सैन्य और रक्षा कानून (मिलिट्री & डिफेंस लॉ): मार्शल लॉ, सशस्त्र बलों के अधिकार तथा युद्ध अपराधों पर मानवीय कानून का संवैधानिक और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण
भूमिका
किसी भी संप्रभु राष्ट्र की सुरक्षा उसकी सैन्य शक्ति, रणनीतिक नीति और कानूनी ढांचे पर आधारित होती है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में सैन्य और रक्षा कानून (Military & Defence Law) केवल युद्ध संचालन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संविधान, मानवाधिकार, अंतरराष्ट्रीय कानून और नागरिक स्वतंत्रताओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।
सेना, नौसेना और वायुसेना के अधिकार, मार्शल लॉ, राष्ट्रीय आपातकाल, तथा युद्ध अपराध और मानवीय कानून (International Humanitarian Law)—ये सभी विषय रक्षा कानून के केंद्रीय स्तंभ हैं।
1. सैन्य और रक्षा कानून की अवधारणा
सैन्य और रक्षा कानून वह विधिक व्यवस्था है जो सशस्त्र बलों की स्थापना, संचालन, अनुशासन, अधिकारों और दायित्वों को नियंत्रित करती है। भारत में इसका आधार निम्नलिखित कानूनों और प्रावधानों में निहित है—
- भारतीय संविधान
- आर्मी एक्ट, 1950
- नेवी एक्ट, 1957
- एयर फोर्स एक्ट, 1950
- सशस्त्र बल (विशेष शक्तियाँ) अधिनियम, 1958
- अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून और जिनेवा कन्वेंशन
2. भारतीय संविधान और रक्षा व्यवस्था
(क) संघ सूची और रक्षा विषय
भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची (संघ सूची) के अंतर्गत रक्षा, युद्ध, शांति, सशस्त्र बलों की तैनाती और सैन्य न्याय पूरी तरह केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
(ख) राष्ट्रपति की भूमिका
- अनुच्छेद 53: रक्षा शक्तियाँ राष्ट्रपति में निहित
- राष्ट्रपति सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर होते हैं
- युद्ध और शांति की घोषणा केंद्र सरकार की सलाह पर
3. मार्शल लॉ (Martial Law): अवधारणा और स्थिति
(क) मार्शल लॉ क्या है?
मार्शल लॉ वह स्थिति है जब असाधारण परिस्थितियों में सैन्य अधिकारियों को नागरिक प्रशासन पर अस्थायी नियंत्रण दिया जाता है। इसमें सामान्य नागरिक कानून आंशिक या पूर्ण रूप से निलंबित हो सकता है।
(ख) भारत में मार्शल लॉ
- भारतीय संविधान में “मार्शल लॉ” की स्पष्ट परिभाषा नहीं
- अनुच्छेद 34 के अंतर्गत संसद को अधिकार है कि वह मार्शल लॉ के दौरान किए गए कार्यों को वैध ठहरा सके
- भारत में अब तक औपचारिक रूप से मार्शल लॉ लागू नहीं हुआ
(ग) मार्शल लॉ बनाम आपातकाल
| मार्शल लॉ | राष्ट्रीय आपातकाल |
|---|---|
| सैन्य नियंत्रण | नागरिक शासन बना रहता है |
| संविधान आंशिक रूप से स्थगित | संविधान प्रभावी रहता है |
| न्यायालय सीमित | न्यायालय कार्यरत |
4. राष्ट्रीय आपातकाल और रक्षा कानून
(क) अनुच्छेद 352 – राष्ट्रीय आपातकाल
राष्ट्रीय आपातकाल तब लगाया जाता है जब—
- युद्ध
- बाहरी आक्रमण
- सशस्त्र विद्रोह
का खतरा हो।
(ख) प्रभाव
- केंद्र की शक्तियों में विस्तार
- मौलिक अधिकारों पर सीमाएँ
- सशस्त्र बलों की व्यापक तैनाती
5. सेना, नौसेना और वायुसेना के कानूनी अधिकार
(क) आर्मी एक्ट, 1950
- अनुशासन, कोर्ट मार्शल, दंड प्रक्रिया
- सैन्य अपराधों की परिभाषा
- सैनिकों के कर्तव्य और दायित्व
(ख) नेवी एक्ट, 1957
- नौसैनिक संचालन और समुद्री सुरक्षा
- युद्धपोतों और नौसैनिक ठिकानों की कानूनी व्यवस्था
(ग) एयर फोर्स एक्ट, 1950
- हवाई क्षेत्र की रक्षा
- सैन्य विमान संचालन के नियम
(घ) कोर्ट मार्शल प्रणाली
- जनरल कोर्ट मार्शल
- डिस्ट्रिक्ट कोर्ट मार्शल
- समरी कोर्ट मार्शल
6. सशस्त्र बलों और मौलिक अधिकार
(क) अनुच्छेद 33
संविधान के अनुच्छेद 33 के तहत संसद को यह अधिकार है कि वह—
- सशस्त्र बलों के सदस्यों के मौलिक अधिकारों को
- अनुशासन और कर्तव्य के हित में
- सीमित कर सके
(ख) संतुलन का सिद्धांत
न्यायालयों ने बार-बार कहा है कि—
“राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवाधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना अनिवार्य है।”
7. सशस्त्र बल (विशेष शक्तियाँ) अधिनियम – AFSPA
(क) उद्देश्य
- अशांत क्षेत्रों में सुरक्षा बलों को विशेष अधिकार
- आतंकवाद और विद्रोह से निपटना
(ख) विवाद
- मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप
- फर्जी मुठभेड़
- न्यायिक समीक्षा की मांग
(ग) न्यायालय का दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ने कहा—
“AFSPA के अंतर्गत भी मनमानी शक्ति की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
8. युद्ध अपराध (War Crimes): अवधारणा
(क) युद्ध अपराध क्या हैं?
युद्ध के दौरान किए गए वे कृत्य जो—
- नागरिकों की हत्या
- युद्धबंदियों पर अत्याचार
- बलात्कार और नरसंहार
- निषिद्ध हथियारों का प्रयोग
को शामिल करते हैं।
(ख) व्यक्तिगत आपराधिक उत्तरदायित्व
“आदेश का पालन” युद्ध अपराध से बचाव का आधार नहीं है।
9. अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून (International Humanitarian Law)
(क) जिनेवा कन्वेंशन
- 1949 के चार जिनेवा कन्वेंशन
- युद्धबंदियों, घायलों और नागरिकों की सुरक्षा
(ख) भारत और IHL
- भारत जिनेवा कन्वेंशन का पक्षकार
- भारतीय सेना द्वारा IHL का पालन अनिवार्य
(ग) मानवता बनाम सैन्य आवश्यकता
युद्ध में भी मानवता के सिद्धांत सर्वोपरि रहते हैं।
10. सैन्य कानून और न्यायपालिका
(क) न्यायिक समीक्षा
- कोर्ट मार्शल निर्णयों की सीमित समीक्षा
- संविधान का संरक्षण बना रहता है
(ख) ऐतिहासिक निर्णय
- Lt. Col. Prithi Pal Singh v. Union of India
- Naga People’s Movement v. Union of India
निष्कर्ष
सैन्य और रक्षा कानून केवल युद्ध से संबंधित नियमों का संकलन नहीं है, बल्कि यह संविधान, मानवाधिकार, राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के बीच संतुलन का जीवंत उदाहरण है।
मार्शल लॉ और आपातकाल जैसे असाधारण उपायों का प्रयोग केवल अंतिम विकल्प होना चाहिए।
सेना, नौसेना और वायुसेना को पर्याप्त कानूनी अधिकार मिलना आवश्यक है, परंतु उत्तरदायित्व और मानवीय मूल्यों के साथ।
अंततः, एक सशक्त राष्ट्र वही है जो सीमा पर कठोर और कानून के भीतर मानवीय हो।
प्रश्न 1. मार्शल लॉ क्या है और भारत में इसकी कानूनी स्थिति क्या है?
