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आपराधिक विधि में पागलपन (Insanity) की अवधारणा: विधिक परीक्षण और न्यायिक प्रवृत्तियाँ

आपराधिक विधि में पागलपन (Insanity) की अवधारणा: विधिक परीक्षण और न्यायिक प्रवृत्तियाँ


परिचय (Introduction)

आपराधिक न्याय प्रणाली का एक मूलभूत सिद्धांत है कि “किसी व्यक्ति को तभी दंडित किया जा सकता है जब उसने अपराध करते समय अपने कार्य की प्रकृति और परिणाम को समझने की मानसिक क्षमता रखी हो।” यदि कोई व्यक्ति अपराध करते समय अपनी मानसिक स्थिति पर नियंत्रण में नहीं था, तो उसके विरुद्ध समान रूप से दंड नहीं दिया जा सकता। यही विचारधारा “पागलपन या उन्माद (Insanity)” की कानूनी अवधारणा की नींव है।

आपराधिक विधि में “Insanity” का सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि केवल वही व्यक्ति दंडनीय हो जो mens rea (अपराध करने का मानसिक इरादा) रखता हो। यदि अपराध के समय मानसिक स्थिति इतनी विक्षिप्त हो कि व्यक्ति को यह समझ ही न हो कि वह क्या कर रहा है, तो विधि उसके प्रति दया और न्याय का दृष्टिकोण अपनाती है।

भारतीय कानून में यह सिद्धांत भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 84 (Section 84 of IPC) में निहित है, जो अपराध के समय मानसिक असंतुलन को एक कानूनी बचाव (Legal Defence) के रूप में मान्यता देती है।


धारा 84, भारतीय दंड संहिता (Section 84 of the Indian Penal Code)

धारा 84 कहती है —

“किसी व्यक्ति द्वारा किया गया कोई कृत्य अपराध नहीं होगा, यदि उस समय वह ऐसी मानसिक विक्षिप्तता से ग्रस्त था, जिससे वह अपने कृत्य की प्रकृति या यह नहीं समझ सका कि वह जो कर रहा है, वह गलत या विधि-विरुद्ध है।”

अर्थात, यदि किसी व्यक्ति का मानसिक संतुलन अपराध के समय इस हद तक बिगड़ा हुआ था कि वह अपने कार्य की प्रकृति या उसके नैतिक और कानूनी परिणामों को नहीं समझ सका, तो उसे आपराधिक दायित्व से मुक्त किया जा सकता है।


पागलपन के प्रकार (Types of Insanity)

पागलपन को सामान्यतः दो रूपों में विभाजित किया जाता है —

  1. वास्तविक या चिकित्सीय पागलपन (Medical Insanity):
    यह वह स्थिति है जब व्यक्ति का मस्तिष्क चिकित्सकीय रूप से असंतुलित हो जाता है, जैसे — स्किज़ोफ्रेनिया, बाइपोलर डिसऑर्डर, या तीव्र मानसिक विकार।
  2. विधिक पागलपन (Legal Insanity):
    यह वह स्थिति है जिसे कानून मान्यता देता है। केवल मानसिक बीमारी होना पर्याप्त नहीं; आरोपी को यह साबित करना होता है कि अपराध के समय वह अपने कार्य की प्रकृति या परिणाम को समझने में असमर्थ था।

इस प्रकार, प्रत्येक चिकित्सकीय रूप से बीमार व्यक्ति कानूनी रूप से “पागल” नहीं होता।


विधिक परीक्षण (Legal Tests of Insanity)

विभिन्न न्यायिक प्रणालियों में पागलपन के निर्धारण के लिए अलग-अलग Legal Tests विकसित किए गए हैं। इन परीक्षणों का उद्देश्य यह तय करना है कि अपराध के समय आरोपी की मानसिक स्थिति कैसी थी।

1. मैकनॉटन नियम (McNaughton Rules)

यह सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक विधिक परीक्षण है। इसका उद्भव 1843 में इंग्लैंड के R v. Daniel McNaughton मामले से हुआ।

पृष्ठभूमि:
डेनियल मैकनॉटन ने भ्रम की स्थिति में प्रधानमंत्री के सचिव की हत्या कर दी। अदालत ने माना कि वह पागलपन की स्थिति में था और उसे दोषमुक्त किया गया।

नियम:
यदि अपराध के समय व्यक्ति ऐसी मानसिक विक्षिप्तता से ग्रस्त था कि —

  1. वह अपने कृत्य की प्रकृति और गुणवत्ता को नहीं समझ सका, या
  2. वह नहीं समझ सका कि जो वह कर रहा है, वह गलत या विधि-विरुद्ध है,
    तो वह अपराध के लिए उत्तरदायी नहीं होगा।

भारतीय धारा 84 भी इन्हीं नियमों पर आधारित है।


2. “Irresistible Impulse Test” (अवरोधहीन आवेग परीक्षण)

इस परीक्षण में देखा जाता है कि क्या व्यक्ति अपने कार्य पर नियंत्रण रख सका या नहीं।
यदि अपराध के समय आरोपी को यह ज्ञात था कि उसका कार्य गलत है, लेकिन वह स्वयं को रोक नहीं सका, तो यह भी पागलपन का संकेत माना जा सकता है।

हालांकि, भारतीय विधि इस सिद्धांत को स्वीकार नहीं करती; केवल “ज्ञान की क्षमता” (capacity of knowledge) पर ध्यान दिया जाता है, न कि “नियंत्रण की क्षमता” (capacity of self-control) पर।


3. “Durham Rule” या “Product Test”

