“Asst. Commissioner of Income Tax v. State & Ors (Supreme Court of India, 2025): Defrauded Money Is Not Taxable Income but Proceeds of Crime Under PMLA, 2002”
(धोखाधड़ी से प्राप्त धन आय नहीं, अपराध से अर्जित संपत्ति है – सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय)
प्रस्तावना
भारतीय कर व्यवस्था और आपराधिक न्याय प्रणाली के बीच एक महत्वपूर्ण सवाल हमेशा बना रहा है — क्या धोखाधड़ी या अवैध तरीकों से प्राप्त धन (defrauded money) को “आय” (income) के रूप में कर योग्य माना जा सकता है?
इस प्रश्न का उत्तर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने अपने ऐतिहासिक निर्णय “Asst. Commissioner of Income Tax v. State & Ors” (2025) में दिया, जिसमें न्यायालय ने कहा:
“Defrauded money cannot be treated as taxable income of a company or its director. Such money constitutes proceeds of crime under the Prevention of Money Laundering Act, 2002 (PMLA).”
यह निर्णय भारत में tax law और criminal law के बीच संतुलन की एक मिसाल है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्य कर वसूली के नाम पर ऐसे धन को वैध नहीं बना सकता जो आपराधिक कृत्य के परिणामस्वरूप अर्जित किया गया हो।
मामले की पृष्ठभूमि (Background of the Case)
मामला एक ऐसी कंपनी से संबंधित था जिस पर आरोप था कि उसने निवेशकों से बड़ी राशि धोखे से प्राप्त की और उसे कंपनी खातों में जमा किया।
बाद में Income Tax Department ने इस राशि को “undisclosed income” मानते हुए उस पर Income Tax Act, 1961 के तहत कर और दंड लगाने का आदेश जारी किया।
इसी बीच Enforcement Directorate (ED) ने इस कंपनी और उसके निदेशकों के खिलाफ Prevention of Money Laundering Act, 2002 (PMLA) के तहत मामला दर्ज किया, यह कहते हुए कि उक्त धन “proceeds of crime” है।
कंपनी ने दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की कि यह धन उनकी आय नहीं है, बल्कि धोखाधड़ी का परिणाम है, इसलिए उस पर कर नहीं लगाया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कंपनी के पक्ष में फैसला देते हुए कहा कि —
धोखाधड़ी से प्राप्त राशि आय नहीं बल्कि अपराध से अर्जित संपत्ति है।
इसके खिलाफ Assistant Commissioner of Income Tax (ACIT) ने Supreme Court में अपील दायर की।
मुख्य प्रश्न (Key Legal Issues)
- क्या धोखाधड़ी से प्राप्त राशि को “income” माना जा सकता है?
- क्या ऐसी राशि पर Income Tax Department कर लगा सकता है?
- क्या ऐसी राशि को PMLA, 2002 के तहत “proceeds of crime” माना जाएगा?
- क्या एक ही राशि पर दो अलग-अलग कानून (Income Tax Act और PMLA) एक साथ लागू हो सकते हैं?
