“Supreme Court of India ने National Company Law Appellate Tribunal (NCLAT) के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार किया, जिसने Aakash Educational Services Ltd. को अपने राइट्स इशू जारी रखने की अनुमति दी – BYJU’S (Think & Learn Pvt. Ltd.) के दिवालियापन-प्रक्रिया के बीच एक अहम मोड़”
प्रस्तावना
शिक्षा-तकनीकी क्षेत्र में भारत की प्रमुख कंपनी BYJU’S (Think & Learn Pvt. Ltd.) के अधीनस्थ Aakash Educational Services Ltd. (AESL) और उसके माध्यम से BYJU’S के वित्तीय एवं स्वामित्व सम्बन्धी विवादों में एक निर्णायक मोड़ तब आया जब सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने NCLAT द्वारा दिए गए उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें AESL को अपने राइट्स इशू (rights issue) को आगे बढ़ाने की अनुमति दी गई थी।
इस लेख में हम इस निर्णय का सम्पूर्ण विश्लेषण करेंगे — तथ्य-परिचय, कानूनी पृष्ठभूमि, NCLT-NCLAT-SC प्रक्रियाएँ, दावे-विपक्ष, निहित रणनीतिक अर्थ, एवं आगे की चुनौतियाँ।
१. मामले का तथ्य-परिचय
- BYJU’S अर्थात Think & Learn Pvt. Ltd. (TLPL) के विरुद्ध insolvency प्रक्रिया (CIRP) 16 जुलाई 2024 को National Company Law Tribunal, Bengaluru Bench (NCLT) द्वारा आरंभ की गई थी।
- AESL (Aakash Educational Services Ltd.) BYJU’S की सहायक या अधीनस्थ कंपनी रही है, जिसमें BYJU’S की हिस्सेदारी थी लगभग 25.75 % तक।
- AESL ने 20 नवम्बर 2024 को एक Extraordinary General Meeting (EGM) बुलायी, जिसमें उसके Articles of Association में परिवर्तन तथा authorised share capital बढ़ाने तथा राइट्स इशू के प्रस्ताव को मंजूरी देने का निर्णय हुआ।
- US-based क्रेडिटर्स से सम्बद्ध GLAS Trust Company LLC ने इस प्रस्ताव को चुनौती दी थी, यह दावा करते हुए कि यह BYJU’S की हिस्सेदारी को अप्रत्यक्ष रूप से खत्म या बहुत घटा देने का माध्यम है।
२. कानूनी पृष्ठभूमि
(i) CIRP एवं IBC के प्रावधान
- TLPL के CIRP के अंतर्गत, उसके सम्पूर्ण परिसंपत्तियों एवं देनदारियों की समीक्षा हो रही है और एक resolution professional (RP) नियुक्त किया गया है।
- लेकिन AESL स्वयं एक स्वतंत्र जुरिडिकल व्यक्ति (juristic entity) है, और BYJU’S उसमें हिस्सेदार मात्र है — इस स्थिति ने प्रश्न उठाए कि CIRP-प्रक्रिया BYJU’S की हिस्सेदारी वाली सहायक कंपनी के कामकाज या शेयर संरचना को किस हद तक प्रभावित कर सकती है।
- NCLAT ने इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तर्क दिया कि “IBC का उद्देश्य स्वस्थ सहायक कंपनियों को व्यावसायिक रूप से जीवित रखना है, ताकि हिस्सेदार (shareholder) का मूल्य शेष रहे।”
(ii) NCLT-NCLAT प्रक्रिया
- GLAS Trust ने NCLT में एक आवेदन किया था जिसमें वह AESL की EGM में लिए गए प्रस्तावों को अवैध बताना चाहता था। NCLT ने उस आवेदन पर अस्थायी राहत देने से इनकार किया।
- इसके बाद GLAS Trust ने NCLAT में Company Appeal (AT)(CH)(Ins) No. 139 of 2025 दाखिल की, जिसमें IA No. 1514/2025 के माध्यम से AESL की EGM और राइट्स इशू पर रोक लगाने की interim राहत माँगी गई थी।
- NCLAT ने 28 अक्टूबर 2025 के अपने आदेश में इस interim relief को अस्वीकृत कर दिया, यह देखते हुए कि GLAS Trust ने तीन-मुखी मानदंड — prima facie case, irreparable injury, balance of convenience — पूरी तरह से स्थापित नहीं की।
३. सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय
- 3 नवम्बर 2025 को सुप्रीम कोर्ट की पी.एस. नarsimha और अतुल चंद्रकर की बेंच ने GLAS Trust तथा RP शैलेन्द्र अजमेड़ा की अपीलों को स्वीकार नहीं किया और NCLAT के आदेश में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया।
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि NCLAT द्वारा दिए गए “observations” केवल इंटरलोक्यूटरी आवेदन (interlocutory application) को निपटाने हेतु थे, और उन्हें अंतिम निर्णय पर बाध्य नहीं माना जाना चाहिए।
- इस तरह AESL को जिस राइट्स इशू तथा authorised share capital वृद्धि की प्रक्रिया आगे बढ़ानी थी — उसे सुप्रीम कोर्ट ने वैध ठहराया, बशर्ते कि BYJU’S/ TLPL ने अपनी हिस्सेदारी के अनुपात में भाग लेने का विकल्प चुना होता।
