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“केवल व्हाट्सएप संदेश से नोटिस नहीं माना जा सकता वैध सेवा : सर्वोच्च न्यायालय”

“Supreme Court Refuses To Accept Service Of Notice Through WhatsApp”


प्रस्तावना

डिजिटल युग में सूचना-प्रेषण परंपरागत तरीकों से बदल रही है—ई-मेल, मैसेजिंग ऐप्स, वॉट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म कानूनी संवाद का हिस्सा बनते जा रहे हैं। परंतु यही प्रश्न उठता है कि जब व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गिरफ्तारी, पूछताछ या कार्रवाई का सवाल हो—क्या सिर्फ सुविधा-के कारण सूचना या नोटिस को डिजिटल माध्यम से देना उचित है? हाल ही में Supreme Court of India ने एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है कि पुलिस अथवा जांच एजेंसियाँ Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 (BNSS), 2023 की धारा 35 या Code of Criminal Procedure, 1973 (CrPC) की धारा 41-A के तहत नोटिस सेवा (service of notice) के लिए मात्र वॉट्सऐप या अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का प्रयोग नहीं कर सकतीं।

यह निर्णय हमारे न्यायप्रक्रिया-व्यवस्था में सूचना-प्रदाता, प्रक्रिया-उचितता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता-सुरक्षा के बीच संतुलन के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण संकेत है। इस लेख में हम इस निर्णय का तथ्य-पृष्ठभूमि, संवैधानिक आधार, प्रभाव, चुनौतियाँ एवं आगे की दिशा-निर्देशों का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।


निर्णय की पृष्ठभूमि एवं तथ्य

  • राज्य एवं यूनियन-टेरीटरी पुलिस विभागों द्वारा अनेक मामलों में ऐसे नोटिस जारी किए गए थे जिनमें आरोपी/संशयित व्यक्तियों को वॉट्सऐप मैसेज द्वारा रिपोर्टिंग के लिए कहा गया था।
  • विशेष रूप से, राज्य हरियाणा ने पुलिस को निर्देश दिए थे कि धारा 41-A CrPC अथवा धारा 35 BNSS के अंतर्गत यह नोटिस “व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम (वॉट्सऐप, ई-मेल, एसएमएस) द्वारा” भी सेवा किया जा सकता है।
  • सुप्रीम कोर्ट द्वारा 21 जनवरी 2025 के आदेश में स्पष्ट किया गया कि इन धारणाओं को स्वीकार नहीं किया जा सकता: “यह स्पष्ट किया जाता है कि वॉट्सऐप या अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के द्वारा नोटिस सेवा किए जाने को CrPC या BNSS द्वारा मान्यता प्राप्त सेवा-माध्यम के रूप में नहीं माना जा सकता।”
  • बाद में, जुलाई 2025 में एक निर्णय में इस पथ को पुष्ट किया गया कि BNSS धारा 35 के तहत नोटिस सेवा हेतु केवल विधि द्वारा निर्धारित सेवा-माध्यम ही मान्य होंगे; वॉट्सऐप या किसी अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यम को वैकल्पिक रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

इस तरह स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस तथा जांच एजेंसियों को निर्देश दिया है कि वे डिजिटल-सुविधा के नाम पर सेवा-प्रक्रिया के मापदंडों का दुरुपयोग नहीं करें, क्योंकि सेवा-प्रक्रिया सीधे व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Article 21) से जुड़ी है।


संवैधानिक एवं न्यायशास्त्रीय आधार

व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Article 21)

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है कि “कोई व्यक्ति अपनी जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा, सिवाय विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार।” अर्थात्, यदि किसी को नोटिस जारी किया गया है, उसे बुलाया गया है; वह तभी निष्पक्ष माना जाएगा जब सेवा-प्रक्रिया विधि-सम्मत हो। सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय में कहा कि सेवा-प्रक्रिया का माध्यम महत्वपूर्ण है क्योंकि सेवा न हुई हो या विधि-अनुपालन न हुआ हो तो व्यक्ति को अपनी प्रतिरक्षा (defence) का अवसर नहीं मिल पाता—यह स्वतंत्रता का उल्लंघन है।

विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया (due process)

