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“हमें आश्चर्य है कि क्या हाईकोर्ट हमारे फैसलों से अवगत है?” — राज्य की अपील में 1612 दिनों की देरी माफ करने पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी नाराज़गी

“हमें आश्चर्य है कि क्या हाईकोर्ट हमारे फैसलों से अवगत है?” — राज्य की अपील में 1612 दिनों की देरी माफ करने पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी नाराज़गी

प्रस्तावना

     भारतीय न्याय व्यवस्था में सीमाबद्धता (Limitation) का सिद्धांत केवल एक तकनीकी नियम नहीं, बल्कि न्यायिक अनुशासन, निष्पक्षता और कानूनी निश्चितता का मूल आधार है। हाल के एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (MP High Court) के एक आदेश पर गहरी नाराज़गी व्यक्त की, जिसमें राज्य सरकार की अपील में 1612 दिनों (लगभग साढ़े चार वर्ष) की देरी को माफ कर दिया गया था।

       इस अवसर पर सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा:

“हमें यह सोचकर आश्चर्य होता है कि क्या हाईकोर्ट हमारे फैसलों से अवगत है?”

        यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्यायिक अनुशासन, सरकारी लापरवाही और देरी की संस्कृति पर गंभीर सवाल खड़े करती है।


मामले की पृष्ठभूमि

        मध्य प्रदेश राज्य सरकार ने एक निचली अदालत के निर्णय के विरुद्ध अपील दायर की थी। यह अपील कानून द्वारा निर्धारित समय-सीमा के भीतर दाखिल नहीं की गई, बल्कि इसमें 1612 दिनों की अत्यधिक देरी हुई।

राज्य सरकार ने देरी के लिए निम्नलिखित कारण बताए:

  • फाइलों का एक विभाग से दूसरे विभाग में स्थानांतरण
  • प्रशासनिक प्रक्रियाओं में विलंब
  • अधिकारियों से अनुमोदन प्राप्त करने में समय लगना

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इन कारणों को स्वीकार करते हुए देरी को माफ कर दिया और अपील को सुनवाई योग्य मान लिया।


सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रश्न

जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आया, तो मुख्य प्रश्न यह था कि:

  1. क्या राज्य सरकार के लिए अलग और उदार मानदंड अपनाए जा सकते हैं?
  2. क्या सामान्य और रूढ़िवादी कारण (Routine Explanations) 1612 दिनों की देरी को उचित ठहरा सकते हैं?
  3. क्या हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा बार-बार स्थापित सिद्धांतों की अनदेखी की?

सुप्रीम कोर्ट की तीखी प्रतिक्रिया

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के दृष्टिकोण पर असंतोष व्यक्त करते हुए कहा कि:

  • देरी माफ करना कोई अधिकार नहीं, बल्कि विवेकाधीन शक्ति (Discretionary Power) है।
  • यह शक्ति यांत्रिक ढंग से या केवल इसलिए नहीं दी जा सकती कि अपीलकर्ता राज्य सरकार है

न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा:

“राज्य यह मानकर नहीं चल सकता कि उसकी हर देरी स्वतः माफ कर दी जाएगी।”


1612 दिनों की देरी: न्यायिक दृष्टि से गंभीर मुद्दा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:

  • 1612 दिनों की देरी साधारण देरी नहीं है।
  • इतनी लंबी अवधि के लिए ठोस, विशिष्ट और विश्वसनीय कारण आवश्यक होते हैं।

सिर्फ यह कहना कि “प्रशासनिक कारणों से देरी हुई” कानूनन पर्याप्त नहीं है।


सरकारी लापरवाही पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि:

  • सरकारी विभागों में लालफीताशाही (Red Tapism)
  • फाइल संस्कृति (File Culture)
  • और निर्णय लेने में ढिलाई

इन कारणों को अब देरी माफी का वैध आधार नहीं माना जा सकता।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि:

“राज्य सरकार कोई विशेषाधिकार प्राप्त मुकदमेबाज (Privileged Litigant) नहीं है।”


हाईकोर्ट पर सीधी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट की सबसे गंभीर टिप्पणी यह थी:

“हमें यह सोचकर आश्चर्य होता है कि क्या हाईकोर्ट हमारे फैसलों से अवगत है?”

यह टिप्पणी इंगित करती है कि:

  • हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के स्थापित न्यायिक सिद्धांतों को नज़रअंदाज़ किया।
  • न्यायिक अनुशासन (Judicial Discipline) का पालन नहीं किया गया।

पूर्व निर्णयों का संदर्भ

सुप्रीम कोर्ट ने कई पुराने मामलों में यह स्पष्ट किया है कि:

  • देरी माफी का सिद्धांत समान रूप से सभी पर लागू होता है
  • सरकार को कोई विशेष रियायत नहीं दी जा सकती।

इन फैसलों के बावजूद, हाईकोर्ट द्वारा देरी माफ करना सुप्रीम कोर्ट को अस्वीकार्य लगा।


न्यायिक अनुशासन (Judicial Discipline) का महत्व

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि:

  • भारत की न्यायिक प्रणाली क्रमबद्ध (Hierarchical) है।
  • उच्चतम न्यायालय के फैसले सभी निचली अदालतों पर बाध्यकारी होते हैं।

यदि निचली अदालतें इन सिद्धांतों की अनदेखी करेंगी, तो इससे:

  • कानूनी अनिश्चितता
  • और न्यायिक अराजकता
    उत्पन्न हो सकती है।

आम नागरिक बनाम राज्य: समानता का सिद्धांत

न्यायालय ने कहा कि:

  • यदि कोई सामान्य नागरिक 1612 दिनों की देरी करता,
  • तो क्या उसकी देरी भी इसी तरह माफ की जाती?

यह प्रश्न अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है।


निर्णय का व्यापक प्रभाव

राज्य सरकारों पर प्रभाव

  • अब राज्य सरकारें यह मानकर नहीं चल सकतीं कि
    उनकी अपीलें देर से दाखिल होने पर भी स्वीकार कर ली जाएंगी।
  • प्रशासनिक सुधार और समयबद्ध निर्णय लेने की आवश्यकता पर बल।

हाईकोर्ट्स के लिए संदेश

  • सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का कड़ाई से पालन अनिवार्य है।
  • देरी माफी के मामलों में यांत्रिक दृष्टिकोण अपनाना अनुचित है।

न्याय प्रणाली पर प्रभाव

  • न्याय में देरी = न्याय से वंचित होना
  • इस सिद्धांत को और अधिक मजबूती मिलती है।

आलोचनात्मक विश्लेषण

कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि:

  • कभी-कभी सार्वजनिक हित के मामलों में
    राज्य को थोड़ी रियायत मिलनी चाहिए।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण स्पष्ट है:

  • सार्वजनिक हित का अर्थ प्रशासनिक लापरवाही को वैध ठहराना नहीं हो सकता।

निष्कर्ष

       मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा राज्य की अपील में 1612 दिनों की देरी माफ करने पर सुप्रीम कोर्ट की नाराज़गी भारतीय न्याय प्रणाली में एक सशक्त संदेश देती है।

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि:

कानून की समय-सीमा सभी के लिए समान है — चाहे वह सामान्य नागरिक हो या राज्य सरकार।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी न केवल एक न्यायिक फटकार है, बल्कि यह न्यायिक अनुशासन, समानता और उत्तरदायित्व की पुनः स्थापना भी है।

यह फैसला भविष्य में देरी माफी से जुड़े मामलों के लिए एक मील का पत्थर (Landmark Guideline) के रूप में कार्य करेगा।