Appellant (ACIT) के तर्क
- “Income” की व्यापक परिभाषा:
आयकर अधिनियम की धारा 2(24) के तहत “income” की परिभाषा अत्यंत व्यापक है। किसी भी रूप में प्राप्त धन — चाहे वैध या अवैध — को आय माना जा सकता है। - कर कानून का उद्देश्य राजस्व संग्रह:
विभाग ने कहा कि कराधान का उद्देश्य केवल यह देखना है कि धन किसी व्यक्ति को प्राप्त हुआ या नहीं; यह देखना कि धन कानूनी रूप से अर्जित हुआ या नहीं, कराधान का विषय नहीं है। - आपराधिक मुकदमे का प्रभाव नहीं:
यह तर्क दिया गया कि भले ही ED ने PMLA के तहत कार्रवाई की हो, परंतु इससे कर विभाग के कराधान अधिकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। - राजस्व का संरक्षण:
यदि धोखाधड़ी से अर्जित धन पर कर नहीं लगाया गया तो सरकार को भारी राजस्व हानि होगी।
Respondents (State & Company) के तर्क
- धन का स्रोत अवैध:
कंपनी ने कहा कि यह धन वैध व्यापारिक गतिविधि से अर्जित नहीं हुआ, बल्कि धोखाधड़ी (fraud) से प्राप्त हुआ है। इसलिए इसे “income” नहीं कहा जा सकता। - PMLA की प्राथमिकता:
एक बार जब किसी धन को “proceeds of crime” घोषित कर दिया जाता है, तो वह आय नहीं रह जाता। उस पर कर लगाना अपराध की आय को वैध ठहराने जैसा होगा। - Constitutional Morality:
राज्य को ऐसे अवैध लाभ को कराधान के माध्यम से वैध ठहराने की अनुमति नहीं दी जा सकती; यह संविधान की नैतिकता के विपरीत है। - कानूनों का समन्वय:
Income Tax Act और PMLA के उद्देश्य अलग हैं — एक राजस्व संग्रह के लिए है, जबकि दूसरा अपराध से अर्जित धन को रोकने के लिए। इसलिए दोनों को मिलाकर नहीं देखा जा सकता।
दिल्ली उच्च न्यायालय का निर्णय (Delhi High Court Judgment)
दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि:
“Defrauded or misappropriated money cannot be classified as ‘income’ under the Income Tax Act. Such money belongs to the victims of fraud and remains an asset illegally held by the accused.”
हाईकोर्ट ने माना कि आय की बुनियादी शर्त यह है कि वह धन व्यक्ति का कानूनी रूप से अर्जित और वास्तविक नियंत्रण में होना चाहिए।
धोखाधड़ी से प्राप्त धन ऐसा नहीं होता, क्योंकि वह कभी वैध स्वामित्व में नहीं आता।
सुप्रीम कोर्ट में अपील
Income Tax Department ने इस निर्णय के खिलाफ Supreme Court of India में अपील की।
सुप्रीम कोर्ट ने यह प्रश्न उठाया कि —
“क्या राज्य ऐसे धन पर कर लगा सकता है जो मूल रूप से अपराध से प्राप्त हुआ हो?”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय (Supreme Court’s Judgment)
सुप्रीम कोर्ट की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को पूर्ण रूप से बरकरार रखा और कहा कि:
“Money obtained through fraud, embezzlement, or criminal breach of trust is not taxable income. Such money constitutes proceeds of crime under the PMLA and must be confiscated, not taxed.”
मुख्य आधार (Key Reasoning):
- “Income” का अर्थ वैध अर्जन है:
न्यायालय ने कहा कि आय का अर्थ है — वह धन जो व्यक्ति के पास वैध रूप से अर्जित और कानूनी रूप से स्वामित्व में हो।
धोखाधड़ी या अपराध से प्राप्त धन पर ऐसा अधिकार नहीं होता। - Taxing crime legitimizes it:
यदि सरकार अपराध की आय पर कर लगाएगी, तो यह अप्रत्यक्ष रूप से उस अपराध को वैधता देने जैसा होगा। - PMLA का उद्देश्य:
PMLA, 2002 का उद्देश्य ही है अपराध से अर्जित संपत्ति की पहचान, जब्ती और नष्ट करना। इसलिए ऐसा धन “proceeds of crime” माना जाएगा। - “Possession” vs “Ownership”:
न्यायालय ने कहा कि मात्र धन के पास होना (possession) उसे “income” नहीं बनाता।
आय के लिए व्यक्ति को उस पर कानूनी स्वामित्व (ownership) होना चाहिए। - Double Jeopardy का खतरा:
यदि कर विभाग और ED दोनों एक ही धन पर कार्रवाई करेंगे, तो यह दोहरे दंड (double jeopardy) जैसा होगा।
न्यायालय के अवलोकन (Judicial Observations)
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:
“In a civilised society governed by rule of law, the State cannot derive revenue from illegality. The proceeds of crime must return to the victims, not to the exchequer.”
