सरकारी ठेकों में निषेधात्मक शर्तों की अनदेखी पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त चेतावनी State of Jharkhand बनाम The Indian Builders, Jamshedpur
भारत ड्रिलिंग निर्णय पर पुनर्विचार: बड़ी पीठ को संदर्भ और संविदा कानून में स्पष्टता की आवश्यकता
भूमिका
सरकारी ठेके (Government Contracts) केवल व्यापारिक लेन-देन नहीं होते, बल्कि वे सार्वजनिक धन, नीति और प्रशासनिक अनुशासन से सीधे जुड़े होते हैं। इन अनुबंधों में शामिल शर्तें—विशेषकर निषेधात्मक (Prohibitory / Restrictive Clauses)—राज्य के हितों की रक्षा के लिए जोड़ी जाती हैं। किंतु समय के साथ न्यायिक व्याख्याओं में कुछ ऐसे निर्णय सामने आए, जिनका उपयोग कर इन निषेधात्मक शर्तों को कमजोर करने का प्रयास किया गया।
इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने State of Jharkhand बनाम The Indian Builders, Jamshedpur मामले में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए अपने ही 2009 के निर्णय—
Bharat Drilling and Foundation Treatment Private Limited बनाम State of Jharkhand, (2009) 16 SCC 705 को बड़ी पीठ (Larger Bench) को संदर्भित कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस निर्णय का बार-बार और गलत तरीके से उपयोग कर सरकारी अनुबंधों की निषेधात्मक शर्तों को कमजोर किया जा रहा है, जो गंभीर चिंता का विषय है।
मामले की पृष्ठभूमि
झारखंड राज्य सरकार ने एक निर्माण परियोजना के लिए ठेका प्रदान किया था, जिसमें कुछ स्पष्ट निषेधात्मक शर्तें थीं, जैसे—
- ठेका किसी तीसरे पक्ष को स्थानांतरित नहीं किया जाएगा
- बिना अनुमति सब-कॉन्ट्रैक्टिंग नहीं होगी
- अनुबंध की शर्तों के उल्लंघन पर दंडात्मक परिणाम होंगे
The Indian Builders, Jamshedpur ने इन शर्तों के बावजूद कुछ ऐसे कार्य किए, जिन्हें राज्य सरकार ने अनुबंध का उल्लंघन माना। विवाद न्यायालय तक पहुँचा, जहाँ ठेकेदार पक्ष ने अपने बचाव में Bharat Drilling (2009) के निर्णय का सहारा लिया।
2009 का भारत ड्रिलिंग निर्णय
Bharat Drilling and Foundation Treatment Pvt. Ltd. बनाम State of Jharkhand (2009) में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ परिस्थितियों में यह कहा था कि—
- अनुबंध की शर्तों की व्याख्या यांत्रिक नहीं होनी चाहिए
- वास्तविक निष्पादन और राज्य को हुए लाभ को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए
हालाँकि यह निर्णय अपने तथ्यों तक सीमित था, परंतु बाद के वर्षों में इसे एक सामान्य सिद्धांत की तरह प्रयोग किया जाने लगा, जिससे सरकारी ठेकों की कठोर शर्तें शिथिल की जाने लगीं।
वर्तमान मामले में विवाद का मूल प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था—
क्या Bharat Drilling (2009) का निर्णय इस हद तक लागू किया जा सकता है कि वह सरकारी अनुबंधों में निहित निषेधात्मक शर्तों को निष्प्रभावी बना दे?
और उससे भी महत्वपूर्ण—
क्या इस निर्णय की व्याख्या उसके मूल तथ्यों से परे जाकर की जा रही है?
सुप्रीम कोर्ट की गंभीर टिप्पणी
न्यायालय ने कहा कि—
“The judgment in Bharat Drilling has been repeatedly relied upon, often incorrectly, to dilute clear prohibitory clauses in government contracts.”
