मानव अधिकार कानून और व्यवहार (Human Rights Law and Practice)
भूमिका (Introduction)
मानव अधिकार (Human Rights) वे मूलभूत अधिकार हैं जो प्रत्येक व्यक्ति को केवल मानव होने के कारण प्राप्त होते हैं। ये अधिकार व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता और समानता की रक्षा करते हैं। मानव अधिकारों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति के साथ जाति, धर्म, लिंग, भाषा, वर्ग या राष्ट्रीयता के आधार पर कोई भेदभाव न हो। इन अधिकारों की रक्षा और संवर्धन के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक संधियाँ, घोषणाएँ तथा राष्ट्रीय स्तर पर कानून बनाए गए हैं। भारत में मानव अधिकारों की रक्षा संविधान, विधिक संस्थानों और राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (NHRC) के माध्यम से सुनिश्चित की जाती है।
मानव अधिकारों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background of Human Rights)
मानव अधिकारों की अवधारणा नई नहीं है। इसका उद्भव प्राचीन सभ्यताओं तक जाता है। वैदिक काल में भी “सर्वे भवन्तु सुखिनः” का विचार मानव समानता और अधिकारों का प्रतीक था। यूनान और रोम में नागरिक अधिकारों की धारणा विकसित हुई।
आधुनिक युग में मानव अधिकारों का विकास विशेष रूप से 17वीं और 18वीं शताब्दी के यूरोपीय पुनर्जागरण और उदारवादी आंदोलनों के साथ हुआ। अमेरिकी स्वतंत्रता घोषणा (1776) और फ्रांसीसी मानवाधिकार घोषणा (1789) ने मानव अधिकारों को सार्वभौमिक मूल्य के रूप में स्थापित किया।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब विश्व ने भयानक अत्याचार देखे, तब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 10 दिसंबर 1948 को मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (Universal Declaration of Human Rights – UDHR) पारित की, जिसने मानव अधिकारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैधता और पहचान दी।
मानव अधिकारों की परिभाषा (Definition of Human Rights)
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार,
“Human rights are rights inherent to all human beings, regardless of race, sex, nationality, ethnicity, language, religion, or any other status.”
अर्थात — मानव अधिकार वे अधिकार हैं जो प्रत्येक व्यक्ति को केवल मानव होने के कारण प्राप्त होते हैं, चाहे उसकी जाति, धर्म, लिंग, भाषा या किसी अन्य स्थिति में कोई भिन्नता क्यों न हो।
भारतीय दृष्टि से, मानव अधिकार व्यक्ति के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन की गरिमा सुनिश्चित करने वाले अधिकार हैं, जो संविधान और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों द्वारा संरक्षित हैं।
मानव अधिकारों के प्रकार (Types of Human Rights)
- नागरिक और राजनीतिक अधिकार (Civil and Political Rights)
- जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार
- समानता का अधिकार
- अभिव्यक्ति, विचार और धर्म की स्वतंत्रता
- न्यायसंगत सुनवाई का अधिकार
- यातना और अमानवीय व्यवहार से मुक्ति
- आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार (Economic, Social and Cultural Rights)
- शिक्षा का अधिकार
- काम करने और उचित वेतन पाने का अधिकार
- स्वास्थ्य और भोजन का अधिकार
- आवास और सामाजिक सुरक्षा का अधिकार
- सांस्कृतिक पहचान का संरक्षण
- सामूहिक अधिकार (Collective or Solidarity Rights)
- विकास का अधिकार
- स्व-निर्णय का अधिकार
- पर्यावरण संरक्षण का अधिकार
- शांति का अधिकार
अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार दस्तावेज़ (International Human Rights Instruments)
- Universal Declaration of Human Rights (UDHR), 1948
- यह मानव अधिकारों की “अंतरराष्ट्रीय संविधान” कही जाती है।
