“कानून के छात्रों को न्यूनतम उपस्थिति की कमी के आधार पर परीक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता”: दिल्ली उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय
भूमिका
भारत में शिक्षा के क्षेत्र में उपस्थिति (attendance) को लेकर कड़े नियम हमेशा से रहे हैं, विशेषकर कानून (Law) जैसे व्यावसायिक कोर्सों में। बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा तय की गई न्यूनतम 70% उपस्थिति की शर्त लंबे समय से विवाद का विषय रही है। हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया है कि केवल न्यूनतम उपस्थिति की कमी के आधार पर किसी भी कानून छात्र को परीक्षा में बैठने से रोका नहीं जा सकता, बशर्ते कि उसके पास वास्तविक और उचित कारण हों। यह निर्णय न केवल छात्रों के अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि शिक्षा संस्थानों की प्रशासनिक सख्ती पर भी एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
मामले की पृष्ठभूमि (Background of the Case)
यह मामला दिल्ली विश्वविद्यालय (University of Delhi) और उसके अधीन आने वाले लॉ फैकल्टी के कुछ छात्रों से जुड़ा हुआ था। इन छात्रों की उपस्थिति BCI के नियमों के अनुसार निर्धारित 70% से कम थी, जिसके कारण विश्वविद्यालय प्रशासन ने उन्हें सेमेस्टर परीक्षा में शामिल होने की अनुमति नहीं दी।
छात्रों ने दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और कहा कि उनकी अनुपस्थिति के पीछे वाजिब कारण थे — जैसे कि स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, पारिवारिक दायित्व, या किसी अन्य वैध परिस्थिति के कारण। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें अपनी बात रखने का अवसर (opportunity of hearing) दिए बिना सीधे परीक्षा से वंचित करना उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।
मुख्य मुद्दा (Key Issue Before the Court)
अदालत के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि —
क्या किसी कानून के छात्र को केवल न्यूनतम उपस्थिति (minimum attendance) की कमी के आधार पर परीक्षा देने से रोका जा सकता है, जबकि उसकी अनुपस्थिति के पीछे वास्तविक कारण हों?
साथ ही यह भी प्रश्न था कि क्या विश्वविद्यालय को उपस्थिति नियमों के पालन में कुछ हद तक विवेकाधिकार (discretion) अपनाने का अधिकार है, या उसे यांत्रिक रूप से (mechanically) BCI के नियमों को लागू करना होगा?
दिल्ली उच्च न्यायालय का निर्णय (Delhi High Court’s Judgment)
न्यायमूर्ति चेतना सिंह (Justice C. Hari Shankar या संबंधित पीठ) की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल अनुशासन लागू करना नहीं, बल्कि छात्रों को न्यायसंगत अवसर प्रदान करना भी है।
अदालत ने कहा —
“न्यायसंगतता का सिद्धांत यह कहता है कि यदि कोई छात्र वास्तविक और उचित कारणों से कक्षाओं में उपस्थित नहीं हो पाया है, तो उसे परीक्षा से वंचित करना शिक्षा के उद्देश्य के विपरीत है।”
अदालत ने विश्वविद्यालयों को यह निर्देश भी दिए कि वे हर ऐसे मामले में जहां छात्र की उपस्थिति निर्धारित सीमा से कम है, एक उचित सुनवाई (fair hearing) प्रदान करें और उसकी स्थिति का मानवीय दृष्टिकोण (humanitarian consideration) से मूल्यांकन करें।
अदालत के मुख्य निर्देश (Key Directions Issued by the Court)
- न्यूनतम उपस्थिति नियम कठोर नहीं, लचीला होना चाहिए:
अदालत ने कहा कि BCI द्वारा निर्धारित उपस्थिति का नियम मार्गदर्शक है, बाध्यकारी नहीं। प्रत्येक संस्थान को छात्रों की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विवेकपूर्ण निर्णय लेना चाहिए। - उचित सुनवाई का अधिकार (Right to Fair Hearing):
किसी भी छात्र को परीक्षा से पहले सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है। यह न्याय के सिद्धांत (Principle of Natural Justice) का हिस्सा है। - विशेष परिस्थितियों में छूट (Exemption in Special Cases):
यदि छात्र की अनुपस्थिति बीमारी, पारिवारिक संकट, या किसी अन्य वास्तविक कारण से हुई है, तो उसे परीक्षा में बैठने की अनुमति दी जानी चाहिए। - शैक्षणिक संस्थानों की जिम्मेदारी (Institutional Responsibility):
विश्वविद्यालयों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि छात्रों को उपस्थिति संबंधी नियमों की जानकारी समय पर दी जाए और अनुपस्थिति की रिपोर्टिंग की एक पारदर्शी प्रक्रिया हो। - छात्रों की शिकायत निवारण प्रक्रिया (Grievance Redressal Mechanism):