उत्तर:
मार्शल लॉ वह असाधारण कानूनी व्यवस्था है जिसमें सैन्य अधिकारियों को नागरिक प्रशासन पर अस्थायी नियंत्रण दिया जाता है। इसके दौरान सामान्य नागरिक कानून आंशिक या पूर्ण रूप से निलंबित हो सकते हैं।
भारत में मार्शल लॉ का कोई औपचारिक प्रावधान संविधान में नहीं है। संविधान अनुच्छेद 34 के तहत संसद को यह अधिकार है कि मार्शल लॉ के दौरान किए गए कार्यों को वैध ठहराया जा सके। भारत में अब तक औपचारिक रूप से मार्शल लॉ लागू नहीं हुआ, और इसे राष्ट्रीय आपातकाल से अलग माना जाता है।
प्रश्न 2. भारतीय संविधान में सशस्त्र बलों के अधिकार और मौलिक अधिकारों पर सीमाएँ कैसे निर्धारित की गई हैं?
उत्तर:
अनुच्छेद 33 के तहत संसद को अधिकार है कि वह सशस्त्र बलों के सदस्यों के मौलिक अधिकारों को अनुशासन और कार्यकुशलता की दृष्टि से सीमित कर सके। यह सुरक्षा और अनुशासन बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
उदाहरण के लिए, सेना के किसी अधिकारी को अनुशासनहीन कार्य के कारण अनुच्छेद 19 (स्वतंत्रता) का उल्लंघन होने पर भी दंडित किया जा सकता है। न्यायपालिका ने बार-बार कहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और मानव अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना अनिवार्य है।
प्रश्न 3. सशस्त्र बल (विशेष शक्तियाँ) अधिनियम (AFSPA) का उद्देश्य और विवाद क्या हैं?
उत्तर:
AFSPA का उद्देश्य अशांत क्षेत्रों में सुरक्षा बलों को विशेष अधिकार प्रदान करना है, जिससे वे आतंकवाद और विद्रोह का सामना कर सकें।
विवाद इस अधिनियम के मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित हैं—जैसे फर्जी मुठभेड़, नागरिकों पर अत्याचार। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि विशेष अधिकार का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता और न्यायिक समीक्षा संभव है।
प्रश्न 4. युद्ध अपराध (War Crimes) क्या हैं और उनका अंतरराष्ट्रीय महत्व क्या है?
उत्तर:
युद्ध अपराध वे कृत्य हैं जो युद्ध के दौरान किए जाते हैं और मानवीय कानून का उल्लंघन करते हैं। इनमें शामिल हैं—
- नागरिकों की हत्या या अत्याचार
- युद्धबंदियों पर अमानवीय व्यवहार
- बलात्कार और नरसंहार
- निषिद्ध हथियारों का प्रयोग
इन अपराधों के लिए व्यक्तिगत आपराधिक उत्तरदायित्व स्थापित होता है। “आदेश का पालन” युद्ध अपराध से बचाव का आधार नहीं है। भारत जिनेवा कन्वेंशन का पक्षकार है और युद्ध में IHL का पालन अनिवार्य है।
प्रश्न 5. अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून (IHL) और भारतीय सेना का अनुपालन कैसे सुनिश्चित किया जाता है?
उत्तर:
अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून (IHL) का उद्देश्य युद्ध में भी मानवता, गरिमा और नागरिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है। भारत ने 1949 के चार जिनेवा कन्वेंशन को अपनाया है।
भारतीय सेना में IHL का पालन अनिवार्य है—जैसे युद्धबंदियों और घायलों की सुरक्षा, निषिद्ध हथियारों का प्रयोग न करना और नागरिक संरचनाओं को निशाना न बनाना। न्यायपालिका भी सैन्य मामलों में मानवाधिकारों और मानवीय कानून के अनुपालन की समीक्षा करती है।