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भारतीय साक्ष्य अधिनियम में साक्ष्य के बोझ और अनुमान के सिद्धांत

भारतीय साक्ष्य अधिनियम में साक्ष्य के बोझ और अनुमान के सिद्धांत

भूमिका

न्यायालय का प्रमुख कार्य है – विवादित तथ्यों के आधार पर न्यायपूर्ण निर्णय देना। किन्तु जब दो पक्ष न्यायालय के सामने अपने-अपने पक्ष प्रस्तुत करते हैं, तब प्रश्न उठता है कि कौन-सा पक्ष किस तथ्य को सिद्ध करने के लिए उत्तरदायी है। इसी उत्तरदायित्व को साक्ष्य का बोझ (Burden of Proof) कहा जाता है। इसके साथ-साथ, कई बार कानून या न्यायालय कुछ तथ्यों को सामान्य अनुभव, तर्क या विधिक सिद्धांतों के आधार पर पहले से ही मान लेता है। इस पूर्वधारणा को अनुमान (Presumptions) कहते हैं।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 में इन दोनों सिद्धांतों के विस्तृत प्रावधान हैं, जिनका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया को सरल, तर्कसंगत और प्रभावी बनाना है।


1. साक्ष्य का बोझ (Burden of Proof)

परिभाषा

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 101 के अनुसार—
“जो कोई भी यह चाहता है कि न्यायालय किसी विधिक अधिकार या दायित्व के संबंध में उसके पक्ष में निर्णय दे, तो उस व्यक्ति पर यह दायित्व है कि वह उस तथ्य को सिद्ध करे।”

अर्थात् – साक्ष्य का बोझ उस पक्ष पर होता है, जो किसी तथ्य को न्यायालय के समक्ष स्थापित करना चाहता है।


2. साक्ष्य के बोझ से संबंधित प्रावधान (धारा 101-114-A)

  1. धारा 101 – जो दावा करता है, उस पर सिद्ध करने का बोझ है।
  2. धारा 102 – यदि किसी पक्ष के पक्ष में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं होता, तो किस पक्ष को हानि होगी, उससे यह तय होता है कि बोझ किस पर है।
  3. धारा 103 – जिस व्यक्ति ने किसी विशेष तथ्य का दावा किया है, उस पर बोझ होगा।
  4. धारा 104 – यदि किसी साक्ष्य की स्वीकार्यता किसी अन्य तथ्य पर निर्भर है, तो उसे सिद्ध करने का बोझ भी उसी पर है।
  5. धारा 105 – सामान्य अपवाद (General Exceptions) का बोझ अभियुक्त पर होता है।
  6. धारा 106 – जो तथ्य विशेष रूप से किसी व्यक्ति के ज्ञान में है, उसका बोझ उसी पर होगा।
  7. धारा 107-108 – जीवन और मृत्यु से संबंधित अनुमान (सात वर्ष तक जीवित माना जाएगा, सात वर्ष से अधिक अनुपस्थिति में मृत मान लिया जाएगा)।
  8. धारा 109-112 – पति-पत्नी के संबंध, प्रतिनिधि, वैधता आदि से संबंधित अनुमान।
  9. धारा 113-A और 113-B – आत्महत्या और दहेज मृत्यु से संबंधित अनुमान।
  10. धारा 114 और 114-A – सामान्य अनुमान और बलात्कार से संबंधित अनुमान।

3. साक्ष्य के बोझ के सिद्धांत

(i) सिविल मामलों में

सिविल वादों में सामान्य नियम है कि “जिसका दावा, उसी पर सिद्ध करने का बोझ।”

  • उदाहरण: यदि वादी कहता है कि प्रतिवादी ने उससे ₹50,000 उधार लिया, तो वादी को ऋण सिद्ध करना होगा।

(ii) आपराधिक मामलों में

आपराधिक न्याय में सामान्य सिद्धांत है—
“अभियुक्त तब तक निर्दोष माना जाएगा जब तक उसका अपराध संदेह से परे सिद्ध न हो।”
इसलिए अभियोजन (Prosecution) पर अपराध सिद्ध करने का बोझ होता है।

  • परंतु यदि अभियुक्त कोई अपवाद (जैसे आत्मरक्षा) का दावा करता है, तो उसे साबित करना होगा (धारा 105)।

(iii) विशेष परिस्थितियाँ

  • यदि तथ्य केवल अभियुक्त के ज्ञान में है (धारा 106), तो सिद्ध करने का बोझ उसी पर है।
  • यदि कोई व्यक्ति सात वर्ष से अनुपस्थित है और उसका पता नहीं है, तो यह माना जाएगा कि वह मृत है (धारा 108)।

