सुप्रीम कोर्ट में “मुकदमों की बाढ़” और न्यायाधीशों की कमी: न्याय व्यवस्था के सामने वास्तविक संकट
प्रस्तावना — तकनीक नहीं, मानव संसाधन है असली समाधान
भारतीय न्यायपालिका आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ न्याय की गुणवत्ता, गति और विश्वसनीयता तीनों पर गंभीर प्रश्नचिह्न उभर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस दीपंकर दत्ता द्वारा व्यक्त की गई चिंता — कि सुप्रीम कोर्ट में “मुकदमों का विस्फोट (Explosion of Litigation)” हो चुका है और किसी भी स्तर की कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) न्यायाधीशों की कमी की भरपाई नहीं कर सकती — केवल एक व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं, बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र के लिए चेतावनी है।
यह वक्तव्य उस सोच को चुनौती देता है जो यह मानती है कि डिजिटलाइजेशन, वर्चुअल कोर्ट, AI आधारित शोध या ऑटोमेशन ही न्यायिक सुधार का अंतिम समाधान हैं। वास्तविकता यह है कि न्याय व्यवस्था का मूल आधार मानव विवेक, संवेदनशीलता और न्यायिक अनुभव है — जिसे कोई एल्गोरिथ्म प्रतिस्थापित नहीं कर सकता।
1. मुकदमों की बढ़ती संख्या — न्यायिक व्यवस्था पर असहनीय दबाव
सुप्रीम कोर्ट, जो संविधान का संरक्षक और अंतिम अपीलीय मंच है, अब ऐसे मामलों से भर चुका है जिन्हें सिद्धांततः निचली अदालतों या उच्च न्यायालयों में ही अंतिम रूप से निपट जाना चाहिए था। पिछले वर्षों में मामलों की दाखिला संख्या में तीव्र वृद्धि हुई है। इसका कारण केवल जनसंख्या वृद्धि नहीं, बल्कि:
- बढ़ती कानूनी जागरूकता
- मौलिक अधिकारों के प्रति सजगता
- शासन के निर्णयों को चुनौती देने की प्रवृत्ति
- प्रशासनिक और नियामक विवादों में वृद्धि
- जनहित याचिकाओं (PIL) का विस्तार
इन कारणों से सुप्रीम कोर्ट एक संवैधानिक न्यायालय से अधिक सामान्य अपीलीय न्यायालय बनता जा रहा है। परिणामस्वरूप, संविधान से जुड़े गंभीर प्रश्नों की सुनवाई में भी देरी होने लगी है।
2. न्यायाधीशों की संख्या — समस्या का मूल
सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या वर्षों से लगभग स्थिर है, जबकि मामलों की संख्या कई गुना बढ़ चुकी है। न्यायिक कार्य केवल सुनवाई करना नहीं होता; इसमें शामिल हैं:
- विस्तृत रिकॉर्ड का अध्ययन
- विधिक शोध
- पूर्व निर्णयों का विश्लेषण
- संतुलित और तर्कपूर्ण निर्णय लिखना
यदि एक न्यायाधीश प्रतिदिन दर्जनों मामलों की सूची में व्यस्त है, तो गहन विचार और गुणवत्ता युक्त निर्णय की संभावना स्वाभाविक रूप से प्रभावित होती है। न्यायाधीशों पर अत्यधिक कार्यभार मानसिक दबाव, निर्णयों में विलंब, और कभी-कभी निर्णयों की गुणवत्ता में गिरावट का कारण बन सकता है।
3. AI की भूमिका — सहायक, पर निर्णायक नहीं
तकनीकी समर्थक अक्सर यह तर्क देते हैं कि AI न्यायिक प्रक्रिया को तेज कर सकता है। यह आंशिक रूप से सही है। AI निम्न कार्यों में सहायक हो सकता है:
- केस लॉ सर्च
- दस्तावेज़ प्रबंधन
- तारीख प्रबंधन
- प्रारंभिक ड्राफ्टिंग
- डेटा एनालिटिक्स
परंतु न्यायिक निर्णय केवल डेटा प्रोसेसिंग नहीं है। न्यायाधीश को यह समझना होता है:
- गवाह की विश्वसनीयता
- बयान के पीछे की मंशा
- सामाजिक परिस्थितियाँ
