Family Law (परिवारिक विधि)
प्रश्न 1. हिंदू विवाह की अवधारणा और स्वरूप स्पष्ट कीजिए।
हिंदू विवाह केवल एक अनुबंध (Contract) नहीं, बल्कि एक संस्कार (Sacrament) माना गया है। इसका उद्देश्य केवल पति-पत्नी के बीच शारीरिक या सामाजिक संबंध स्थापित करना नहीं, बल्कि धार्मिक एवं नैतिक दायित्वों की पूर्ति करना है। प्राचीन काल में विवाह को अविनाशी बंधन कहा गया जिसमें पति-पत्नी “सप्तपदी” के माध्यम से एक-दूसरे के प्रति आजीवन व्रत लेते हैं।
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 ने इस पवित्र संबंध को कानूनी रूप प्रदान किया। धारा 5 में विवाह की आवश्यक शर्तें दी गई हैं— जैसे दोनों पक्षों की सहमति, आयु, एकपत्नीत्व (Monogamy) और मानसिक स्थिति। धारा 7 के अंतर्गत वैदिक रीति या किसी प्रचलित रीति से विवाह को वैध माना गया है।
आज विवाह केवल धार्मिक बंधन नहीं बल्कि कानूनी दायित्व भी बन चुका है, जिससे पति-पत्नी दोनों पर समान अधिकार और कर्तव्य लागू होते हैं।
प्रश्न 2. हिंदू विवाह की आवश्यक शर्तें (Conditions for a valid Hindu Marriage) क्या हैं?
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5 के अनुसार विवाह तभी वैध माना जाएगा जब निम्न शर्तें पूरी हों—
- एकपत्नीत्व (Monogamy): विवाह के समय कोई भी पक्ष पहले से विवाहित न हो।
- संपूर्ण मानसिक स्वास्थ्य: दोनों पक्ष स्वस्थ मानसिक स्थिति में हों और अपनी सहमति स्वतंत्र रूप से दे सकें।
- न्यूनतम आयु: वर की आयु 21 वर्ष और वधू की 18 वर्ष होनी चाहिए।
- निषिद्ध संबंधों का अभाव: यदि दोनों पक्ष “सगोत्र” या “सपिंड” संबंधों में आते हैं तो विवाह अमान्य होगा, जब तक कि उनकी परंपरा इसकी अनुमति न देती हो।
- विवाह की विधि: विवाह वैदिक या प्रचलित रीति से होना आवश्यक है।
इन शर्तों में से किसी का उल्लंघन विवाह को शून्य (Void) या शून्यनीय (Voidable) बना सकता है।
प्रश्न 3. विवाह को शून्य और शून्यनीय घोषित करने के आधार क्या हैं?
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 और 12 के अनुसार—
- शून्य विवाह (Void Marriage):
- यदि किसी पक्ष का पहले से जीवित जीवनसाथी हो।
- यदि विवाह निषिद्ध संबंधों में हुआ हो।
- यदि विवाह सपिंड संबंधों में हुआ हो।
ऐसे विवाह प्रारंभ से ही अवैध होते हैं और किसी न्यायिक आदेश की आवश्यकता नहीं होती।
- शून्यनीय विवाह (Voidable Marriage):
- जब सहमति धोखे या दबाव से प्राप्त की गई हो।
- जब किसी पक्ष में विवाह के समय मानसिक अक्षमता या नपुंसकता हो।
- जब पत्नी गर्भवती हो किसी अन्य व्यक्ति से।
शून्यनीय विवाह तब तक वैध माना जाता है जब तक न्यायालय उसे निरस्त न कर दे।
प्रश्न 4. पति और पत्नी के अधिकार एवं कर्तव्य क्या हैं?
विवाह के उपरांत पति-पत्नी पर एक-दूसरे के प्रति नैतिक, सामाजिक और कानूनी दायित्व लागू होते हैं।
अधिकार:
- साथ रहने और सहवास का अधिकार (Right of Consortium)।
- एक-दूसरे से भरण-पोषण का अधिकार।
- संपत्ति पर उत्तराधिकार का अधिकार।
कर्तव्य: - निष्ठा और विश्वास बनाए रखना।
- एक-दूसरे की आवश्यकताओं की पूर्ति करना।
- पारिवारिक उत्तरदायित्व साझा करना।
यदि पति या पत्नी इनमें से किसी कर्तव्य का उल्लंघन करते हैं, तो न्यायालय के पास भरण-पोषण, अलगाव या तलाक का उपाय उपलब्ध है।
प्रश्न 5. भरण-पोषण (Maintenance) का अधिकार क्या है?
