“समाधान योजना के बाद पुराने कर बकाया समाप्त”: पतंजलि फूड्स प्रकरण में दिल्ली हाईकोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय
आईबीसी की सर्वोच्चता, ‘क्लीन स्लेट सिद्धांत’ और कर प्रशासन की सीमाएँ — जीएसटी बकाया पर न्यायिक स्पष्टता
कॉरपोरेट दिवाला कानून की बुनियादी अवधारणाओं को सुदृढ़ करते हुए Delhi High Court ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि 4 सितंबर 2019 से पूर्व के जीएसटी (GST) बकाया, पतंजलि फूड्स लिमिटेड की स्वीकृत दिवाला समाधान योजना (Insolvency Resolution Plan) के बाद कानूनन समाप्त (extinguished) माने जाएंगे। यह निर्णय Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 के मूल सिद्धांतों—विशेषकर अंतिमता (finality) और क्लीन स्लेट सिद्धांत (clean slate principle)—की पुनः पुष्टि करता है।
यह फैसला केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं है; बल्कि यह सरकारी कर बकायों, दिवाला प्रक्रिया, और निवेशकों के भरोसे से जुड़े व्यापक प्रश्नों पर स्पष्ट दिशा देता है।
मामले की पृष्ठभूमि: विवाद कैसे उत्पन्न हुआ?
पतंजलि फूड्स लिमिटेड (पूर्व में रुचि सोया इंडस्ट्रीज़) के विरुद्ध दिवाला कार्यवाही (CIRP) के दौरान विभिन्न लेनदारों—वित्तीय, परिचालन और वैधानिक—ने अपने दावे समाधान पेशेवर के समक्ष प्रस्तुत किए। इसी क्रम में जीएसटी विभाग ने भी कर-बकायों से जुड़े दावे किए।
हालाँकि, विवाद का मूल यह था कि:
- कुछ जीएसटी बकाया 4 सितंबर 2019 से पहले के थे,
- वे स्वीकृत समाधान योजना में शामिल नहीं किए गए,
- और योजना के अनुमोदन के बाद भी कर विभाग ने उनकी वसूली का प्रयास किया।
कंपनी ने इन वसूली प्रयासों को यह कहते हुए चुनौती दी कि आईबीसी के तहत योजना की स्वीकृति के बाद पुराने दावे समाप्त हो जाते हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी प्रश्न
अदालत के सामने केंद्रीय प्रश्न यह था:
क्या समाधान योजना की स्वीकृति के बाद, वे सरकारी/वैधानिक कर बकाया जिनका उल्लेख योजना में नहीं है, अलग से वसूल किए जा सकते हैं?
इस प्रश्न का उत्तर सीधे-सीधे आईबीसी की संरचना और उद्देश्य से जुड़ा था।
अदालत का निर्णय: पुराने जीएसटी बकाया समाप्त
दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि:
- आईबीसी की धारा 31 के तहत,
- एक बार समाधान योजना स्वीकृत हो जाए,
- तो वह कंपनी, सभी लेनदारों और सरकारी प्राधिकरणों पर बाध्यकारी हो जाती है।
अदालत ने आगे कहा कि:
- यदि कोई दावा (सरकारी कर बकाया सहित)
- समय पर प्रस्तुत नहीं किया गया
- या योजना में स्थान नहीं पाया,
तो वह दावा कानूनन समाप्त माना जाएगा।
इस प्रकार, 4 सितंबर 2019 से पहले के जीएसटी बकाया, जो योजना में शामिल नहीं थे, अब वसूल नहीं किए जा सकते।
‘क्लीन स्लेट सिद्धांत’ की पुनः पुष्टि
अदालत ने जोर देकर कहा कि क्लीन स्लेट सिद्धांत आईबीसी की आत्मा है। इसका अर्थ है:
- समाधान आवेदक जब कंपनी को संभालता है,
- तो वह पुराने दायित्वों से मुक्त एक नई शुरुआत करता है।
यदि पुराने कर बकायों को समाधान योजना के बाद भी जीवित रखा जाए, तो:
- कोई भी निवेशक दिवाला प्रक्रिया में भाग लेने से हिचकेगा,
- और आईबीसी का उद्देश्य—समयबद्ध पुनरुद्धार—विफल हो जाएगा।
सरकारी बकाया: कोई विशेषाधिकार नहीं
दिल्ली हाईकोर्ट ने यह धारणा स्पष्ट रूप से खारिज कर दी कि:
- सरकारी कर बकाया आईबीसी से ऊपर हैं।
अदालत ने कहा कि:
- सरकार भी आईबीसी के तहत एक लेनदार है,
- और उसे भी समय पर दावा दाखिल करना होगा।
यह टिप्पणी कर प्रशासन के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि आईबीसी की प्रक्रिया में निष्क्रियता का परिणाम स्थायी हानि हो सकता है।
4 सितंबर 2019 की कट-ऑफ तिथि का महत्व
अदालत ने इस तिथि को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि:
- इस तिथि से पहले के जीएसटी बकाया,
- यदि समाधान योजना में शामिल नहीं हैं,
- तो बाद में अलग से वसूली का कोई अधिकार नहीं बनता।
इससे करदाताओं, निवेशकों और समाधान आवेदकों को कानूनी निश्चितता मिलती है।
आईबीसी बनाम कर कानून: प्राथमिकता का प्रश्न
दिल्ली हाईकोर्ट ने दोहराया कि:
- आईबीसी एक विशेष कानून (Special Law) है,
- और टकराव की स्थिति में
- यह सामान्य कर कानूनों पर प्राथमिकता रखता है।
कारण स्पष्ट है:
- आईबीसी का उद्देश्य केवल वसूली नहीं,
- बल्कि कंपनी का पुनर्जीवन और आर्थिक स्थिरता है।
निवेशकों और कॉरपोरेट जगत के लिए प्रभाव
यह फैसला निवेशकों को यह भरोसा देता है कि:
- समाधान योजना के बाद
- कोई छुपा हुआ कर दायित्व सामने नहीं आएगा।
यह निर्णय:
- Ease of Doing Business
- और निवेश माहौल को मजबूत करता है,
क्योंकि यह अनिश्चितता को समाप्त करता है।
कर प्रशासन के लिए सीख
अदालत के फैसले से यह स्पष्ट है कि:
- कर विभागों को
- दिवाला कार्यवाही के दौरान
- सक्रिय रहना होगा,
- समय पर दावे दाखिल न करने का
- परिणाम गंभीर हो सकता है,
- आईबीसी की प्रक्रिया को
- हल्के में नहीं लिया जा सकता।
न्यायिक निरंतरता और पूर्व सिद्धांत
हालाँकि यह फैसला दिल्ली हाईकोर्ट का है, लेकिन यह:
- सुप्रीम कोर्ट द्वारा
- पहले से स्थापित आईबीसी सिद्धांतों
के अनुरूप है, जहाँ बार-बार कहा गया है कि: - समाधान योजना को
- अंतिमता और पवित्रता
मिलनी चाहिए।
- अंतिमता और पवित्रता
भविष्य के मामलों पर असर
इस निर्णय का प्रभाव:
- अन्य कॉरपोरेट देनदारों,
- समाधान आवेदकों,
- और सरकारी प्राधिकरणों
पर पड़ेगा।
अब यह लगभग तय है कि:
- समाधान योजना के बाद
- पुराने कर बकायों को लेकर
- नए विवाद खड़े नहीं किए जा सकेंगे।
निष्कर्ष
पतंजलि फूड्स मामले में दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला आईबीसी की आत्मा, निवेशक विश्वास और कानूनी निश्चितता—तीनों को सुदृढ़ करता है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि:
“समाधान योजना एक नई शुरुआत है,
न कि पुराने कर विवादों को ढोने का माध्यम।”
यह निर्णय बताता है कि दिवाला कानून का उद्देश्य केवल बकाया वसूलना नहीं, बल्कि व्यवसायों को पुनर्जीवित कर अर्थव्यवस्था को स्थिर करना है।
इस दृष्टि से यह फैसला भारतीय कॉरपोरेट कानून के विकास में एक मील का पत्थर माना जाएगा।