(भारत ड्रिलिंग के निर्णय का बार-बार और कई बार गलत रूप से उपयोग किया गया है, ताकि सरकारी अनुबंधों में स्पष्ट निषेधात्मक शर्तों को कमजोर किया जा सके।)
यह टिप्पणी स्वयं में इस बात का संकेत है कि न्यायालय को अपनी पूर्व मिसाल के दुरुपयोग पर गहरी चिंता है।
बड़ी पीठ को संदर्भित करने का कारण
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को बड़ी पीठ को भेजते हुए निम्नलिखित कारण बताए—
- न्यायिक भ्रम (Judicial Confusion)
विभिन्न उच्च न्यायालय और ट्रिब्यूनल Bharat Drilling के निर्णय की अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं। - सरकारी अनुबंधों की पवित्रता पर खतरा
यदि निषेधात्मक शर्तें प्रभावहीन हो जाएँगी, तो सरकारी अनुबंध केवल औपचारिक दस्तावेज बनकर रह जाएँगे। - नीतिगत महत्व (Policy Implications)
यह प्रश्न केवल एक ठेके तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देश में सरकारी ठेकों की व्यवस्था को प्रभावित करता है।
निषेधात्मक शर्तों का महत्व
सरकारी अनुबंधों में निषेधात्मक शर्तें इसलिए जोड़ी जाती हैं ताकि—
- भ्रष्टाचार रोका जा सके
- ठेके का दुरुपयोग न हो
- कार्य की गुणवत्ता बनी रहे
- सार्वजनिक धन की सुरक्षा हो
इन शर्तों को शिथिल करना अनुच्छेद 14 के तहत समानता और लोक वित्तीय अनुशासन दोनों के विपरीत हो सकता है।
संविदा कानून और सार्वजनिक हित
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि—
- निजी अनुबंध और सरकारी अनुबंध समान नहीं होते
- सरकारी अनुबंधों में Public Interest सर्वोपरि होता है
इसलिए संविदा की स्वतंत्रता (Freedom of Contract) का सिद्धांत सरकारी ठेकों में सीमित रूप में लागू होता है।
राज्य बनाम ठेकेदार: शक्ति संतुलन
अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि राज्य अधिक शक्तिशाली पक्ष है, इसलिए अनुबंध की कठोर शर्तें अनुचित हैं। परंतु सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि—
- राज्य निजी लाभ के लिए नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित के लिए कार्य करता है
- अनुबंध में प्रवेश से पहले शर्तें ज्ञात होती हैं
- बाद में शर्तों को चुनौती देना अनुशासनहीनता को बढ़ावा देता है
न्यायिक अनुशासन और मिसालों की सीमाएँ
यह निर्णय न्यायिक अनुशासन (Judicial Discipline) के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने अप्रत्यक्ष रूप से कहा कि—
किसी निर्णय को उसके तथ्यों से अलग करके सामान्य नियम की तरह लागू करना न्यायिक त्रुटि है।
भविष्य की भर्ती और ठेका नीतियों पर प्रभाव
इस संदर्भ के बाद—
- बड़ी पीठ सरकारी अनुबंधों पर स्पष्ट दिशा-निर्देश देगी
- निषेधात्मक शर्तों की व्याख्या पर स्थिरता आएगी
- राज्य सरकारों को अनुबंध लागू करने में अधिक मजबूती मिलेगी
Bharat Drilling निर्णय का संभावित पुनर्मूल्यांकन
बड़ी पीठ यह तय कर सकती है कि—
- क्या Bharat Drilling केवल अपने तथ्यों तक सीमित रहेगा
- या उसमें कुछ सिद्धांतों का पुनर्निर्धारण आवश्यक है
- क्या उस निर्णय का गलत उपयोग रोकने के लिए स्पष्टीकरण जरूरी है
सार्वजनिक प्रशासन पर प्रभाव
यदि निषेधात्मक शर्तें कमजोर होती हैं, तो—
- सब-कॉन्ट्रैक्टिंग का दुरुपयोग बढ़ेगा
- अयोग्य एजेंसियाँ कार्य करेंगी
- परियोजनाओं की गुणवत्ता प्रभावित होगी
इसलिए यह निर्णय प्रशासनिक सुधार की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
State of Jharkhand बनाम The Indian Builders, Jamshedpur में सुप्रीम कोर्ट का यह कदम दर्शाता है कि—
न्यायालय न केवल कानून की व्याख्या करता है, बल्कि अपनी ही पूर्व मिसालों के दुरुपयोग पर भी आत्ममंथन करता है।
भारत ड्रिलिंग (2009) को बड़ी पीठ के समक्ष भेजना यह स्पष्ट करता है कि—
- सरकारी अनुबंधों की निषेधात्मक शर्तें औपचारिक नहीं हैं
- सार्वजनिक हित सर्वोपरि है
- न्यायिक निर्णयों का उपयोग विवेकपूर्ण और सीमित होना चाहिए
यह मामला भविष्य में सरकारी ठेका कानून (Government Contract Law) में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है और प्रशासनिक अनुशासन को नई मजबूती प्रदान करेगा।