- नैतिक संतुलन
- मानवीय पीड़ा
AI के पास न तो नैतिक चेतना है, न सामाजिक अनुभव, न संवेदनशीलता। न्याय एक यांत्रिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानव मूल्य आधारित विवेकपूर्ण निर्णय है।
4. न्याय का मानवीय आयाम
जस्टिस दत्ता की बात का सार यह है कि मुकदमे केवल कानूनी विवाद नहीं होते — वे मानवीय संघर्षों की कहानियाँ होते हैं। हत्या के मामले में केवल IPC की धारा लागू करना पर्याप्त नहीं; न्यायाधीश को यह देखना पड़ता है:
- घटना की पृष्ठभूमि
- भावनात्मक उकसावे की स्थिति
- सामाजिक तनाव
- परिस्थितिजन्य दबाव
इसी प्रकार पारिवारिक विवाद, श्रमिक मामले, भूमि अधिग्रहण, या मानवाधिकार के मामलों में संवेदनशील दृष्टिकोण आवश्यक है। मशीन इन जटिल मानवीय पहलुओं का आकलन नहीं कर सकती।
5. तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता का खतरा
यदि वकील या न्यायिक अधिकारी बिना सत्यापन AI-जनित सामग्री पर निर्भर होने लगें, तो:
- तथ्यात्मक त्रुटियाँ बढ़ सकती हैं
- गलत उद्धरण हो सकते हैं
- न्यायिक विश्वास को क्षति पहुँच सकती है
न्यायिक प्रणाली का आधार विश्वास है — बार और बेंच के बीच। यदि यह विश्वास कमजोर हुआ, तो पूरी प्रणाली की विश्वसनीयता प्रभावित होगी।
6. समाधान — केवल नियुक्ति नहीं, संरचनात्मक सुधार
जस्टिस दत्ता का संकेत केवल संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। समाधान बहुआयामी होना चाहिए:
(i) न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि
उच्चतम न्यायालय सहित सभी स्तरों पर रिक्त पद शीघ्र भरे जाएँ।
(ii) अपील प्रणाली का पुनर्गठन
हर मामला सुप्रीम कोर्ट तक न पहुँचे; फ़िल्टर मैकेनिज्म मजबूत हो।
(iii) केस मैनेजमेंट सुधार
अनावश्यक स्थगन (adjournments) पर नियंत्रण।
(iv) विशेष बेंच और विषय विशेषज्ञता
संवैधानिक, कर, वाणिज्यिक, आपराधिक मामलों के लिए विशेषज्ञ पीठ।
(v) निचली अदालतों का सुदृढ़ीकरण
यदि निचले स्तर पर गुणवत्तापूर्ण निर्णय होंगे, तो अपील कम होंगी।
7. न्याय में देरी — लोकतंत्र के लिए खतरा
न्याय में अत्यधिक देरी केवल प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि संवैधानिक संकट है। अनुच्छेद 21 के अंतर्गत “त्वरित न्याय” मौलिक अधिकार का हिस्सा माना गया है। यदि मुकदमा दशकों तक चलता है, तो न्याय का अर्थ ही समाप्त हो जाता है।
8. भविष्य की दिशा — संतुलित दृष्टिकोण
भारत को तकनीक से दूरी नहीं बनानी, बल्कि उसे सहायक उपकरण के रूप में अपनाना है। परंतु न्याय का अंतिम निर्णय मानव हाथों में ही रहना चाहिए। AI न्यायाधीश का सहयोगी हो सकता है, विकल्प नहीं।
निष्कर्ष — न्याय की आत्मा मानव विवेक में है
जस्टिस दीपंकर दत्ता की टिप्पणी हमें यह याद दिलाती है कि न्याय केवल प्रक्रिया नहीं, बल्कि नैतिक दायित्व है। अदालतें मशीनों से नहीं, विवेकशील मानवों से चलती हैं। यदि मुकदमों की बाढ़ बढ़ती रही और न्यायाधीशों की संख्या नहीं बढ़ी, तो तकनीकी प्रगति भी न्याय को बचा नहीं पाएगी।
इसलिए समय की माँग है:
“अधिक न्यायाधीश, बेहतर संरचना, और सहायक तकनीक” — यही न्यायिक भविष्य का संतुलित मार्ग है। न्याय की आत्मा को जीवित रखने के लिए मानव बुद्धि, संवेदना और अनुभव का स्थान कोई मशीन नहीं ले सकती।