IndianLawNotes.com

“स्ट्री डॉग केस: Supreme Court of India द्वारा सरकारी कार्यालयों-एवं सार्वजनिक स्थानों पर आवारा कुत्तों को खिलाने संबंधी आदेश” 

“स्ट्री डॉग केस: Supreme Court of India द्वारा सरकारी कार्यालयों-एवं सार्वजनिक स्थानों पर आवारा कुत्तों को खिलाने संबंधी आदेश”


प्रस्तावना

भारत में आवारा (स्ट्री) कुत्तों की समस्या पिछले कई वर्षों से समाज-स्वास्थ्य, पशु कल्याण एवं सार्वजनिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से चर्चा में रही है। विशेष रूप से महानगरों में डॉग बाइट्स, राज्य में रेबीज़ (कुकुर बहरापन) के मामले, सड़कों पर कुत्तों की संख्या इत्यादि चिंताएँ खड़ी करती रही हैं। इस पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक नवीन आदेश जारी किया गया है, जिसमें सरकारी कार्यालयों एवं सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों को खिलाने (फीडिंग) के संबंध में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं।
यह आदेश केवल एक संख्या-व्यवस्थापन नहीं बल्कि पशु कल्याण, नगर व्यवस्था, नागरिक सुरक्षा तथा स्थानीय प्रशासन के समन्वय का विषय बन गया है।


पृष्ठभूमि

  • मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत में आवारा कुत्तों की संख्या बहुत अधिक है — एक सर्वे के अनुसार लगभग 5,25,00,000 (52.5 मिलियन) अनुमानित है।
  • शहरों में डॉग बाइट्स के मामले बढ़ रहे हैं। उदाहरण के लिए, दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में ऐसी घटनाओं की संख्या चिंताजनक स्तर पर थी।
  • इससे जुड़ी कानूनी व्यवस्था में प्रमुख हैं: Animal Birth Control (Free‑Ranging Dogs) Rules, 2023 (एबीसी नियम) जिसमें नसबंदी (स्टीरिलाइज़ेशन), टीकाकरण तथा पुनर्स्थापन (रिलीज़) की व्यवस्था है।
  • कुछ उच्च न्यायालयों ने सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों को खिलाने पर प्रतिबंध लगाने की दिशा में निर्देश दिए थे, लेकिन उनमें विविधता और असंगति थी।

इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट के सामने यह तथ्य था कि आवारा कुत्तों की समस्या सिर्फ पशु-कल्याण तक सीमित नहीं थी, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, नगर-स्वच्छता, नागरिक सुरक्षा एवं स्थानीय प्रशासन की क्षमता से जुड़ी थी।


आदेश का प्रमुख भाग

सुप्रीम कोर्ट ने (विशेष तीन-न्यायाधीशीय बेंच: जस्टिस Vikram Nath, जस्टिस Sandeep Mehta एवं जस्टिस N.V. Anjaria) निम्न-लिखित मुख्य निर्देश दिए हैं:

  1. सार्वजनिक स्थानों में किसी भी हालत में आवारा कुत्तों को खुल्लम-खुल्ला खिलाना (फीड करना) अनुमित नहीं होगा।
  2. प्रत्येक नगर निगम वार्ड में विशिष्ट (डेडिकेटेड) फीडिंग स्पेस बनाए जाने होंगे जहाँ कुत्तों को खिलाना अनुमित होगा। इन स्थानों को चिन्हित एवं सूचना-पाटी (नो­tिस बोर्ड) द्वारा दर्शाना होगा।
  3. जिसे भी इन निर्देशों का उल्लंघन पाया जाएगा—जैसे कि सड़कों, फुटपाथों या सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों को खिलाना—उसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
  4. जिन कुत्तों को पकड़ा गया है, उन्हें नसबंदी (स्टीरिलाइज़ेशन), टीकाकरण, डीडूर्मिंग (कीड़ों की सफाई) आदि उपचार के बाद उनके प्रारंभिक स्थान पर पुनर्स्थापित (रिलीज) किया जाएगा, सिवाय उन कुत्तों के जो रेबीज़ हैं या आक्रामक व्यवहार प्रदर्शित करते हैं।
  5. इस आदेश को केवल दिल्ली-एनसीआर तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि पूरे भारत में लागू करने हेतु निर्देश दिए गए हैं। सभी राज्य एवं केन्द्रशासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को नोटिस जारी किया गया है।
  6. जिन एनजीओ एवं व्यक्ति-पेटिशनर्स ने याचिका दायर की हैं, उन्हें कुछ टोकन राशि जमा करनी होगी (व्यक्ति ₹25,000, एनजीओ ₹2,00,000) ताकि आगे की सुनवाई में भाग ले सकें और ये राशि कुत्ता कल्याण तथा इन्फ्रास्ट्रक्चर हेतु प्रयोग होगी।