अदालत ने सुझाव दिया कि विश्वविद्यालय अपने भीतर एक समिति गठित करें जो ऐसे मामलों की समीक्षा करे और निष्पक्ष निर्णय ले।
कानूनी और संवैधानिक पहलू (Legal and Constitutional Aspects)
यह फैसला भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (Article 14 – समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (Article 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) से गहराई से जुड़ा है।
- अनुच्छेद 14: यह सुनिश्चित करता है कि सभी व्यक्तियों को समान अवसर मिलें। यदि किसी छात्र को बिना उचित सुनवाई के परीक्षा से रोका जाता है, तो यह समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
- अनुच्छेद 21: शिक्षा को अब जीवन के अधिकार का एक हिस्सा माना जाता है। इसलिए शिक्षा प्राप्त करने के अवसर से वंचित करना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हो सकता है।
अदालत ने कहा कि शिक्षा प्रशासन को संवेदनशील और लचीला होना चाहिए, न कि केवल दंडात्मक।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियमों पर टिप्पणी
BCI नियमों के अनुसार, कानून के छात्रों को कम से कम 70% उपस्थिति अनिवार्य रूप से बनाए रखनी होती है। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि ये नियम “दिशानिर्देश” के रूप में हैं, न कि कठोर आदेश।
अदालत ने कहा —
“BCI का उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण विधिक शिक्षा को सुनिश्चित करना है, लेकिन यह उद्देश्य तभी पूरा होगा जब शिक्षा का माहौल मानवता और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित होगा।”
पूर्ववर्ती निर्णयों का संदर्भ (Reference to Earlier Judgments)
इस मामले में अदालत ने कुछ पूर्व के निर्णयों का भी उल्लेख किया, जैसे —
- Ashok Kumar v. University of Delhi (2018)
जिसमें अदालत ने कहा था कि विश्वविद्यालय को प्रत्येक मामले की अपनी परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेना चाहिए। - Ritika v. Guru Gobind Singh Indraprastha University (2021)
इस मामले में अदालत ने यह स्पष्ट किया था कि न्यूनतम उपस्थिति की कमी के कारण छात्रों को परीक्षा से वंचित करना तभी उचित है जब छात्रों को पहले चेतावनी दी गई हो और उन्हें अपनी बात रखने का अवसर दिया गया हो।
छात्रों और शिक्षा संस्थानों के लिए प्रभाव (Impact of the Judgment)
(क) छात्रों के लिए लाभ:
- छात्रों को अब यह अधिकार मिलेगा कि वे अपने वास्तविक कारण प्रस्तुत कर सकें।
- परीक्षा में शामिल होने का अवसर बिना अनुचित प्रतिबंध के मिलेगा।
- शिक्षा प्रणाली अधिक न्यायपूर्ण और सहानुभूतिपूर्ण बनेगी।
(ख) संस्थानों के लिए जिम्मेदारी:
- अब संस्थानों को हर छात्र के मामले की व्यक्तिगत समीक्षा करनी होगी।
- पारदर्शी और निष्पक्ष निर्णय प्रक्रिया अपनानी होगी।
- कठोर नीतियों के बजाय मानवीय दृष्टिकोण अपनाना पड़ेगा।
विश्लेषण (Analytical View)
यह निर्णय शिक्षा क्षेत्र में न्यायिक हस्तक्षेप का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। न्यायालय ने प्रशासनिक विवेक (administrative discretion) और छात्रों के अधिकारों के बीच एक संतुलन स्थापित किया है।
इस निर्णय से यह स्पष्ट संदेश जाता है कि शिक्षा केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि एक सामाजिक दायित्व भी है। यदि कोई छात्र बीमारी, मानसिक तनाव, या पारिवारिक संकट से जूझ रहा है, तो उसे शिक्षा से वंचित करना अमानवीय है।
निष्कर्ष (Conclusion)
दिल्ली उच्च न्यायालय का यह निर्णय शिक्षा और न्याय के क्षेत्र में एक मील का पत्थर (landmark judgment) साबित हुआ है। इसने न केवल कानून छात्रों के अधिकारों की रक्षा की है, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र को संवेदनशील बनने का संदेश दिया है।
अब विश्वविद्यालयों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उपस्थिति नियमों को लागू करते समय वे न्याय, समानता और करुणा के सिद्धांतों का पालन करें।
यह फैसला इस बात की याद दिलाता है कि शिक्षा का असली उद्देश्य केवल अनुशासन नहीं, बल्कि अवसर, समानता और संवेदना प्रदान करना है — क्योंकि हर छात्र को पढ़ने और अपने भविष्य को गढ़ने का समान अधिकार है।
🔹संक्षेप में:
“दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा — शिक्षा अनुशासन का नहीं, अवसर का विषय है। उपस्थिति की कमी शिक्षा के अधिकार पर रोक नहीं बन सकती।”