4. अनुमान (Presumptions) का सिद्धांत

अनुमान (Presumption) का अर्थ है – किसी तथ्य के अस्तित्व को बिना प्रत्यक्ष प्रमाण के, सामान्य अनुभव, तर्क या कानून के आधार पर स्वीकार करना।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम में अनुमान तीन प्रकार के हैं—

  1. May Presume (विवेकाधीन अनुमान) – न्यायालय चाहे तो मान ले और चाहे तो न माने।
    • उदाहरण: धारा 114 के अंतर्गत, न्यायालय मान सकता है कि डाक सामान्य रूप से सही पते पर पहुँच गई होगी।
  2. Shall Presume (अनिवार्य अनुमान) – न्यायालय मानने के लिए बाध्य है, परंतु प्रतिपक्ष इसका खंडन कर सकता है।
    • उदाहरण: धारा 113-A (आत्महत्या के मामलों में पति या ससुराल पक्ष का दुरुपयोग)।
  3. Conclusive Proof (अपरिवर्तनीय अनुमान) – न्यायालय इसे पूर्ण सत्य मान लेगा, इसका खंडन नहीं किया जा सकता।
    • उदाहरण: धारा 112 (यदि विवाह के दौरान पत्नी से संतान उत्पन्न होती है, तो पति ही पिता माना जाएगा)।

5. अनुमान से संबंधित प्रमुख धाराएँ

  1. धारा 107-108 – जीवन और मृत्यु का अनुमान।
  2. धारा 109 – संबंधों की निरंतरता का अनुमान।
  3. धारा 110 – संपत्ति के कब्जे से स्वामित्व का अनुमान।
  4. धारा 111 – फिद्यूशियरी संबंधों का अनुमान।
  5. धारा 112 – वैधता (Legitimacy) का अनुमान।
  6. धारा 113-A और 113-B – आत्महत्या और दहेज मृत्यु।
  7. धारा 114 – सामान्य अनुमान (जैसे— चोरी का सामान यदि तुरंत किसी के पास मिले तो वही चोर है)।
  8. धारा 114-A – बलात्कार मामलों में महिला की गवाही को निर्णायक मानना।

6. न्यायिक दृष्टिकोण

(i) Woolmington v. Director of Public Prosecutions (1935, UK)

इस मामले में कहा गया—
“आपराधिक मामलों में बोझ हमेशा अभियोजन पर होता है और उसे संदेह से परे अपराध सिद्ध करना होता है।”

(ii) Shambhu Nath Mehra v. State of Ajmer (1956, SC)

सुप्रीम कोर्ट ने कहा—
“धारा 106 का प्रयोग तभी होता है जब तथ्य विशेष रूप से अभियुक्त के ज्ञान में हों, अन्यथा सामान्य बोझ अभियोजन पर ही रहेगा।”

(iii) Hanumant v. State of Madhya Pradesh (1952, SC)

अदालत ने कहा कि आपराधिक मामलों में परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी संदेह से परे सिद्ध होना चाहिए।

(iv) State of U.P. v. Naresh (2011, SC)

अदालत ने कहा कि धारा 113-B (दहेज मृत्यु) के अंतर्गत न्यायालय यह मानने के लिए बाध्य है कि मृत्यु दहेज उत्पीड़न के कारण हुई।


7. व्यावहारिक महत्व

  1. सिविल न्याय – साक्ष्य का बोझ तय करता है कि किसे तथ्य सिद्ध करना है।
  2. आपराधिक न्याय – निर्दोषता की धारणा (Presumption of Innocence) अभियुक्त की सुरक्षा करती है।
  3. महिला संरक्षण कानून – दहेज मृत्यु और बलात्कार मामलों में अनुमान का सिद्धांत पीड़िता के हित में है।
  4. संपत्ति विवाद – कब्जे से स्वामित्व का अनुमान।

8. सीमाएँ

  • कभी-कभी अनुमान का अति प्रयोग अभियुक्त के अधिकारों का उल्लंघन कर सकता है।
  • बोझ के स्थानांतरण से न्याय की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।
  • केवल अनुमान के आधार पर दोषसिद्धि न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।

निष्कर्ष

भारतीय साक्ष्य अधिनियम में साक्ष्य के बोझ और अनुमान के सिद्धांत न्यायिक प्रक्रिया की रीढ़ हैं।

  • साक्ष्य का बोझ यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक पक्ष केवल उन्हीं तथ्यों को सिद्ध करे जिन्हें उसने प्रस्तुत किया है।
  • अनुमान न्यायालय को सामान्य अनुभव और विधिक सिद्धांतों के आधार पर तर्कसंगत निर्णय लेने में सहायता करता है।

दोनों सिद्धांतों का संयुक्त उद्देश्य है – न्याय को सरल, तर्कसंगत और संतुलित बनाना।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि—
“Burden of Proof is the responsibility to prove, while Presumptions are the aids of law to assume certain facts.”