1984 सिख विरोधी दंगों के पीड़ित और भारतीय न्यायपालिका: 41 वर्षों की न्यायिक प्रतीक्षा पर सवाल
भारत का लोकतंत्र न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका पर टिका हुआ है। इन तीन स्तंभों में न्यायपालिका को सबसे भरोसेमंद माना जाता है, क्योंकि यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने वाली अंतिम संस्था है। लेकिन जब न्यायपालिका ही किसी पीड़ित समुदाय को दशकों तक न्याय देने में विफल रहती है, तो यह गंभीर सवाल खड़े करता है। ऐसा ही मामला 1984 के सिख विरोधी दंगों का है, जिसने न केवल हजारों निर्दोषों की जान ली बल्कि जीवित बचे पीड़ितों को भी आज तक न्याय की तलाश में भटकने के लिए मजबूर किया।
यह लेख दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित LPA No. 671 of 2011 और उससे जुड़ी पीड़ितों की लड़ाई के संदर्भ में है, जिसमें 41 साल बीत जाने के बाद भी अंतिम न्याय नहीं हो पाया है।
1. 1984 के सिख विरोधी दंगे: एक ऐतिहासिक त्रासदी
31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश, विशेषकर दिल्ली में, सिख समुदाय पर सुनियोजित हिंसा हुई। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली में करीब 3,000 सिख मारे गए, जबकि स्वतंत्र रिपोर्टें इस संख्या को इससे कहीं अधिक मानती हैं।
- कई परिवारों के पुरुषों को सार्वजनिक रूप से मार दिया गया।
- घरों, दुकानों और गुरुद्वारों को आग के हवाले कर दिया गया।
- महिलाओं के साथ दुष्कर्म और अमानवीय हिंसा की गई।
यह हिंसा किसी स्वतःस्फूर्त घटना का परिणाम नहीं थी, बल्कि पीड़ितों और गवाहों का कहना है कि इसमें स्थानीय प्रशासन और पुलिस की मिलीभगत थी।
2. घटना दिनांक 05-11-1984 और एफआईआर नं. 1349/84
दिल्ली के पहाड़गंज क्षेत्र में 5 नवंबर 1984 को हुई घटना से संबंधित FIR No. 1349/84 दर्ज की गई थी। इसमें 17 सिखों को आरोपी बनाया गया।
लेकिन जांच और ट्रायल में यह सामने आया कि—
- पुलिस गवाहों के बयान वैज्ञानिक साक्ष्यों से मेल नहीं खाते।
- केंद्रीय फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (CSFL) की रिपोर्ट ने यह साबित किया कि बरामद हथियारों से कोई हत्या नहीं हुई थी।
- अभियोजन पक्ष ने 21 जुलाई 1988 को स्वयं यह स्वीकार किया कि केस को आगे बढ़ाना निरर्थक है।
इस आधार पर ट्रायल कोर्ट ने 8 दिसंबर 1988 को सभी 17 सिखों को बरी कर दिया।
3. राष्ट्रपति द्वारा जारी गैलेंट्री अवार्ड्स और विवाद
5 नवंबर 1984 की घटना को आधार बनाकर राष्ट्रपति द्वारा 15 अगस्त 1985 को गैलेंट्री अवार्ड्स (Gallantry Awards) जारी किए गए।
- ये पुरस्कार उन्हीं पुलिस गवाहियों पर आधारित थे, जिन्हें बाद में अदालत ने खारिज कर दिया।
- 1988 में जब सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया, तो स्वाभाविक था कि उन झूठे बयानों पर आधारित पुरस्कार रद्द किए जाने चाहिए थे।
- लेकिन इसके उलट, आज तक वे पुरस्कार बरकरार हैं और केंद्र सरकार यह मानती है कि वे वैध हैं।
यह स्थिति पीड़ितों के लिए दोहरी पीड़ा का कारण बनी—
- एक तरफ वे निर्दोष होने के बावजूद अपराधी बताए जाते रहे।
- दूसरी तरफ उन्हीं झूठे मामलों को आधार बनाकर दोषियों को सम्मानित किया गया।
4. पीड़ितों की न्यायिक लड़ाई और हाईकोर्ट का निर्णय (2011)
दो पीड़ितों ने दिल्ली हाईकोर्ट में Writ Civil Petition No. 11706/2005 और 1760/2007 दायर की।
उनकी मांग थी कि—
- जब उन्हें 1988 में बरी कर दिया गया है, तो आज भी उन्हें अपराधी क्यों बताया जा रहा है?
- झूठे गवाहियों पर दिए गए पुरस्कार क्यों बरकरार हैं?