भरण-पोषण का अर्थ है— किसी निर्भर व्यक्ति को जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक साधन प्रदान करना।
हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 18 के अनुसार पत्नी अपने पति से भरण-पोषण की मांग कर सकती है यदि—
- पति उसे बिना उचित कारण छोड़ दे,
- दूसरा विवाह कर ले,
- व्यभिचार करे या पत्नी के साथ दुर्व्यवहार करे।
इसके अतिरिक्त धारा 19 में विधवा को भी ससुराल से भरण-पोषण का अधिकार दिया गया है।
CrPC की धारा 125 के अंतर्गत भी पति, पत्नी, बच्चे और माता-पिता भरण-पोषण के लिए आवेदन कर सकते हैं। यह प्रावधान धर्म से परे सभी पर लागू है।
प्रश्न 6. हिंदू दत्तक की शर्तें क्या हैं?
हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 6 से 11 तक दत्तक की शर्तें दी गई हैं।
- दत्तक लेने की योग्यता: केवल वह व्यक्ति जो वयस्क और मानसिक रूप से सक्षम हो तथा संतानहीन हो, दत्तक ले सकता है।
- दत्तक देने की योग्यता: माता या पिता (या दोनों के अभाव में संरक्षक) ही संतान को दत्तक दे सकते हैं।
- दत्तक की विधि: वास्तविक हस्तांतरण आवश्यक है, केवल मौखिक घोषणा पर्याप्त नहीं।
- दत्तक संतान की आयु: दत्तक लेने के समय 15 वर्ष से कम होनी चाहिए, जब तक कि कोई प्रथा अन्यथा न हो।
दत्तक संतान को प्राकृतिक संतान के समान अधिकार प्राप्त होते हैं।
प्रश्न 7. तलाक के आधार (Grounds of Divorce) क्या हैं?
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के अंतर्गत तलाक के प्रमुख आधार हैं—
- व्यभिचार (Adultery),
- क्रूरता (Cruelty),
- परित्याग (Desertion) दो वर्ष से अधिक,
- धर्म परिवर्तन,
- मानसिक विकार या असाध्य रोग,
- पति या पत्नी का संन्यासी बन जाना,
- मृत्यु की संभावना (सात वर्ष से अनुपस्थित रहना)।
इसके अतिरिक्त, धारा 13B के तहत आपसी सहमति से तलाक (Divorce by Mutual Consent) की व्यवस्था भी की गई है।
प्रश्न 8. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 का उद्देश्य क्या है?
इस अधिनियम का उद्देश्य हिंदुओं में उत्तराधिकार और संपत्ति वितरण के समान नियम स्थापित करना था। इससे पूर्व स्त्रियों को सीमित अधिकार मिलते थे।
अधिनियम ने महिला के संपत्ति अधिकारों को सशक्त किया, जिससे वह पुत्र के समान उत्तराधिकारी बनी।
2005 के संशोधन ने पुत्री को भी समान अधिकार देकर लैंगिक समानता को सुनिश्चित किया।
अब पुत्री भी पैतृक संपत्ति में सहभोगिनी (Coparcener) है और पिता की मृत्यु के बाद संपत्ति में उसका समान हिस्सा होता है।
प्रश्न 9. मुस्लिम विवाह की प्रकृति क्या है?
मुस्लिम विवाह (Nikah) को नागरिक अनुबंध (Civil Contract) माना गया है। इसमें तीन तत्व होते हैं—
- प्रस्ताव (Ijab),
- स्वीकृति (Qubool),
- और प्रतिफल (Mahr)।
इस अनुबंध में दोनों पक्षों की स्वतंत्र सहमति आवश्यक है। विवाह के लिए दो गवाहों की उपस्थिति जरूरी है।
मुस्लिम विवाह का उद्देश्य केवल यौन या सामाजिक संबंध नहीं बल्कि कानूनी वैधता और सामाजिक स्थिरता प्रदान करना है।
यह अनुबंध एक कानूनी बाध्यता उत्पन्न करता है, जिससे पत्नी को भरण-पोषण, मेहर और विरासत का अधिकार प्राप्त होता है।
प्रश्न 10. मेहर (Dower) का अर्थ और उद्देश्य क्या है?