सेवा-प्रक्रिया कोई मात्र औपचारिकता नहीं है, बल्कि प्रक्रिया-न्याय (procedural fairness) का अंग है। न्यायालय के दृष्टिकोण में, जब कानून किसी विशेष सेवा-माध्यम को निर्दिष्ट करता है (उदाहरण-स्वरूप CrPC अथवा BNSS में), तो उस प्रक्रिया से विचलन नहीं किया जा सकता। इस निर्णय में कोर्ट ने यह सूत्र दिया है कि “जिस प्रक्रिया का विधान नहीं करता, उसे मान लेना विधि-द्वारा स्थापित प्रक्रिया का उल्लंघन होगा।”

सेवा-माध्यम की वैधता एवं प्रमाण-शक्ति

जैसा कि शोध-लेखों में बताया गया है, वॉट्सऐप या अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से संदेश भेजना तकनीकी रूप से आसान है, पर यह सुनिश्चित करना कठिन है कि प्राप्तकर्ता ने उसे वास्तव में देखा, स्वीकार किया या उस पर प्रतिक्रिया दी। नोटिस सेवा-माध्यम के लिए यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि प्राप्तकर्ता को-और उसके द्वारा स्वीकार किया गया हो। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई है कि वॉट्सऐप सेवा के माध्यम से इस प्रमाण-शक्ति को विश्वसनीय रूप से साबित करना हमेशा संभव नहीं है।


निर्णय के प्रमुख बिंदु

  • नोटिसें जो धारा 41-A CrPC अथवा धारा 35 BNSS के अंतर्गत जारी की जाती हैं, उन्हें केवल उन्हीं सेवा-माध्यमों द्वारा सेवा किया जाना चाहिए जो कानून द्वारा निर्दिष्ट हैं। वॉट्सऐप या अन्य सामान्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यम को वैकल्पिक या प्रतिस्थापन रूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता।
  • सेवा-प्रक्रिया व्यक्तिगत सेवा (personal service) का स्वरूप हो सकती है—जिसमें नोटिस प्राधिकृत व्यक्ति (उदाहरण-स्वरूप जाँच अधिकारी, पुलिस) द्वारा प्रत्यक्ष तौर पर व्यक्ति को दी जाती है (या अन्य विधिगत विकल्प)। डिजिटल माध्यमों पर निर्भरता स्वचालित रूप से सक्षम नहीं है।
  • इस दिशा में प्रत्येक राज्य/यूटी कोStanding Order जारी करना होगा, जिससे पुलिस विभाग यह सुनिश्चित करें कि धारा-41A/35 के अंतर्गत नोटिस सेवा के लिए वॉट्सऐप आदि का प्रयोग न करें।
  • कानून में जहाँ खास रूप से इलेक्ट्रॉनिक माध्यम को स्वीकार किया गया हो (उदाहरण-स्वरूप सुनवाई, अर्जी स्वीकृति, दस्तावेज़-आवेदन आदि) वहाँ संभव है; लेकिन सेवा-नोटिस जैसी कार्रवाई में यह स्वतः मान्य नहीं हो सकती। कोर्ट ने BNSS की धारा 530 का हवाला देते हुए कहा कि वहाँ सुनवाई-प्रक्रिया के लिए इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का उपयोग संभव है, पर नोटिस सेवा के लिए धारा 35 में स्पष्ट अनुमति नहीं है।

इस निर्णय का महत्व

यह निर्णय निम्नलिखित दृष्टियों से महत्वपूर्ण है:

  1. न्याय-प्रक्रिया में पारदर्शिता: व्यक्तिगत को नोटिस देना, सेवा हुए होने का प्रमाण सुनिश्चित करना—यह सुनिश्चित करता है कि गिरफ्तारी या पूछताछ केवल सूचना-अभाव से नहीं हो जाए।
  2. प्रशासनिक जवाबदेही: पुलिस या जांच एजेंसियों को डिजिटल सुविधा के नाम पर तेज निर्णय लेने की बजाय विधि-अनुपालन का ध्यान रखना होगा।
  3. डिजिटल-सुविधा पर नियंत्रण: जबकि आधुनिक युग में डिजिटल माध्यमों का उपयोग बढ़ा है, परंतु यह निर्णय यह स्पष्ट करता है कि सुविधा-कारण से संवैधानिक एवं विधिगत सुरक्षा का दायित्व समाप्त नहीं हो जाता।
  4. भविष्य-दिशा-निर्देश: यह निर्णय भविष्य में सेवा-प्रक्रिया एवं डिजिटल-माध्यमों की सीमा-रेखाओं को निर्धारित करेगा—यह बताता है कि कौन-सी स्थिति में डिजिटल सेवा स्वीकार्य हो सकती है, और कब नहीं।