- इसमें 30 अनुच्छेद हैं जो प्रत्येक व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता और गरिमा की गारंटी देते हैं।
- International Covenant on Civil and Political Rights (ICCPR), 1966
- इसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, निष्पक्ष सुनवाई, मतदान का अधिकार जैसे अधिकार शामिल हैं।
- International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights (ICESCR), 1966
- इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा की गई है।
- Convention on the Elimination of All Forms of Discrimination Against Women (CEDAW), 1979
- महिलाओं के समान अधिकार और अवसर सुनिश्चित करने हेतु विशेष संधि।
- Convention on the Rights of the Child (CRC), 1989
- बच्चों के जीवन, शिक्षा और सुरक्षा के अधिकारों की रक्षा करता है।
भारत में मानव अधिकारों की संवैधानिक सुरक्षा (Constitutional Protection of Human Rights in India)
भारत का संविधान मानव अधिकारों का सबसे बड़ा संरक्षक है। संविधान के भाग III (मौलिक अधिकार) और भाग IV (राज्य के नीति निदेशक तत्व) दोनों मिलकर नागरिकों को न्याय, समानता, स्वतंत्रता और गरिमा प्रदान करते हैं।
(1) मौलिक अधिकार (Fundamental Rights):
- अनुच्छेद 14 – कानून के समक्ष समानता
- अनुच्छेद 19 – स्वतंत्रता के अधिकार
- अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
- अनुच्छेद 23 – मानव तस्करी और बंधुआ मजदूरी का निषेध
- अनुच्छेद 25 – धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
- अनुच्छेद 32 – संविधानिक उपचार का अधिकार
(2) नीति निदेशक तत्व (Directive Principles of State Policy):
राज्य को ऐसे नीतिगत उपाय अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं जो नागरिकों को सामाजिक और आर्थिक न्याय प्रदान करें। जैसे –
- अनुच्छेद 39 – समान कार्य के लिए समान वेतन
- अनुच्छेद 41 – काम, शिक्षा और सार्वजनिक सहायता का अधिकार
- अनुच्छेद 47 – पोषण स्तर और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार
मानव अधिकार अधिनियम, 1993 (Protection of Human Rights Act, 1993)
भारत सरकार ने मानव अधिकारों के संरक्षण और संवर्धन के लिए यह अधिनियम बनाया। इस अधिनियम के अंतर्गत राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (NHRC) और राज्य मानव अधिकार आयोग (SHRC) की स्थापना की गई।
मुख्य प्रावधान:
- मानव अधिकारों का अर्थ — “जीवन, स्वतंत्रता, समानता और व्यक्ति की गरिमा से संबंधित वे अधिकार जो संविधान या अंतरराष्ट्रीय संधियों द्वारा संरक्षित हैं।”
- आयोग की शक्तियाँ —
- शिकायतों की जांच
- हिरासत में अत्याचार, हत्या, बलात्कार आदि मामलों की जाँच
- मानव अधिकारों के प्रचार-प्रसार हेतु सुझाव
- सरकार को अनुशंसाएँ देना
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (National Human Rights Commission – NHRC)
स्थापना: 12 अक्टूबर 1993 को।
अध्यक्ष: भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश या न्यायाधीश।
संरचना: अध्यक्ष, चार सदस्य और चार कार्यात्मक आयोग।
मुख्य कार्य:
- मानव अधिकारों के उल्लंघन की जांच करना
- निवारक एवं सुधारात्मक उपायों की सिफारिश करना
- मानव अधिकारों के प्रति जन-जागरूकता फैलाना
- सरकार को मानव अधिकार नीतियाँ बनाने में सलाह देना
सीमाएँ:
- इसकी सिफारिशें बाध्यकारी नहीं होतीं।
- मामलों में हस्तक्षेप तभी संभव है जब वे एक वर्ष के भीतर दर्ज किए जाएँ।
मानव अधिकारों के व्यवहारिक पहलू (Human Rights in Practice in India)
भारत में मानव अधिकारों की सुरक्षा के लिए संवैधानिक और वैधानिक व्यवस्था तो है, परंतु व्यवहारिक रूप में कई चुनौतियाँ हैं।
- पुलिस अत्याचार और हिरासत में मौतें: अनेक रिपोर्टों में पुलिस द्वारा अत्याचार और अवैध हिरासत की घटनाएँ सामने आती हैं।