मेहर या दहेज (Dower) मुस्लिम विवाह का अनिवार्य तत्व है, जो पति द्वारा पत्नी को सुरक्षा और सम्मान स्वरूप दिया जाता है।
मेहर दो प्रकार का होता है—
- मुअज्जल (Prompt): जो विवाह के तुरंत बाद देय होता है।
- मुवज्जल (Deferred): जो बाद में, विशेषकर तलाक या पति की मृत्यु पर देय होता है।
मेहर पत्नी का वैधानिक अधिकार है, जिसे वह कभी भी मांग सकती है।
इसका उद्देश्य पत्नी को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना और विवाह में उसकी स्वतंत्र स्थिति को मान्यता देना है।
प्रश्न 11. हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13B के अंतर्गत आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया समझाइए।
धारा 13B में पति-पत्नी को आपसी सहमति से तलाक (Divorce by Mutual Consent) का अधिकार दिया गया है। इस प्रावधान का उद्देश्य विवाह संस्था में उत्पन्न असहनीय परिस्थितियों से राहत प्रदान करना है।
इसके लिए निम्न शर्तें आवश्यक हैं—
- पति-पत्नी कम से कम एक वर्ष से अलग रह रहे हों।
- दोनों ने आपसी सहमति से विवाह संबंध समाप्त करने का निश्चय किया हो।
- तलाक हेतु संयुक्त याचिका जिला न्यायालय में प्रस्तुत की जाती है।
- अदालत 6 महीने की “Cooling Period” देती है, ताकि पुनर्मिलन की संभावना पर विचार हो सके।
- यदि 6 माह बाद भी दोनों तलाक पर सहमत रहते हैं, तो न्यायालय तलाक का आदेश पारित करता है।
यह प्रक्रिया सरल और विवाद रहित तलाक का मार्ग प्रदान करती है।
प्रश्न 12. हिंदू महिला के भरण-पोषण अधिकार की प्रकृति क्या है?
हिंदू महिला का भरण-पोषण अधिकार कानूनी और नैतिक दोनों प्रकार का है।
हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 18 के अनुसार—
पत्नी को पति से भरण-पोषण का अधिकार है, चाहे वह पति के साथ रह रही हो या नहीं। यदि पति क्रूरता करता है, व्यभिचार करता है, या दूसरा विवाह कर लेता है, तो पत्नी अलग रहकर भी भरण-पोषण मांग सकती है।
इसके अतिरिक्त विधवा महिला को धारा 19 के अंतर्गत अपने ससुराल से भरण-पोषण का अधिकार दिया गया है।
यह अधिकार महिला की आर्थिक स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करता है।
प्रश्न 13. विवाह विच्छेद (Judicial Separation) और तलाक में क्या अंतर है?
Judicial Separation (न्यायिक पृथक्करण) और Divorce (तलाक) दोनों पति-पत्नी के बीच वैवाहिक संबंधों में अंतर लाते हैं, परंतु दोनों की प्रकृति भिन्न है—
- न्यायिक पृथक्करण में विवाह समाप्त नहीं होता, बल्कि पति-पत्नी केवल अलग रहने का अधिकार पाते हैं।
- तलाक में विवाह पूर्णतः समाप्त हो जाता है।
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 10 में न्यायिक पृथक्करण का प्रावधान है, जबकि धारा 13 तलाक से संबंधित है।
न्यायिक पृथक्करण का उद्देश्य पति-पत्नी को एक “Cooling Period” देना है ताकि वे अपने मतभेद सुलझा सकें।
प्रश्न 14. हिंदू विवाह में “सप्तपदी” का क्या महत्व है?
“सप्तपदी” हिंदू विवाह की सबसे महत्वपूर्ण रस्म है, जिसका अर्थ है— “सात पग” या “सात फेरे।”
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7(2) के अनुसार यदि विवाह “सप्तपदी” के साथ संपन्न हुआ है तो सातवां फेरा पूर्ण होते ही विवाह वैध माना जाता है।
प्रत्येक फेरा पति-पत्नी के लिए एक वचन है, जैसे— परस्पर निष्ठा, सहयोग, संतति, और सुख-दुःख में साथ निभाने का संकल्प।
इस विधि से विवाह केवल सामाजिक नहीं, बल्कि धार्मिक और नैतिक बंधन बन जाता है।
प्रश्न 15. मुस्लिम विधि में तलाक के प्रकार कौन-कौन से हैं?
मुस्लिम विधि में तलाक के कई प्रकार हैं—
- तलाक-ए-सुन्नत (वैध तलाक):
- अहसन तलाक: एक बार तलाक उच्चारित कर ‘इद्दत अवधि’ के दौरान सहवास न करना।
- हसन तलाक: तीन बार अलग-अलग अवधियों में तलाक कहना।
- तलाक-ए-बिद्दत (तिहरा तलाक): तीन बार एक साथ “तलाक” कहना, जिसे अब अवैध घोषित किया गया है।
- खुला (Khula): पत्नी द्वारा मुआवजे के बदले तलाक की मांग।
- मुबारत (Mubarat): आपसी सहमति से तलाक।
- तफवीज़ तलाक: पति द्वारा तलाक का अधिकार पत्नी को देना।
इनमें “खुला” और “मुबारत” तलाक दोनों पक्षों के अधिकारों की रक्षा करते हैं।
प्रश्न 16. ‘इद्दत’ (Iddat) अवधि क्या होती है और इसका उद्देश्य क्या है?