चुनौतियाँ एवं विवाद-बिंदु

हालाँकि यह निर्णय एक स्पष्ट निर्देशक प्रदान करता है, फिर भी निम्नलिखित चुनौतियाँ मौजूद हैं:

  • तकनीकी वास्तविकता: बहुत से मामलों में पुलिस अथवा अभियोजन को पता नहीं होता कि व्यक्ति का पता सही है अथवा वह लगातार मौजूद है; वहाँ डिजिटल सेवा-माध्यम सहज विकल्प हो सकते हैं। परंतु इसकी विधिगत अनुमति नहीं है।
  • प्रयोगात्मक विविधता: पिछले कुछ मामलों में अन्य न्यायालयों ने वॉट्सऐप सेवा को स्वीकार किया है (अर्बिट्रेशन या सिविल मामलों में) जहाँ किसी व्यक्ति के पते पर पहुंचना मुश्किल था। इससे सेवा-माध्यम की विधिगत सीमा और परिस्थितियों में लचीलापन मांगता है।
  • प्रमाण-दाखिला (evidence) समस्या: डिजिटल मैसेजेज़ के प्रमाण के रूप में स्वीकार्यता, उसके सही-व्यक्ति द्वारा स्वीकार किए जाने की पुष्टि, और संदेश को देखा-जाने का ट्रैक रखना, काफी विवादित हो सकता है।
  • न्यायालयों में समरूपता नहीं: विभिन्न उच्च न्यायालयों में डिजिटल सेवा-माध्यम पर दृष्टिकोण अलग-अलग रहा है, जिससे एकरूपता की कमी है।
  • आगे की प्रवृत्ति: इस निर्णय के बाद digital-only व्यवस्था की मांग होगी—क्या भविष्य में संसद या राज्य विधानसभाएँ सेवा-माध्यम के लिए विशेष नियम बनाएँगे? यदि हाँ, तो कब और कैसे?

आगे की दिशा एवं सुझाव

  • राज्य-सरकारों और पुलिस विभागों को तुरंत Stand ing Orders जारी करनी चाहिये जिसमें स्पष्ट लिखा हो कि धारा 41-A CrPC / धारा 35 BNSS के अंतर्गत नोटिस सेवा के लिए वॉट्सऐप/ई-मेल/एसएमएस नहीं पाए जाएंगे।
  • ऐसी परिस्थितियों में जहाँ व्यक्ति पता नहीं दे रहा हो या उपलब्ध नहीं हो रहा हो—तो विधि द्वारा स्वीकृत विकल्पों (जैसे हस्तलिखित नोटिस, पोस्ट-डिलीवरी, प्रत्यक्ष सेवा) का प्रयोग हो और डिजिटल सेवा के विकल्प पर विचार तभी हो जब विधि-प्रावधान में विशेष अनुमति हो।
  • पुलिस एवं अभियोजन अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए कि सेवा-प्रक्रिया का महत्त्व क्या है, व कोर्ट द्वारा पारित निर्देशों का अनुपालन कैसे सुनिश्चित किया जाए।
  • न्यायालयों द्वारा भविष्य में डिजिटल सेवा-माध्यम को स्वीकार्य बनाने हेतु स्पष्ट मानदंड विकसित किए जाएँ — उदाहरण-स्वरूप: व्यक्ति की सहमति, संदेश डिलीवर ट्रैक, वेरीफाइड नंबर, रिकॉर्डिंग आदि।
  • समाज एवं विपक्ष को इस विषय पर जागरूक किया जाना चाहिए कि डिजिटल सेवा-माध्यम के प्रयोग से स्वतंत्रता-सुरक्षा के पक्ष में क्या-क्या जोखिम हो सकते हैं।

निष्कर्ष

डिजिटल युग में सुविधा हासिल करना अनिवार्य हो रहा है, लेकिन सुविधा-कारण सिर्फ इसलिए संवैधानिक और विधिगत सुरक्षा की परवाह न छोड़े। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इसे स्पष्ट करता है कि नोटिस-सेवा जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में सिर्फ वॉट्सऐप अथवा अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का इस्तेमाल स्वचालित रूप से वैध नहीं माना जाएगा। सेवा-प्रक्रिया एक ऐसा पिलर है जिस पर व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं न्याय-उपलब्धि आधारित है। इसलिए सुविधा और प्रक्रिया-न्याय के बीच संतुलन तय करना अत्यंत आवश्यक है।