सरकारी कार्यालयों-संबंधी प्रावधान

विशेष रूप से यह आदेश सरकारी कार्यालय परिसरों, सार्वजनिक भवनों एवं उनके परिसर में भी लागू माना जाना चाहिए क्योंकि सार्वजनिक स्थानों में खिलाने पर प्रतिबंध लगा है। यदि किसी कार्यालय परिसर में आवारा कुत्तों को नियमित रूप से बाहर छोड़ा जाता है या कर्मचारी/जनता द्वारा फीड किया जाता है, तो वह इस आदेश के अंतर्गत समस्या खड़ी कर सकता है।
उदाहरण के रूप में, मीडिया रिपोर्ट में यह उल्लेख है कि Supreme Court of India के परिसर में भी कुत्तों की संख्या में वृद्धि देखने को मिली थी, जिसके चलते उन्होंने परिसर में छिते-फिरे खाने के अवशेष को समय-समय पर कवरड डस्टबिन में डालने का निर्देश दिया था।
इसलिए सरकारी कार्यालयों को निम्न बिंदुओं पर ध्यान देना होगा:

  • कार्यालय परिसर में कुत्तों को खिलाना या उन्हें भोजन देने के लिए खुले स्थानों का उपयोग करना उस नियम के विरुद्ध होगा।
  • यदि परिसर में फीडिंग क्षेत्र (निकटत्र वितरित आवारा कुत्तों हेतु) बनाया गया है, तो केवल उसी में खाना देना संभव होगा।
  • कार्यालयों को सुनिश्चित करना होगा कि परिसर के भोजन-अवशेष स्वच्छता एवं बंद डस्टबिन में डाले जाएँ ताकि कुत्तों का आकर्षण न बने।
  • कर्मचारी एवं आगंतुकों को आदेश से अवगत कराया जाना चाहिए कि सार्वजनिक-संचारित स्थानों पर फीडिंग निषिद्ध है।

कारण-प्रभाव एवं विश्लेषण

कारण

  • सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों को खिलाना यदि अनियंत्रित तरीके से होता है, तो फुटपाथ, मार्ग, पार्क आदि में कुत्तों का जमावड़ा, फेफड़ों एवं अन्य स्वास्थ्य-खतरे (जैसे रेबीज़) उत्पन्न हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने खुल्ले रूप से कहा कि “अविनियमित फीडिंग” आम नागरिकों के चलते बहुत कठिनाई उत्पन्न करती है।
  • उच्च संख्या में डॉग बाइट्स तथा रेबीज़ के मामले, विशेषकर बच्चों एवं वयस्कों में, प्रशासन के लिए खतरा थे।
  • पशु कल्याण दृष्टिकोण से भी ‘पकड़कर-कुत्तों को संपूर्ण रूप से आश्रय में रखना’ (जहाँ पुनर्स्थापन न हो) संभव नहीं था क्योंकि शेल्टर-इन्फ्रास्ट्रक्चर बहुत कम था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने आदेश को “बहुत कठोर” करार दिया था।

प्रभाव

  • इस आदेश से आम नागरिकों के लिए यह स्पष्ट हो गया कि सार्वजनिक स्थानों पर आवारा कुत्तों को खिलाना स्वतंत्र रूप से नहीं किया जाना चाहिए बल्कि एक व्यवस्थित एवं चिन्हित ढांचे के भीतर होना चाहिए।
  • स्थानीय नगर निगम एवं निगम-वार्ड प्रशासन को कुत्तों के फीडिंग-स्पॉट्स निर्धारित करने का दायित्व दिया गया है, जिससे प्रशासन-पारदर्शिता बढ़ेगी।
  • कुत्तों के नसबंदी-टीकाकरण कार्यक्रम को व्यवस्था-बद्ध तरीके से लागू करने की दिशा में बढ़ावा मिलेगा।
  • लेकिन विवाद भी बढ़ा — पशु-अधिकारियों तथा नागरिकों के बीच इस बात पर मतभेद है कि क्या पूरी तरह से सार्वजनिक फीडिंग प्रतिबंधित होनी चाहिए, और किस तरह की फीडिंग अनुमति योग्य है।