‘इद्दत’ वह अवधि है जो किसी मुस्लिम महिला को तलाक या पति की मृत्यु के बाद पालन करनी होती है।
तलाक की स्थिति में: तीन मासिक धर्म अवधि (लगभग तीन माह)।
पति की मृत्यु पर: चार माह दस दिन की अवधि।
इसका उद्देश्य—
- यह सुनिश्चित करना कि महिला गर्भवती न हो, ताकि वंश की शुद्धता बनी रहे।
- पति की मृत्यु या तलाक के पश्चात् शोक अवधि के रूप में सम्मान देना।
इद्दत के दौरान महिला का पुनर्विवाह निषिद्ध होता है। यह सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से आवश्यक प्रथा है।
प्रश्न 17. हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत क्रूरता (Cruelty) का क्या अर्थ है?
“क्रूरता” तलाक का एक प्रमुख आधार है, जो शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की हो सकती है।
धारा 13(1)(i-a) के अनुसार यदि पति या पत्नी एक-दूसरे के प्रति क्रूर व्यवहार करते हैं, तो दूसरा पक्ष तलाक की मांग कर सकता है।
उदाहरण के रूप में—
- मारपीट या शारीरिक हिंसा,
- गाली-गलौज या अपमान,
- झूठे आरोप लगाना,
- पति या पत्नी का परित्याग करना।
मामला: Samar Ghosh v. Jaya Ghosh (2007) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “मानसिक क्रूरता” का अर्थ है — ऐसा व्यवहार जिससे दूसरा पक्ष सामान्य जीवन नहीं जी सके।
प्रश्न 18. नाबालिग विवाह की वैधता क्या है?
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अनुसार विवाह के लिए न्यूनतम आयु —
पुरुष: 21 वर्ष और महिला: 18 वर्ष है।
यदि इससे कम आयु में विवाह होता है तो वह शून्यनीय (Voidable) होता है, पूर्णतः अवैध नहीं।
नाबालिग पक्ष वयस्क होने पर विवाह निरस्त करा सकता है।
साथ ही, बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के अंतर्गत ऐसा विवाह अपराध है, जिसके लिए दंड का प्रावधान है।
यह प्रावधान बालिका संरक्षण और शिक्षा के अधिकार को बढ़ावा देता है।
прश्न 19. मुस्लिम विवाह में मेहर (Dower) के प्रकारों को उदाहरण सहित समझाइए।
मेहर मुस्लिम विवाह का आवश्यक तत्व है। यह पति द्वारा पत्नी को दिया जाने वाला आर्थिक अधिकार है।
इसके दो प्रकार हैं—
- मुअज्जल (Prompt Dower): विवाह के तुरंत बाद देय, जैसे— ₹50,000 विवाह के समय दिया गया।
- मुवज्जल (Deferred Dower): बाद में देय, जैसे— तलाक या मृत्यु के समय।
उद्देश्य: पत्नी की सुरक्षा, सम्मान और स्वतंत्र आर्थिक स्थिति सुनिश्चित करना।
मामला: Abdul Kadir v. Salima (1886) में कहा गया कि मेहर अनुबंध का अनिवार्य भाग है, इसका भुगतान न करना अनुबंध का उल्लंघन है।
प्रश्न 20. हिंदू और मुस्लिम विवाह की प्रकृति में मुख्य अंतर क्या हैं?
| बिंदु | हिंदू विवाह | मुस्लिम विवाह |
|---|---|---|
| प्रकृति | धार्मिक संस्कार | नागरिक अनुबंध |
| उद्देश्य | धर्म, संतानोत्पत्ति, संस्कार | सामाजिक वैधता और अनुबंध |
| मेहर | नहीं होता | आवश्यक तत्व |
| विवाह विच्छेद | सीमित आधारों पर | विभिन्न प्रकार के तलाक संभव |
| सहमति | धार्मिक रीति मुख्य | अनुबंध और गवाह आवश्यक |
| हिंदू विवाह भावनात्मक और धार्मिक दृष्टि से स्थायी बंधन है, जबकि मुस्लिम विवाह अनुबंधीय और अधिक लचीला माना गया है। |