“सूरत शिक्षक–छात्र यौन शोषण मामला: POCSO, BNS और गर्भपात की कानूनी–नैतिक जटिलताएँ”
सूरत से सामने आया 23 वर्षीय महिला शिक्षिका और 13 वर्षीय छात्र से जुड़ा मामला न केवल आपराधिक कानून बल्कि सामाजिक नैतिकता, बाल अधिकार, महिला स्वास्थ्य और न्यायिक विवेक से जुड़े कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यह घटना बताती है कि जब किसी नाबालिग के साथ यौन संबंध का मामला सामने आता है, तो कानून कितना सख्त है और अदालतें किन मानकों पर निर्णय लेती हैं। इस मामले में शिक्षिका के गर्भवती होने, गर्भपात की अनुमति और POCSO तथा भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं के तहत कार्यवाही ने इसे और भी संवेदनशील बना दिया है।
घटना की पृष्ठभूमि
मामले के अनुसार, सूरत में एक 23 वर्षीय महिला शिक्षिका पर आरोप है कि उसने अपने 13 वर्षीय छात्र के साथ यौन संबंध बनाए, जिसके परिणामस्वरूप वह गर्भवती हो गई। चूंकि छात्र नाबालिग था, इसलिए उसकी सहमति कानूनन कोई महत्व नहीं रखती। यह सीधे तौर पर Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012 (POCSO Act) के तहत अपराध है।
जब यह मामला सामने आया, तो पुलिस ने जांच के बाद शिक्षिका को गिरफ्तार कर लिया। वह फिलहाल न्यायिक हिरासत में जेल में बंद है और मामला अदालत में विचाराधीन है।
गर्भावस्था और गर्भपात का प्रश्न
मामले ने उस समय नया मोड़ लिया जब यह सामने आया कि शिक्षिका लगभग 20 सप्ताह की गर्भवती है। प्रारंभ में शिक्षिका ने गर्भपात कराने से इनकार कर दिया था। यह उसका व्यक्तिगत और भावनात्मक निर्णय था, जिसे उसकी वकील ने भी अदालत के सामने रखा।
हालांकि, बाद में जब डॉक्टरों की मेडिकल रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत की गई, तो स्थिति बदल गई। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि:
- गर्भ में पल रहे भ्रूण का विकास सामान्य नहीं है,
- गर्भावस्था मां के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकती है,
- यदि गर्भ जारी रखा गया, तो बच्चे और मां दोनों की जान को जोखिम हो सकता है।
इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने Medical Termination of Pregnancy (MTP) Act के तहत 20 सप्ताह के गर्भपात की अनुमति प्रदान की।
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट की भूमिका
भारत में गर्भपात को लेकर कानून बेहद स्पष्ट है। MTP Act, 1971 (संशोधित 2021) के अनुसार:
- सामान्य परिस्थितियों में 20 सप्ताह तक गर्भपात की अनुमति है,
- 20 से 24 सप्ताह तक गर्भपात कुछ विशेष परिस्थितियों में संभव है,
- यदि गर्भावस्था महिला के जीवन के लिए खतरा हो या भ्रूण में गंभीर विकृति हो, तो अदालत की अनुमति से गर्भपात कराया जा सकता है।
इस मामले में डॉक्टरों की रिपोर्ट ने अदालत को यह विश्वास दिलाया कि यह “मेडिकल इमरजेंसी” का मामला है। इसलिए, अदालत ने महिला की प्रारंभिक असहमति के बावजूद, चिकित्सा और कानूनी संतुलन बनाते हुए गर्भपात की अनुमति दी।
POCSO Act के तहत अपराध
POCSO Act बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बनाया गया एक विशेष कानून है। इस मामले में पुलिस ने शिक्षिका के खिलाफ:
- धारा 4 – गंभीर यौन उत्पीड़न (Penetrative Sexual Assault),
- धारा 8 – यौन हमला (Sexual Assault),
- धारा 12 – यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment)
के तहत मामला दर्ज किया है।
यह ध्यान देने योग्य है कि POCSO Act जेंडर न्यूट्रल है। यानी अपराधी पुरुष हो या महिला, यदि पीड़ित बच्चा है तो कानून समान रूप से लागू होता है। समाज में अक्सर यह धारणा रहती है कि ऐसे मामलों में केवल पुरुष ही आरोपी होते हैं, लेकिन यह केस इस मिथक को तोड़ता है।
भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 137(2)
नए आपराधिक कानूनों के तहत, पुलिस ने शिक्षिका पर BNS की धारा 137(2) भी लगाई है। यह धारा नाबालिग के साथ यौन संबंध और विश्वास के दुरुपयोग से जुड़े अपराधों से संबंधित है।
एक शिक्षिका का अपने छात्र के साथ ऐसा संबंध बनाना “fiduciary relationship” यानी विश्वास के रिश्ते का घोर उल्लंघन माना जाता है। शिक्षक और छात्र का संबंध केवल शिक्षा तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसमें नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है।
सहमति का सवाल और कानून का दृष्टिकोण
इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत है – नाबालिग की सहमति का कोई महत्व नहीं। भले ही बच्चा किसी संबंध के लिए “राजी” क्यों न हो, कानून उसे शोषण ही मानता है।
सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट बार-बार स्पष्ट कर चुके हैं कि:
- 18 वर्ष से कम आयु का व्यक्ति यौन सहमति देने में सक्षम नहीं है,
- इसलिए ऐसे मामलों में “आपसी सहमति” का तर्क अस्वीकार्य है।
इस केस में भी यही सिद्धांत लागू होता है।
सामाजिक और नैतिक आयाम
यह मामला समाज के सामने कई असहज प्रश्न रखता है। आम तौर पर शिक्षक को एक मार्गदर्शक, संरक्षक और आदर्श माना जाता है। जब वही शिक्षक अपने पद का दुरुपयोग करता है, तो इसका असर केवल पीड़ित बच्चे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की साख पर सवाल उठता है।
इसके अलावा, महिला आरोपी होने के कारण समाज में इसे लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिलती हैं। कुछ लोग इसे सहानुभूति की दृष्टि से देखते हैं, जबकि कानून की नजर में अपराध का लिंग से कोई लेना-देना नहीं है।
अदालत की भूमिका और संतुलन
इस मामले में अदालत की भूमिका बेहद संवेदनशील रही है। एक ओर जहां उसे नाबालिग के अधिकारों और POCSO के सख्त प्रावधानों को लागू करना है, वहीं दूसरी ओर गर्भवती महिला के स्वास्थ्य और जीवन की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
अदालत ने:
- आरोपी को जेल भेजकर कानून का पालन सुनिश्चित किया,
- मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर गर्भपात की अनुमति देकर मानवीय दृष्टिकोण अपनाया,
- मामले को नियमित ट्रायल के लिए जारी रखा।
यह दर्शाता है कि न्याय प्रणाली केवल दंड देने तक सीमित नहीं है, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार संतुलित निर्णय लेने का प्रयास करती है।
आगे की कानूनी प्रक्रिया
फिलहाल शिक्षिका न्यायिक हिरासत में है और केस ट्रायल स्टेज पर है। आगे की प्रक्रिया में:
- गवाहों के बयान,
- मेडिकल और फॉरेंसिक सबूत,
- बच्चे का बयान (विशेष POCSO अदालत में),
- और बचाव पक्ष के तर्क
के आधार पर अदालत अंतिम निर्णय देगी। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो शिक्षिका को कठोर सजा का सामना करना पड़ सकता है।
निष्कर्ष
सूरत का यह मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि कानून, नैतिकता और समाज के अंतर्संबंधों को उजागर करने वाला उदाहरण है। यह स्पष्ट करता है कि:
- बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि है,
- शिक्षक जैसे विश्वासपात्र पदों पर बैठे लोगों से और अधिक जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है,
- और कानून लिंग, पद या परिस्थिति से ऊपर उठकर अपराध को अपराध ही मानता है।
साथ ही, यह मामला यह भी दर्शाता है कि अदालतें मानवीय पहलुओं को नजरअंदाज नहीं करतीं और जब महिला के जीवन और स्वास्थ्य का सवाल आता है, तो वे संवेदनशीलता के साथ निर्णय लेती हैं। आने वाले समय में इस केस का फैसला न केवल कानूनी दृष्टि से, बल्कि सामाजिक चेतना के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाएगा।