तलाक नहीं लिया, फिर भी दूसरा रिश्ता? — सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ऐसे हालात में लिव-इन रिलेशन वैध हो सकता है, व्यभिचार नहीं
🔹 प्रस्तावना
भारतीय समाज में विवाह (Marriage) एक पवित्र संस्था मानी जाती है, जो केवल दो व्यक्तियों का नहीं बल्कि दो परिवारों का आजीवन बंधन होता है। लेकिन जब पति-पत्नी के बीच संबंध इतने बिगड़ जाएँ कि वे एक-दूसरे से अलग रहने लगें, और तलाक का मामला अदालत में लंबित हो, तब यह प्रश्न उठता है —
“क्या इस दौरान किसी भी पक्ष द्वारा किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंध बनाना ‘अवैध’ या ‘बेवफाई’ (Adultery) माना जाएगा?”
इसी संवेदनशील और विवादास्पद प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया — Indra Sarma v. V.K.V. Sarma (2013) 15 SCC 755, जिसमें अदालत ने कहा कि अगर पत्नी अपने पति से अलग रह रही है, और तलाक का केस लंबित है, तब भी उसका किसी अन्य पुरुष के साथ लिव-इन रिलेशन (Live-in Relationship) बनाना “कानूनी रूप से अवैध नहीं” माना जाएगा, यदि उस संबंध में पारस्परिक सहमति और निष्ठा हो।
इस निर्णय ने भारतीय पारिवारिक कानून और समाज की पारंपरिक सोच — दोनों में एक नई दिशा दी।
🔹 पृष्ठभूमि: मामला क्या था?
इस प्रकरण में इंद्रा शर्मा (Indra Sarma) नामक महिला कई वर्षों तक वी.के.वी. शर्मा (V.K.V. Sarma) नामक पुरुष के साथ लिव-इन रिलेशन में रही।
बाद में जब यह संबंध टूटा, तो महिला ने Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 के तहत भरण-पोषण और सुरक्षा का दावा किया।
पुरुष पक्ष ने यह तर्क दिया कि —
“इंद्रा शर्मा पहले से विवाहित थी और उसने तलाक नहीं लिया था, इसलिए उसका यह संबंध अवैध (Adulterous) है, और उसे कोई कानूनी संरक्षण नहीं मिल सकता।”
लेकिन महिला का कहना था कि —
“वह अपने पति से लंबे समय से अलग रह रही थी, तलाक की प्रक्रिया लंबित थी, और उसने यह नया संबंध पूर्ण सहमति और सामाजिक पहचान के साथ बनाया था।”
यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा, जहाँ अदालत को यह तय करना था कि —
“क्या ऐसे लिव-इन रिलेशन को वैध और संरक्षित माना जा सकता है?”
🔹 सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट की पीठ (न्यायमूर्ति के.एस. राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष) ने एक ऐतिहासिक और प्रगतिशील फैसला दिया।
अदालत ने कहा कि —
“यदि एक विवाहित महिला अपने पति से लंबे समय से अलग रह रही है, और तलाक की प्रक्रिया चल रही है, तो उसका किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंध अपने आप में ‘व्यभिचार’ नहीं माना जाएगा, विशेष रूप से तब जब उस संबंध में स्थायित्व, सहमति, और सामाजिक स्वीकृति के तत्व मौजूद हों।”
अर्थात —
“ऐसे संबंध को लिव-इन रिलेशनशिप की श्रेणी में रखा जाएगा, न कि ‘बेवफाई’ की।”
🔹 न्यायालय का तर्क
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण बिंदु रखे —
- लिव-इन रिलेशन को ‘घरेलू संबंध’ माना जा सकता है
यदि दो वयस्क व्यक्ति स्वतंत्र रूप से एक साथ रहते हैं, जीवन साझा करते हैं, और समाज के समक्ष “पति-पत्नी की तरह” रहते हैं, तो यह घरेलू संबंध (Domestic Relationship) है, भले ही औपचारिक विवाह न हुआ हो। - संविधान के अनुच्छेद 21 का संरक्षण
प्रत्येक व्यक्ति को “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता” का अधिकार है।
इस अधिकार में यह स्वतंत्रता भी शामिल है कि कोई व्यक्ति किसके साथ रहना चाहता है। - कानूनी विवाह और लिव-इन रिलेशन में भेद
अदालत ने माना कि लिव-इन रिलेशन को विवाह का दर्जा नहीं दिया जा सकता, लेकिन इसे अवैध भी नहीं कहा जा सकता, जब तक कि वह स्वैच्छिक, स्थायी और परस्पर निष्ठा पर आधारित हो। - ‘Adultery’ (व्यभिचार) की संकीर्ण व्याख्या अस्वीकार की गई