विवाद एवं चुनौतियाँ

  • पशु कल्याण संस्थाएँ इस बात पर चिंतित थीं कि सार्वजनिक-फीडिंग पर पूर्ण प्रतिबंध कुत्तों के कल्याण के प्रति प्रतिकूल हो सकता है। उन्होंने कहा कि प्यार से खाना देना समाज-संबंध का हिस्सा है और इस पर अड़ना पशुओं को हानि पहुँचा सकता है।
  • स्थानीय प्रशासन के पास पर्याप्त शेल्टर-घर, नसबंदी-टीके का संसाधन, वाहन आदि नहीं थे, इसलिए आदेश के व्यवहार्यता (feasibility) पर सवाल उठे थे।
  • “आक्रामक कुत्ते” या “रेबीज़ कुत्ते” की पहचान कैसे होगी, इस बात पर अस्पष्टता बनी हुई है।
  • कार्यालय एवं सार्वजनिक भवनों में अव्यवस्था बनी रह सकती है — यदि फैक्टर की जाए कि भोजन-अवशेष खुले में पड़े हों, तो कुत्तों का आकर्षण बना रहेगा।
  • नागरिकों का सहयोग और जागरूकता आवश्यक है — केवल आदेश पर्याप्त नहीं; उसे लोक-स्तर पर स्वीकार्य बनाने के लिए प्रशिक्षण, जागरूकता अभियान एवं निगरानी जरूरी है।

आगे की दिशा एवं सुझाव

  1. कार्यक्रम-योजना एवं बजट निर्धारण: प्रत्येक नगर निगम को वार्ड-वार feeding-zone निर्धारण करना चाहिए, फीडिंग स्पॉट्स की संख्या, चिन्हकरण, सूचना-पाटी, एवम् निगरानी व्यवस्था स्थापित करनी चाहिए। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में 80 वॉर्ड्स में 292 फीडिंग प्वाइंट निर्धारित किए गए थे।
  2. नसबंदी-टीकाकरण अभियान को सक्रिय रूप से चलाया जाना चाहिए ताकि आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित हो और रेबीज़ का खतरा घटे।
  3. शिक्षा एवं जागरूकता: सरकारी कार्यालयों, स्कूल-कॉलेज, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में इस आदेश के बारे में सूचना प्रदत्त होनी चाहिए, तथा कर्मचारी-जनता को यह बताया जाना चाहिए कि सार्वजनिक स्थानों पर खिलाना क्यों प्रतिबंधित है।
  4. मॉनिटरिंग एवं रिपोर्टिंग: feeding-zones के उपयोग, उल्लंघनों, कुत्तों की स्थिति आदि का डेटा संकलित होना चाहिए और समय-समय पर समीक्षा-रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट या राज्य/नगर प्रशासन को प्रस्तुत होनी चाहिए।
  5. सहयोग-मॉडल: नागरिक-संघ-एनजीओ मिलकर “फीडिंग स्पॉट मैनेजमेंट” कर सकते हैं – जहाँ भोजन वितरण के समय-निर्धारण, स्वच्छता, पशु निरीक्षण आदि को सुनिश्चित किया जाए।
  6. कार्यालय परिसर-विशिष्ट प्रावधान: सरकारी एवं गैर-सरकारी कार्यालय परिसर में भोजन-अवशेष तुरंत कवरड डस्टबिन में डालने, खाद्य वितरण क्षेत्र सीमित करने, अव्यवस्था न होने देने जैसे कदम उठाने चाहिए (जैसा सुप्रीम कोर्ट के स्वयं कार्यालय में निर्देश मिला था)।

निष्कर्ष

यह आदेश इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि इसने आवारा कुत्तों के मामले को सिर्फ “समस्या” मानकर हटाने के बजाय समुपयुक्त प्रबंधन-मॉडल के रूप में देखा है — जिसमें सार्वजनिक सुरक्षा, पशु कल्याण, नगरपालिका व्यवस्था एवं नागरिक सहभागिता का समन्वय है।
सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक स्थानों पर इस आदेश का अनुपालन समय-सापेक्ष और सतर्कतापूर्वक होना चाहिए, ताकि अधिनियमित दिशा-निर्देश वास्तव में लागू हों और समाज-पारिस्थितिक संतुलन बना रहे।