न्यायालय ने कहा कि कर विभाग का दायित्व केवल वैध आय पर कर वसूलना है, न कि अवैध धन को राजस्व का स्रोत बनाना।
संविधानिक परिप्रेक्ष्य (Constitutional Perspective)
- Article 265 – No tax without authority of law:
केवल उसी धन पर कर लगाया जा सकता है जो कानून के अनुरूप प्राप्त हो। अपराध से अर्जित धन इस प्रावधान के बाहर है। - Article 300A – Right to property:
अपराध से प्राप्त धन किसी व्यक्ति की वैध संपत्ति नहीं है, इसलिए राज्य उसे जब्त कर सकता है। - Rule of Law and Constitutional Morality:
राज्य की नैतिक जिम्मेदारी है कि वह अवैध धन पर लाभ प्राप्त न करे।
Precedents Referred
- CIT v. Piara Singh (1980) 124 ITR 40 (SC):
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अवैध व्यापार से हुई आय भी कर योग्य हो सकती है यदि वह व्यक्ति की वास्तविक आय बन चुकी हो।
परंतु वर्तमान मामले में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि fraudulent income में यह स्थिति नहीं है। - Kishanchand Chellaram v. CIT (1980) 125 ITR 713 (SC):
न्यायालय ने कहा कि कराधान का विषय केवल वह धन हो सकता है जो वास्तव में व्यक्ति का हो। - State of Gujarat v. Mohanlal Jitamalji Porwal (1987) 2 SCC 364:
अदालत ने कहा कि अपराध से अर्जित धन सार्वजनिक नीति के विरुद्ध है।
निर्णय के प्रभाव (Implications of the Judgment)
- PMLA की शक्ति में वृद्धि:
यह निर्णय Enforcement Directorate की स्थिति को मजबूत करता है, क्योंकि अब ऐसे मामलों में ED को प्राथमिक अधिकार प्राप्त होगा। - Income Tax Department की सीमाएँ स्पष्ट:
विभाग अब ऐसे अवैध धन पर कर नहीं लगा सकेगा जो धोखाधड़ी या अपराध का परिणाम हो। - राज्य की नैतिकता को बल:
निर्णय से स्पष्ट हुआ कि राजस्व संग्रह का उद्देश्य नैतिक सीमाओं से परे नहीं जा सकता। - Financial Crimes के लिए स्पष्ट मार्गदर्शन:
भविष्य में वित्तीय धोखाधड़ी, घोटालों और फर्जी निवेश योजनाओं के मामलों में यह निर्णय मिसाल के रूप में लागू होगा।
सामाजिक और कानूनी विश्लेषण (Socio-Legal Analysis)
यह निर्णय भारत की न्यायिक प्रणाली के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह यह सुनिश्चित करता है कि राज्य अपराध से लाभ नहीं उठा सकता।
जहाँ कर विभाग राजस्व की दृष्टि से सोचता है, वहीं न्यायालय ने इसे नैतिक और संवैधानिक दृष्टि से देखा।
यह निर्णय rule of law के सिद्धांत को पुनः स्थापित करता है —
कि कानून का पालन केवल नागरिकों से नहीं, बल्कि राज्य से भी अपेक्षित है।
निष्कर्ष (Conclusion)
Asst. Commissioner of Income Tax v. State & Ors (2025) का निर्णय भारतीय विधि प्रणाली के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है।
इसने यह स्पष्ट कर दिया कि –
“राज्य अपराध की आय पर कर नहीं लगा सकता; ऐसा करना न्याय और नैतिकता दोनों के विरुद्ध होगा।”
यह फैसला न केवल PMLA, 2002 की संवैधानिक व्याख्या को मजबूत करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि Taxation System कभी अपराध को वैधता प्रदान करने का माध्यम न बने।
इस निर्णय के बाद यह सिद्धांत स्थापित हो गया है कि —
धोखाधड़ी से अर्जित धन “आय” नहीं, बल्कि “अपराध की आय (proceeds of crime)” है,
और उसे जब्त किया जाना चाहिए, न कि उस पर कर लगाया जाए।