यह परीक्षण अमेरिकी न्यायालयों में विकसित हुआ, जिसके अनुसार —

“यदि अपराध मानसिक बीमारी का प्रत्यक्ष परिणाम (product) है, तो आरोपी दोषमुक्त होगा।”

यह परीक्षण काफी लचीला माना गया, क्योंकि इससे चिकित्सकों की राय को अधिक महत्व मिला।


4. “Substantial Capacity Test” (Model Penal Code Test)

यह आधुनिक दृष्टिकोण है, जिसके अनुसार यदि व्यक्ति —

  1. अपने कार्य की गलतता को समझने की महत्वपूर्ण क्षमता (substantial capacity) खो बैठा हो, या
  2. अपने कार्य को नियंत्रित करने की क्षमता न रखता हो,
    तो उसे पागलपन के कारण दोषमुक्त किया जा सकता है।

भारतीय न्यायालयों की व्याख्या और प्रवृत्तियाँ (Judicial Trends in India)

भारतीय न्यायपालिका ने अनेक महत्वपूर्ण मामलों में धारा 84 की व्याख्या की है और स्पष्ट किया है कि कानूनी पागलपन साबित करना आरोपी की जिम्मेदारी है।

1. Dahyabhai Chhaganbhai Thakkar v. State of Gujarat (AIR 1964 SC 1563)

सुप्रीम कोर्ट ने कहा —

“पागलपन का बचाव तभी स्वीकार किया जा सकता है जब आरोपी यह साबित करे कि अपराध के समय उसकी मानसिक स्थिति ऐसी थी कि वह अपने कार्य की प्रकृति या गलतता को नहीं समझ सका।”

यहाँ “संदेह का लाभ” (benefit of doubt) आरोपी को दिया गया, क्योंकि मानसिक असंतुलन के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद थे।


2. Ratan Lal v. State of Madhya Pradesh (1971)

इस मामले में कहा गया कि केवल यह दिखाना कि आरोपी मानसिक रोग से पीड़ित था, पर्याप्त नहीं है। उसे यह साबित करना होगा कि अपराध के समय उसकी मानसिक स्थिति असंतुलित थी।


3. Surendra Mishra v. State of Jharkhand (2011)

सुप्रीम कोर्ट ने पुनः दोहराया कि Medical Insanity ≠ Legal Insanity
अदालत केवल वही मानती है जो अपराध के समय मानसिक स्थिति को प्रभावित करता हो।


भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अंतर्गत पागलपन का प्रमाण (Burden of Proof)

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 105 के अनुसार —

“जो व्यक्ति किसी विशेष अपवाद (exception) का लाभ लेना चाहता है, उस पर यह साबित करने का दायित्व है कि वह उस अपवाद के अंतर्गत आता है।”

अतः, आरोपी पर यह जिम्मेदारी होती है कि वह अदालत को यह विश्वास दिलाए कि अपराध के समय उसकी मानसिक स्थिति विक्षिप्त थी।

हालांकि, यदि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों से भी मानसिक असंतुलन का संकेत मिले, तो आरोपी को संदेह का लाभ दिया जा सकता है।


न्यायिक विवेक और पागलपन का सामाजिक दृष्टिकोण (Judicial and Social Perspective)

वर्तमान न्यायिक प्रवृत्तियाँ यह दर्शाती हैं कि अदालतें अब मानसिक विकारों को केवल “पागलपन” के रूप में नहीं देखतीं, बल्कि उन्हें संज्ञानात्मक, व्यवहारिक और चिकित्सीय दृष्टिकोण से समझती हैं।

आज मानसिक रोगों के वैज्ञानिक परीक्षण, जैसे —

  • साइकोलॉजिकल इवैल्यूएशन (Psychological Evaluation)
  • न्यूरोलॉजिकल स्कैनिंग (Neurological Scanning)
  • फॉरेंसिक साइकियाट्रिक रिपोर्ट (Forensic Psychiatric Report)
    — अदालतों में साक्ष्य के रूप में मान्यता पा रहे हैं।

पागलपन और नैतिक जिम्मेदारी (Moral Responsibility and Public Safety)

कानून का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि समाज और अपराधी दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
यदि कोई व्यक्ति मानसिक विकार के कारण अपराध करता है, तो उसे जेल नहीं बल्कि मानसिक चिकित्सालय भेजा जाना चाहिए।

भारत में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 (Mental Healthcare Act, 2017) इस दिशा में एक प्रगतिशील कदम है, जो मानसिक रोगियों के अधिकारों की रक्षा करता है।


निष्कर्ष (Conclusion)

“पागलपन” की अवधारणा न्याय के सिद्धांत में मानवता और न्यायसंगतता का प्रतीक है।
कानून यह स्वीकार करता है कि यदि अपराध के समय व्यक्ति अपने कार्य की प्रकृति या गलतता को नहीं समझ सका, तो उसे अपराधी नहीं कहा जा सकता।

फिर भी, इस सिद्धांत का दुरुपयोग रोकने के लिए न्यायालयों ने सख्त मानदंड तय किए हैं।
आज आवश्यक है कि मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों, फॉरेंसिक मनोवैज्ञानिकों, और न्यायालयों के बीच सहयोग बढ़ाया जाए, ताकि वास्तविक मानसिक विकारों को पहचाना जा सके और न्याय को वैज्ञानिक और मानवीय दृष्टिकोण से लागू किया जा सके।

इस प्रकार, “पागलपन” न तो केवल एक चिकित्सा स्थिति है और न ही मात्र कानूनी बचाव, बल्कि यह एक ऐसा न्यायसिद्धांत है जो अपराध, मानसिक स्थिति और नैतिक जिम्मेदारी — तीनों के बीच संतुलन स्थापित करता है।