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“गवाही की भाषा में ही हो रिकॉर्डिंग, सिर्फ अंग्रेजी अनुवाद पर निर्भरता गलत: सुप्रीम कोर्ट की नसीहत”

“गवाही की भाषा में ही हो रिकॉर्डिंग, सिर्फ अंग्रेजी अनुवाद पर निर्भरता गलत: सुप्रीम कोर्ट की नसीहत”


भूमिका

भारतीय न्याय प्रणाली में भाषा का प्रश्न सदियों से बहस का विषय रहा है। अदालतों में प्रयुक्त भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि न्याय की आत्मा का दर्पण है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की है, जिसमें निचली अदालतों को यह स्पष्ट रूप से निर्देशित किया गया है कि —

“गवाह जिस भाषा में बयान दे, उसे उसी भाषा में रिकॉर्ड किया जाना चाहिए, न कि केवल अंग्रेजी में अनुवादित रूप में।”

शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी दंड प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code, 1973) की धारा 277 (Section 277 CrPC) के तहत की है और इसे “न्याय के हित में आवश्यक सुधारात्मक दिशा” बताया है।


मामले की पृष्ठभूमि

यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी और न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी की खंडपीठ ने एक आपराधिक अपील (Criminal Appeal) की सुनवाई के दौरान की।

मामले में यह पाया गया कि —

  • निचली अदालत ने गवाह के बयान को उसकी मातृभाषा में दर्ज नहीं किया।
  • बल्कि उसे अंग्रेजी में अनुवादित रूप में रिकॉर्ड का हिस्सा बना दिया गया।
  • इस अनुवाद को अदालत के अधिकारी (Presiding Officer) ने स्वयं तैयार किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया को गंभीर विधिक त्रुटि (Serious Procedural Irregularity) मानते हुए कहा कि ऐसा करना न केवल CrPC की धारा 277 का उल्लंघन है, बल्कि यह “न्याय के सिद्धांतों” के भी विपरीत है।


क्या कहती है CrPC की धारा 277

दंड प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code), 1973 की धारा 277 का शीर्षक है —

“Language of Record of Evidence” (गवाही की भाषा में रिकॉर्डिंग)

इस धारा के अनुसार:

  1. यदि गवाह अदालत की भाषा (Court Language) में गवाही देता है, तो उसे उसी भाषा में लिखा जाना चाहिए।
  2. यदि गवाह किसी अन्य भाषा में गवाही देता है, तो यथासंभव उसे उसी भाषा में दर्ज किया जाना चाहिए।
  3. यदि ऐसा करना संभव न हो, तो उसका सटीक अनुवाद (True Translation) अदालत की भाषा में तैयार किया जाना चाहिए।
  4. जब गवाह अंग्रेजी में गवाही दे, और अदालत की भाषा भी अंग्रेजी हो, तो अनुवाद की आवश्यकता नहीं होती।

अर्थात, यह धारा स्पष्ट रूप से बताती है कि —
गवाही का मूल संस्करण (original testimony) गवाह की भाषा में ही रिकॉर्ड होना चाहिए, और अंग्रेजी केवल अनुवाद के लिए उपयोग की जानी चाहिए।


सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

पीठ ने अपने निर्णय में कहा —

“निचली अदालतों में यह प्रथा आम हो गई है कि गवाह चाहे जिस भाषा में बयान दे, उसे सीधे अंग्रेजी में अनुवादित करके रिकॉर्ड किया जाता है। यह न केवल गलत है, बल्कि न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत भी है।”

कोर्ट ने आगे कहा —

“जब यह विवाद उत्पन्न होता है कि गवाह ने वास्तव में क्या कहा, तब केवल उसी भाषा में दर्ज की गई गवाही विश्वसनीय मानी जा सकती है। अंग्रेजी अनुवाद पर निर्भरता से अर्थ और भावना दोनों विकृत हो सकते हैं।”


क्यों महत्वपूर्ण है गवाह की भाषा में रिकॉर्डिंग

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कई वैधानिक और व्यावहारिक कारण गिनाए:

  1. सटीकता (Accuracy):
    हर भाषा की अपनी भावनात्मक और सांस्कृतिक बारीकियां होती हैं। अनुवाद में कई बार अर्थ बदल जाता है या भावना खो जाती है।
  2. न्यायिक पारदर्शिता (Judicial Transparency):
    गवाह की वास्तविक आवाज़ (true voice) तभी दर्ज होती है, जब उसे उसकी मातृभाषा में लिखा जाए।
  3. अपील में सुविधा (Ease of Appeal):
    जब मामला ऊपरी अदालतों तक जाता है, तो यह समझना आवश्यक होता है कि गवाह ने वास्तव में क्या कहा था, न कि अनुवादक ने कैसे समझा।
  4. साक्ष्य की विश्वसनीयता (Reliability of Evidence):
    न्याय की नींव गवाह की विश्वसनीयता पर टिकी होती है। अनुवाद में गलतियां होने से साक्ष्य की वैधता पर प्रश्न उठ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश: अनुपालन सुनिश्चित हो

पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा —

“सभी अधीनस्थ अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि गवाही दर्ज करते समय CrPC की धारा 277 का अक्षरशः पालन किया जाए। न्यायिक अधिकारी केवल अंग्रेजी अनुवाद को ही रिकॉर्ड का हिस्सा न बनाएं।”

इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि —

  • गवाह की भाषा में रिकॉर्डिंग प्राथमिक होनी चाहिए।
  • अंग्रेजी अनुवाद केवल रिकॉर्ड और संदर्भ के लिए बाद में जोड़ा जा सकता है।
  • यदि अनुवाद किया जाए तो वह सटीक (accurate) और प्रमाणित (authenticated) होना चाहिए।

अदालती भाषा का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

भारत में अदालती भाषा (Court Language) का प्रश्न संविधान के निर्माण काल से ही जटिल रहा है।

  • संविधान के अनुच्छेद 343 से 351 तक केंद्र की भाषा नीति पर चर्चा की गई है।
  • संविधान के अनुच्छेद 348 में यह प्रावधान किया गया है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की कार्यवाही अंग्रेजी में होगी।
  • लेकिन राज्य सरकारों को यह अधिकार है कि वे निचली अदालतों की भाषा के रूप में हिंदी या स्थानीय भाषा को मान्यता दें।

इस प्रकार, देश की अधिकांश जिला अदालतों में हिंदी, मराठी, तमिल, तेलुगु, बंगाली, गुजराती जैसी भाषाओं में कार्यवाही चलती है।

फिर भी, कई स्थानों पर गवाह के बयानों को केवल अंग्रेजी में रिकॉर्ड करने की “पुरानी औपनिवेशिक परंपरा” आज भी जारी है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अब अनुचित ठहराया है।


कानूनी विशेषज्ञों की राय

कानूनी विद्वानों और न्यायिक अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया है।

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण का कहना है —

“यह निर्णय न्यायिक संवेदनशीलता का उदाहरण है। भारत जैसे विविध भाषाई देश में केवल अंग्रेजी पर निर्भरता न्याय की पहुँच को सीमित करती है।”

पूर्व न्यायाधीश आर.एस. सोढ़ी ने कहा —

“धारा 277 का पालन वर्षों से केवल औपचारिकता बन गया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने इसकी आत्मा को पुनः जीवित किया है।”


व्यावहारिक प्रभाव (Practical Impact)

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद न्यायिक प्रक्रिया में कई सुधार होने की संभावना है —

  1. गवाही के दौरान भाषा सहायता (Language Assistance):
    अदालतों को प्रशिक्षित अनुवादक या भाषा सहायक नियुक्त करने की आवश्यकता होगी।
  2. रिकॉर्डिंग तकनीक में सुधार:
    अब डिजिटल रिकॉर्डिंग और वीडियो ट्रांस्क्रिप्शन में बहुभाषीय समर्थन जोड़ा जा सकता है।
  3. न्यायिक प्रशिक्षण:
    न्यायिक अकादमियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि नए जज CrPC की धारा 277 के सही अनुप्रयोग को समझें।
  4. अपील के मामलों में पारदर्शिता:
    उच्च न्यायालयों को यह लाभ होगा कि वे वास्तविक गवाही का अवलोकन कर सकेंगे, न कि केवल अंग्रेजी रूपांतर का।

संविधानिक दृष्टि से विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) की भावना से भी जुड़ा है।

  • अनुच्छेद 21 के अंतर्गत “निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial)” का अधिकार दिया गया है।
  • यदि गवाह की बात ठीक से दर्ज ही न हो, तो न्याय प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं रह जाती।

इस प्रकार, यह फैसला ‘निष्पक्ष सुनवाई’ के अधिकार को सुदृढ़ करता है।


विदेशी उदाहरण (Comparative Perspective)

अनेक देशों में गवाह की भाषा में ही गवाही रिकॉर्ड करने की अनिवार्यता है —

  • संयुक्त राज्य अमेरिका (U.S.) में Federal Rules of Evidence के तहत गवाह को उसकी मातृभाषा में बयान देने और रिकॉर्ड करवाने का अधिकार है।
  • फ्रांस और जर्मनी जैसी सिविल लॉ देशों में भी अदालतें अनुवादक नियुक्त करती हैं, ताकि सटीक अभिव्यक्ति बनी रहे।
  • संयुक्त राष्ट्र (UN) के न्यायाधिकरणों में भी गवाह की भाषा में बयान प्राथमिक होता है, और अंग्रेजी अनुवाद केवल संदर्भ के लिए उपयोग किया जाता है।

इस प्रकार, भारत का यह निर्णय अंतरराष्ट्रीय न्यायिक मानकों के अनुरूप है।


निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल एक प्रशासनिक निर्देश है, बल्कि यह भारतीय न्याय प्रणाली की लोकतांत्रिक आत्मा को पुनर्स्थापित करता है।

यह निर्णय हमें यह याद दिलाता है कि —

“न्याय केवल कानून की भाषा में नहीं, बल्कि जनता की भाषा में भी बोला जाना चाहिए।”

धारा 277 का पालन केवल तकनीकी औपचारिकता नहीं, बल्कि साक्ष्य की प्रामाणिकता और न्याय की सच्चाई का आधार है।

अब समय आ गया है कि अदालतें भाषा के माध्यम से न्याय की दूरी को कम करें और प्रत्येक नागरिक को उसकी अपनी भाषा में न्याय सुनने और दिलाने का अवसर दें।


🧾 अंतिम टिप्पणी:
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय न्यायालयों के लिए एक “भाषाई सुधार आंदोलन” की तरह है। इससे यह उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले वर्षों में अदालतों में बहुभाषीय रिकॉर्डिंग प्रणाली लागू होगी, जिससे न्याय अधिक पारदर्शी, सटीक और जन-सुलभ बनेगा।


संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।