वे अपराध हैं जिनके लिए भारतीय दंड संहिता या अन्य किसी अधिनियम के अंतर्गत न्यूनतम सजा सात वर्ष या उससे अधिक निर्धारित है।
2. धारा 15 — Preliminary Assessment by Board
इस प्रावधान के तहत, जब कोई बालक (16 से 18 वर्ष के बीच) जघन्य अपराध करता है, तो किशोर न्याय बोर्ड यह मूल्यांकन करता है कि —
- क्या बालक ने अपराध को समझ-बूझकर (mental capacity) किया,
- उसका इरादा क्या था,
- और क्या वह मुकदमे का सामना करने के लिए पर्याप्त परिपक्व है।
3. धारा 18(3) — Transfer to Children’s Court
यदि बोर्ड यह पाता है कि बालक का ट्रायल वयस्कों की तरह किया जाना चाहिए, तो मामला बाल न्यायालय (Children’s Court) में स्थानांतरित किया जाता है।
न्यायालय का अवलोकन
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि Juvenile Justice Act का उद्देश्य दंडात्मक नहीं, बल्कि सुधारात्मक है।
इसलिए, हर गंभीर अपराध को “जघन्य” मानकर किशोर को वयस्क की तरह मुकदमे का सामना कराने की प्रवृत्ति गलत है।
न्यायालय ने यह भी कहा कि:
“Juvenile Justice Act का उद्देश्य समाज के भविष्य — अर्थात् बच्चों — को सुधार के अवसर देना है। यदि हम उन्हें वयस्क अपराधी की तरह ट्रायल के लिए भेजेंगे, तो यह कानून के मूल उद्देश्य के खिलाफ होगा।”
‘Serious’ और ‘Heinous’ अपराध में अंतर
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि “Serious offence” और “Heinous offence” दो अलग-अलग श्रेणियां हैं —
| अपराध का प्रकार | सजा की अवधि | उदाहरण |
|---|---|---|
| Petty Offence (लघु अपराध) | 3 वर्ष तक | साधारण चोरी, झगड़ा आदि |
| Serious Offence (गंभीर अपराध) | 3 वर्ष से अधिक लेकिन 7 वर्ष से कम | मारपीट, गाड़ी दुर्घटना आदि |
| Heinous Offence (जघन्य अपराध) | न्यूनतम 7 वर्ष या उससे अधिक | हत्या, बलात्कार, अपहरण आदि |
न्यायालय ने कहा कि “Serious offence” के मामलों में किशोर को वयस्क नहीं माना जा सकता, भले ही अपराध नैतिक दृष्टि से गंभीर क्यों न लगे।
पूर्ववर्ती निर्णयों का उल्लेख
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया, जिनमें कहा गया था कि “किशोर अपराधी को वयस्क की तरह ट्रायल के लिए भेजना अंतिम उपाय होना चाहिए, सामान्य नियम नहीं।”
- Shilpa Mittal vs State (NCT of Delhi), (2020) 2 SCC 787
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि किसी अपराध की सजा “कम से कम सात वर्ष” नहीं है, तो उसे “heinous offence” नहीं कहा जा सकता।
इस निर्णय ने “serious” और “heinous” अपराधों के बीच स्पष्ट रेखा खींची थी। - Barun Chandra Thakur vs State of Haryana (2022)
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि किशोर को वयस्क के रूप में ट्रायल करने का निर्णय केवल गहन और सावधानीपूर्वक विचार के बाद ही लिया जा सकता है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि इन फैसलों की रोशनी में, किसी किशोर को केवल “serious offence” के लिए वयस्क की तरह मुकदमे का सामना करने के लिए भेजना पूरी तरह से अवैध और मनमाना है।
निर्णय का सार
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा —
“Juvenile Justice Act, 2015 की भावना यह है कि बाल अपराधियों को सुधारने और समाज में पुनर्स्थापित करने का अवसर दिया जाए। किसी 16 से 18 वर्ष के किशोर को वयस्क की तरह मुकदमे का सामना केवल उन्हीं मामलों में करना होगा जो वास्तव में ‘heinous offences’ हैं। सभी गंभीर अपराध इस श्रेणी में नहीं आते।”
न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि —
- किशोर न्याय बोर्ड प्रत्येक मामले में धारा 15 के तहत प्रारंभिक मूल्यांकन करते समय “अपराध की प्रकृति” और “सजा की सीमा” दोनों पर विचार करे।
- बोर्ड को यह सुनिश्चित करना होगा कि “hearing” के दौरान बालक को पूर्ण कानूनी सहायता और मनोवैज्ञानिक समर्थन मिले।
निर्णय का प्रभाव
- कानूनी स्पष्टता:
इस फैसले से किशोर न्याय अधिनियम की धारा 2(33) और 15 की व्याख्या और अधिक स्पष्ट हो गई है। अब यह निश्चित हो गया है कि सिर्फ गंभीर अपराध ही नहीं, बल्कि केवल जघन्य अपराधों में ही वयस्क ट्रायल संभव है। - किशोरों की सुरक्षा:
यह निर्णय यह सुनिश्चित करता है कि किशोरों को वयस्क अपराधियों के संपर्क में आने से बचाया जा सके, जिससे उनके सुधार की संभावना बनी रहे। - न्यायिक संतुलन:
हाईकोर्ट ने सुधारात्मक न्याय और सामाजिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखने का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया है।
निष्कर्ष
राजस्थान हाईकोर्ट का यह निर्णय भारतीय किशोर न्याय व्यवस्था के विकास में एक महत्वपूर्ण कदम है।
यह स्पष्ट करता है कि किशोरों को सजा देने की जगह सुधारने का अवसर देना ही कानून की मूल भावना है।
किशोरों के खिलाफ वयस्क ट्रायल केवल उन्हीं अपराधों में किया जा सकता है, जिनकी न्यूनतम सजा सात वर्ष या उससे अधिक है — अर्थात् सिर्फ “Heinous Offences” में।
यह फैसला न केवल विधिक दृष्टि से बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारतीय न्याय प्रणाली की मानवीयता, संवेदनशीलता और सुधारात्मक दृष्टिकोण को पुनः स्थापित करता है।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।