लेकिन 7 अप्रैल 2011 को हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाएं खारिज कर दीं।
- अदालत ने सरकार के रुख को सही ठहराया।
- यह माना गया कि पुरस्कार सही तरीके से दिए गए थे।
यह निर्णय पीड़ितों के लिए बेहद निराशाजनक था।
5. लंबित अपील: LPA No. 671/2011
हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ LPA No. 671 of 2011 दायर की गई।
- यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट की डबल बेंच में लंबित है।
- लेकिन 2011 से अब तक 14 साल गुजर गए हैं और अपील पर कोई ठोस निर्णय नहीं आया।
- इस बीच 17 पीड़ितों में से केवल 7 जीवित बचे हैं, और उनमें से भी केवल एक व्यक्ति सक्रिय रूप से न्याय की लड़ाई लड़ रहा है।
पीड़ितों का कहना है कि अदालतें जानबूझकर लंबी तारीखें देती रही हैं ताकि मामला समय के साथ खत्म हो जाए और न्याय मृत हो जाए।
6. न्यायपालिका की भूमिका पर प्रश्नचिह्न
यह मामला भारतीय न्यायपालिका पर कई गंभीर सवाल उठाता है:
- न्याय में देरी
- 41 साल का लंबा इंतजार न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
- “Justice delayed is justice denied” (विलंबित न्याय, न्याय से वंचित होना है) – इस सिद्धांत को यहाँ नज़रअंदाज़ किया गया।
- मौलिक अधिकारों का उल्लंघन
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और गरिमा के अधिकार की गारंटी देता है।
- जब निर्दोषों को झूठे अपराधी घोषित कर सम्मानहीन किया गया, तो यह उनके मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
- सिस्टम पर भरोसा कमजोर होना
- पीड़ितों का कहना है कि न्यायपालिका, सरकार और प्रशासन ने मिलकर साजिश रची।
- इससे आम जनता का विश्वास भी डगमगाता है।
7. राजनीतिक और संवैधानिक संदर्भ
- संविधान का अनुच्छेद 32 और 226 नागरिकों को अदालत का दरवाजा खटखटाने का अधिकार देता है।
- लेकिन जब याचिकाएं सालों-साल लंबित रहती हैं, तो इन प्रावधानों का महत्व समाप्त हो जाता है।
- इस मामले में संविधान की धर्मनिरपेक्षता और न्याय की समानता पर भी प्रश्न उठते हैं।
8. पीड़ितों की वर्तमान स्थिति
- 17 में से केवल 7 पीड़ित जीवित हैं।
- उनमें से भी अधिकांश वृद्धावस्था और बीमारी से जूझ रहे हैं।
- एकमात्र सक्रिय पीड़ित अपनी अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ रहा है, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि उसकी स्थिति नाजुक है।
- यदि उसके निधन से पहले न्याय नहीं मिला, तो यह भारतीय न्यायपालिका पर एक स्थायी धब्बा होगा।
9. आलोचना और जनआक्रोश
- पीड़ित और उनके समर्थक कहते हैं कि यह मामला भारतीय न्यायपालिका की “शर्मनाक विफलता” का उदाहरण है।
- उनका आरोप है कि अदालतें और सरकारें पीड़ितों की मौत का इंतजार कर रही हैं ताकि मामला अपने आप समाप्त हो जाए।
- यह दृष्टिकोण न केवल असंवेदनशील है बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के भी खिलाफ है।
10. समाधान और भविष्य की राह
- तेजी से सुनवाई: अदालत को इस मामले की सुनवाई प्राथमिकता पर करनी चाहिए।
- गैलेंट्री अवार्ड्स की समीक्षा: झूठे मामलों पर आधारित पुरस्कार तुरंत वापस लिए जाएं।
- पीड़ितों का पुनर्वास: अब तक हुए मानसिक, सामाजिक और आर्थिक नुकसान की भरपाई की जाए।
- न्यायिक जवाबदेही: ऐसे मामलों में न्यायपालिका की देरी की जांच हो और जिम्मेदारों को चिन्हित किया जाए।
निष्कर्ष
1984 के दंगे केवल एक समुदाय पर हमला नहीं थे, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र और उसके संवैधानिक तंत्र की असफलता का प्रतीक भी थे। आज, 41 साल बाद भी, जब पीड़ित न्याय की प्रतीक्षा में हैं, तो यह न्यायपालिका और सरकार दोनों के लिए आत्मचिंतन का समय है।
LPA No. 671/2011 जैसे मामलों की लंबी सुनवाई और देरी ने यह संदेश दिया है कि भारत की न्यायपालिका अभी भी पीड़ितों के दर्द को सुनने में असमर्थ है। अगर अब भी सुधार नहीं हुआ, तो यह न केवल पीड़ितों के लिए बल्कि पूरे लोकतंत्र के लिए एक स्थायी घाव बन जाएगा।