- महिलाओं और बच्चों पर हिंसा: घरेलू हिंसा, बलात्कार, दहेज हत्या, बाल श्रम जैसे अपराध अब भी प्रचलित हैं।
- जातीय और धार्मिक भेदभाव: समाज के कुछ वर्ग अब भी भेदभाव और सामाजिक अन्याय का शिकार हैं।
- पर्यावरणीय उल्लंघन: विकास परियोजनाओं में विस्थापन और प्रदूषण मानव अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।
- न्यायिक विलंब: न्याय प्रणाली में देरी मानव अधिकारों के प्रभावी संरक्षण में बाधा है।
न्यायालयों की भूमिका (Role of Judiciary in Human Rights Protection)
भारतीय न्यायपालिका ने मानव अधिकारों की रक्षा में अत्यंत सक्रिय भूमिका निभाई है।
मुख्य न्यायिक निर्णय:
- मनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) – सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत “जीवन का अधिकार” केवल शारीरिक अस्तित्व नहीं बल्कि सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार भी है।
- सुनिल बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन (1980) – जेलों में कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार को असंवैधानिक ठहराया गया।
- ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन (1985) – जीविका का अधिकार भी जीवन के अधिकार में सम्मिलित है।
- विश्वा लोचन मदन बनाम भारत संघ (2013) – धार्मिक आस्था के नाम पर असंवैधानिक कार्यों पर रोक लगाई गई।
इन निर्णयों ने मानव अधिकारों की न्यायिक व्याख्या को व्यापक बनाया और भारत को एक मानवाधिकार-संवेदनशील राष्ट्र के रूप में स्थापित किया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की भूमिका (India’s Role in Global Human Rights Framework)
भारत ने मानव अधिकारों के क्षेत्र में सक्रिय योगदान दिया है।
- भारत ने UDHR (1948) का समर्थन करने वाले प्रथम देशों में से एक था।
- ICCPR, ICESCR, CEDAW, CRC जैसी कई संधियों पर हस्ताक्षर किए हैं।
- संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद (UNHRC) में भारत नियमित सदस्य के रूप में भाग लेता है।
भारत का संविधान और न्यायपालिका अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप मानव अधिकारों की रक्षा करते हैं।
वर्तमान चुनौतियाँ (Current Challenges)
- राजनीतिक हिंसा और आतंकवाद – मानव जीवन के अधिकार पर सीधा आघात।
- डिजिटल युग में गोपनीयता का उल्लंघन – सूचना प्रौद्योगिकी और निगरानी से निजता खतरे में।
- महिलाओं और अल्पसंख्यकों पर हिंसा – समानता और गरिमा के अधिकार का हनन।
- विकास और विस्थापन – उद्योगों और परियोजनाओं से आदिवासी और ग्रामीण जनसंख्या प्रभावित।
- जलवायु परिवर्तन – पर्यावरणीय अधिकारों की नई चुनौती।
सुधार एवं उपाय (Suggestions and Reforms)
- मानव अधिकार शिक्षा को विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में अनिवार्य किया जाए।
- पुलिस सुधारों को लागू कर पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाई जाए।
- NHRC को बाध्यकारी शक्तियाँ दी जाएँ।
- न्यायिक प्रक्रियाओं को त्वरित और सुलभ बनाया जाए।
- नागरिक समाज और मीडिया को मानव अधिकारों के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
निष्कर्ष (Conclusion)
मानव अधिकारों की रक्षा किसी सभ्य समाज की पहचान है। भारत ने संवैधानिक, विधिक और न्यायिक माध्यमों से मानव अधिकारों को गहराई से अपनाया है। फिर भी, सामाजिक असमानता, भ्रष्टाचार, हिंसा और पर्यावरणीय संकट जैसी चुनौतियाँ इनके पूर्ण कार्यान्वयन में बाधक हैं।
मानव अधिकारों का संरक्षण केवल कानूनों या आयोगों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक नागरिक का नैतिक और सामाजिक दायित्व भी है। जब तक समाज में प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान, सुरक्षा और समान अवसर नहीं मिलेगा, तब तक मानव अधिकारों की वास्तविक सफलता अधूरी रहेगी।