पहले की कानूनी व्याख्याओं में विवाहेतर संबंधों को स्वतः व्यभिचार माना जाता था।
परंतु इस निर्णय ने कहा कि अगर पति ने आपत्ति नहीं की, या वैवाहिक संबंध लंबे समय से टूट चुके हैं, तो यह “बेवफाई” नहीं बल्कि “नया सहजीवन” है।
🔹 लिव-इन रिलेशन का कानूनी दर्जा
सुप्रीम कोर्ट ने Indra Sarma Case में लिव-इन रिलेशन की पाँच श्रेणियाँ बताईं —
- पूर्ण रूप से वैध विवाह की तरह संबंध:
जहाँ दोनों लंबे समय से पति-पत्नी की तरह रह रहे हों, समाज में उन्हें ऐसा ही माना जाता हो। - वैध विवाह के समान, परंतु औपचारिक विवाह नहीं:
जहाँ दोनों विवाह किए बिना साथ रहते हैं लेकिन स्थायित्व है। - एक साथी विवाहित है, दूसरा अविवाहित:
जैसे इस केस में था। अदालत ने कहा कि इसे पूर्ण वैध विवाह नहीं कहा जा सकता, परंतु महिला के अधिकारों की रक्षा आवश्यक है। - अल्पकालिक संबंध:
जिसमें कोई स्थायित्व नहीं है — ऐसे संबंधों को संरक्षण नहीं मिलेगा। - अवैध और अनैतिक संबंध:
यदि छल या धोखाधड़ी से संबंध बनाया गया है, तो वह संरक्षण योग्य नहीं होगा।
🔹 व्यभिचार (Adultery) और लिव-इन रिलेशन का अंतर
पहले भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 497 के तहत व्यभिचार (Adultery) अपराध था।
लेकिन Joseph Shine v. Union of India (2018) में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 497 को असंवैधानिक घोषित कर दिया।
अदालत ने कहा कि —
“व्यक्तिगत संबंधों में वयस्कों की सहमति को अपराध नहीं माना जा सकता। यह व्यक्ति की निजता और स्वतंत्रता का हिस्सा है।”
इस निर्णय ने Indra Sarma केस की भावना को और मजबूत किया — कि वयस्कों के बीच सहमति से बना लिव-इन रिलेशन कानूनी अपराध नहीं है।
🔹 Domestic Violence Act, 2005 में लिव-इन रिलेशन
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 का उद्देश्य केवल विवाहिता महिलाओं की रक्षा करना नहीं, बल्कि उन महिलाओं को भी सुरक्षा देना है जो लिव-इन रिलेशन में हैं।
इस अधिनियम की धारा 2(f) में “Domestic Relationship” की परिभाषा दी गई है, जिसमें “वैवाहिक संबंध के समान संबंध” (relationship in the nature of marriage) को भी शामिल किया गया है।
अतः, ऐसी महिला —
- जो लंबे समय तक किसी पुरुष के साथ रही है,
- जिसने घरेलू जीवन साझा किया है,
- और आर्थिक या भावनात्मक रूप से उस पर निर्भर रही है,
वह भरण-पोषण, आवास और सुरक्षा की हकदार होगी।
🔹 निर्णय के सामाजिक और नैतिक प्रभाव
(1) परंपरागत सोच को चुनौती:
भारतीय समाज में यह आम धारणा है कि जब तक तलाक न हो जाए, तब तक पत्नी या पति किसी और से संबंध नहीं रख सकता।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पति-पत्नी के बीच वैवाहिक बंधन कानूनी रूप से जीवित हो, परंतु भावनात्मक और सामाजिक रूप से समाप्त हो चुका हो, तो ऐसे में नया संबंध ‘नैतिक अपराध’ नहीं माना जा सकता।
(2) महिलाओं की सुरक्षा का विस्तार:
यह निर्णय उन महिलाओं के लिए राहत है जो वर्षों से पति से अलग हैं, परंतु तलाक लंबित होने के कारण उन्हें कानूनी मान्यता या सुरक्षा नहीं मिलती थी।
अब वे Domestic Violence Act के तहत संरक्षण पा सकती हैं।
(3) निजता और स्वतंत्रता का सम्मान:
यह फैसला अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 19 (स्वतंत्र अभिव्यक्ति और जीवनशैली का अधिकार) की भावना को भी सशक्त करता है।
🔹 कुछ प्रमुख न्यायिक दृष्टांत
- D. Velusamy v. D. Patchaiammal (2010) 10 SCC 469:
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “लिव-इन रिलेशन यदि वैवाहिक जीवन के समान हो, तो महिला Domestic Violence Act के तहत सुरक्षा की हकदार है।” - Chanmuniya v. Virendra Kumar Singh Kushwaha (2011) 1 SCC 141:
अदालत ने कहा कि जो महिला विवाहेतर लेकिन स्थायी संबंध में रही है, उसे भरण-पोषण का अधिकार मिलेगा। - Joseph Shine v. Union of India (2018):
व्यभिचार (Adultery) को अपराध की श्रेणी से हटाया गया।
अदालत ने कहा — “राज्य का दायरा व्यक्ति के निजी संबंधों तक नहीं फैलना चाहिए।”
इन निर्णयों ने मिलकर Indra Sarma केस को सामाजिक और संवैधानिक आधार प्रदान किया।
🔹 व्यावहारिक उदाहरण
मान लीजिए —
एक महिला अपने पति से पाँच साल से अलग रह रही है। तलाक का मामला अभी कोर्ट में लंबित है।
इस दौरान वह किसी दूसरे पुरुष के साथ रहती है, दोनों साथ में घर बनाते हैं, समाज में पति-पत्नी की तरह व्यवहार करते हैं।
अब यदि पति यह आरोप लगाता है कि वह “बेवफा” है या “अवैध संबंध” में है, तो यह आरोप कानून में टिकेगा नहीं, क्योंकि:
- विवाहिक संबंध पहले से de facto (वास्तविक रूप से) समाप्त हो चुका है।
- नया संबंध सहमति और स्थायित्व पर आधारित है।
- पति ने पहले कभी आपत्ति नहीं की।
इस स्थिति में वह महिला Indra Sarma केस के सिद्धांतों के अनुसार कानूनी सुरक्षा और सम्मान की पात्र है।
🔹 नैतिकता बनाम कानून
भारतीय समाज में नैतिकता और कानून हमेशा एक समान नहीं होते।
जहाँ नैतिकता कहती है कि विवाह के रहते दूसरा संबंध गलत है, वहीं कानून कहता है —
“यदि विवाह केवल नाम मात्र रह गया है, और दोनों का जीवन अलग-अलग है, तो किसी वयस्क की स्वतंत्रता को अपराध नहीं ठहराया जा सकता।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि —
“न्यायालय का कार्य नैतिकता की रक्षा करना नहीं, बल्कि व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करना है।”
🔹 आलोचना और समर्थन
🔸 आलोचना:
कुछ लोगों ने कहा कि यह निर्णय संस्थानिक विवाह को कमजोर करेगा और समाज में पारिवारिक अस्थिरता बढ़ाएगा।
🔸 समर्थन:
दूसरी ओर, विधि विशेषज्ञों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने इसे “मानवाधिकार-आधारित निर्णय” बताया।
उनका कहना है कि यह फैसला न्यायिक संवेदनशीलता और आधुनिक सामाजिक वास्तविकता दोनों को संतुलित करता है।
🔹 कानून के विकास की दिशा
भारत में लिव-इन रिलेशन अब धीरे-धीरे कानूनी मान्यता पा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि —
“दो वयस्कों का सहमति से साथ रहना संविधान के तहत संरक्षित स्वतंत्रता का हिस्सा है।”
राजस्थान, महाराष्ट्र, दिल्ली और केरल हाईकोर्ट ने भी कई फैसलों में कहा है कि “लिव-इन रिलेशन न तो अपराध है, न अनैतिक।”
इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय न्यायपालिका अब केवल विवाह की औपचारिकता पर नहीं, बल्कि संबंध की वास्तविकता और मानवीय गरिमा पर ध्यान दे रही है।
🔹 निष्कर्ष
Indra Sarma v. V.K.V. Sarma (2013) का निर्णय भारतीय न्याय प्रणाली का एक मील का पत्थर है। इसने यह स्पष्ट कर दिया कि —
“यदि पति-पत्नी का संबंध लंबे समय से टूट चुका है और तलाक लंबित है, तो ऐसे में किसी भी पक्ष का किसी अन्य व्यक्ति से सहमति-आधारित लिव-इन रिलेशन रखना अपराध नहीं, बल्कि उसका व्यक्तिगत अधिकार है।”
यह निर्णय यह भी बताता है कि कानून अब केवल “विवाह” की औपचारिकता पर नहीं, बल्कि मानव संबंधों की वास्तविकता, स्वतंत्रता और गरिमा पर आधारित है।
अतः, यदि तलाक नहीं हुआ है, परंतु पति-पत्नी लंबे समय से अलग हैं, और एक पक्ष नया जीवन शुरू करता है — तो इसे “बेवफाई” या “व्यभिचार” कहना न्याय और संविधान दोनों के खिलाफ होगा।
“कानून अब व्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है, न कि परंपराओं के बंधन को।”