४. निर्णय का विश्लेषण एवं तर्क
(i) NCLAT और SC द्वारा अपनाया गया दृष्टिकोण
- NCLAT ने यह तर्क दिया कि AESL ने Debenture Trust Deed की शर्तों के पालन हेतु Articles में संशोधन किया था (April 25 2023 के DTD के अंतर्गत) — अर्थात् यह निर्णय BYJU’S को कमजोर करना नहीं बल्कि ऋणदाताओं (debenture holders) के हितों की रक्षा करना था।
- NCLAT ने कहा कि “TLPL का AESL में शेयर का मूल्य तब तक सुरक्षित नहीं रह सकता जब तक AESL वाणिज्यिक रूप से मृत नहीं हो जाता” — अर्थात् सहायक कंपनी को सक्रिय रखना, हिस्सेदार के हित में है।
- सुप्रीम कोर्ट ने अपने रूप में निर्णय दिया कि इस प्रकार के अंतरिम आदेश में हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा जब तक कि स्पष्ट कानून-उल्लंघन न हो।
(ii) BYJU’S के पक्ष एवं ऋणदाताओं का विरोध
- BYJU’S के ऋणदाताओं और RP ने तर्क दिया था कि BYJU’S की हिस्सेदारी को अचानक कम करना CIRP प्रक्रिया एवं ऋणदाताओं के हितों को प्रभावित करेगा — विशेष रूप से इस बात से कि BYJU’S के हिस्से से मिलने वाला हिस्सा कम हो जाएगा।
- दूसरी ओर, AESL ने तर्क दिया कि उसके व्यवसाय को फलने-फूलने के लिए तुरंत धन प्रवाह (capital infusion) की आवश्यकता थी — लगभग 3.7 लाख विद्यार्थियों और 10,000 कर्मचारियों के संचालन के लिए।
(iii) रणनीतिक और आर्थिक हिमायती बिंदु
- सहायक कंपनी की पूंजी वृद्धि द्वारा BYJU’S का स्वामित्व कम होगा — TLPL की हिस्सेदारी लगभग 25.75 % से घटकर 5 % से नीचे आ सकती है।
- लेकिन इस परिवर्तन का मतलब यह है कि AESL को स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की शक्ति मिलेगी, व्यवसाय की गति बनी रहेगी और BYJU’S के निवेश का मूल्य संरक्षित हो सकता है।
- ऋणदाताओं के लिए जोखिम यह है कि BYJU’S की हिस्सेदारी कम होने से उनकी वसूली की संभावना घट सकती है।
५. प्रमुख कानूनी बिंदु एवं आगे के प्रश्न
- यह मामला नाम मात्र BYJU’S-AESL का नहीं है, बल्कि इस तरह के समूह-कंपनियों (group companies) में सहायक कंपनियों की स्वतंत्रता व प्राथमिकता, तथा CIRP प्रक्रियाओं के अंतर्गत सहायक कंपनियों पर नियंत्रण-प्रश्न का भी है।
- सवाल यह उठता है कि यदि एक दिवालिया प्रक्रिया में मुख्य कंपनी है, तो उसकी सहायक कंपनियों पर कितना नियंत्रण हो सकता है — विशेष रूप से जब वे व्यावसायिक रूप से स्वस्थ हों।
- NCLAT ने यह स्पष्टीकरण दिया कि IBC इस प्रकार नहीं है कि वह स्व-सहायक कंपनियों को बंद करा दे। ये सहायक कंपनियाँ व्यापार-प्रवर्तक हो सकती हैं।
- आगे यह देखना होगा कि RP, ग्लास ट्रस्ट या अन्य ऋणदाताओं द्वारा मुकदमेबाजी जारी रखते हुए क्या प्रभाव दिखाते हैं, तथा BYJU’S CIRP में भागीदारों की वसूली की दिशा।
६. निष्कर्ष
इस निर्णय ने भारतीय कॉर्पोरेट-विधि के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम की है — जहाँ सहायक कंपनी की व्यवसाय-स्वतंत्रता, हिस्सेदार संरचना, और दिवालियापन प्रक्रियाओं का टकराव देखने को मिला है। सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार कर यह संकेत दिया कि सुव्यवस्थित सहायक कंपनी को संचालन जारी रखने का अवसर मिलना चाहिए और सिर्फ इसलिए कि मुख्य कंपनी CIRP में है, उसे बंद नहीं किया जाना चाहिए।
इससे BYJU’S-AESL समूह के लिए एक नया अध्याय खुलता है — जिसमें BYJU’S की हिस्सेदारी कम होगी, लेकिन AESL को अपनी राह चुनने की आजादी मिलेगी। वहीं, BYJU’S के ऋणदाताओं के लिए यह चुनौती बनी हुई है कि हिस्सेदारी कम होने पर उनकी वसूली का जोखिम बढ़ता है।
७. आगे क्या-क्या देखने योग्य होगा
- AESL द्वारा जारी होने वाला राइट्स इशू कैसे निष्पादित होता है, उसके समय-सीमा और औपचारिकता।
- BYJU’S CIRP में RP तथा क्रेडिटर्स की भूमिका कैसे विकसित करती है।
- BYJU’S हिस्सेदारी कम होने के बाद AESL के प्रबंधन एवं नियंत्रण में कौन-कौन से बदलाव होंगे।
- भारतीय कॉर्पोरेट एवं दिवालियापन विधि (IBC आदि) के अंतर्गत ऐसी सहायक कंपनियों के हितों और अधिकारों को लेकर भविष्य में क्या नए निर्णय आते हैं।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।