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समय-बाधित ऋण, चेक अनादरण और धारा 138 एन.आई. अधिनियम की सीमाएँ — अश्वनी कुमार बनाम राज कुमार : हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय

समय-बाधित ऋण, चेक अनादरण और धारा 138 एन.आई. अधिनियम की सीमाएँ — अश्वनी कुमार बनाम राज कुमार : हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का विस्तृत विधिक विश्लेषण

भूमिका

        परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (Negotiable Instruments Act, 1881) की धारा 138 भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में एक अत्यंत प्रभावी प्रावधान के रूप में उभरी है। इसका उद्देश्य वाणिज्यिक लेन-देन में विश्वास बनाए रखना और चेक जैसे परक्राम्य लिखतों की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना है। किंतु समय के साथ न्यायालयों ने यह स्पष्ट किया है कि धारा 138 का प्रयोग अंधाधुंध नहीं किया जा सकता। इसके लिए कुछ अनिवार्य शर्तों का पूरा होना आवश्यक है, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण है — कानूनी रूप से लागू करने योग्य ऋण या दायित्व का अस्तित्व

        12 दिसंबर 2025 को हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय अश्वनी कुमार बनाम राज कुमार (आपराधिक अपील संख्या 87/2013) में इन्हीं सिद्धांतों की पुनः पुष्टि की गई। यह निर्णय विशेष रूप से समय-बाधित (Time-Barred) ऋण, धारा 138 के दायरे, तथा धारा 9 के अंतर्गत ‘यथास्थिति धारक’ (Holder in Due Course) की अवधारणा को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।


मामले की संक्षिप्त पृष्ठभूमि

         शिकायतकर्ता अश्वनी कुमार का यह दावा था कि प्रतिवादी राज कुमार ने उससे ऋण लिया था। ऋण की अदायगी के लिए अभियुक्त ने एक चेक जारी किया, जिसे बैंक में प्रस्तुत किए जाने पर अनादृत (Dishonoured) कर दिया गया। इसके पश्चात शिकायतकर्ता ने परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के अंतर्गत आपराधिक शिकायत दायर की।

        निचली अदालत ने साक्ष्यों और विधिक पहलुओं पर विचार करने के पश्चात अभियुक्त को बरी कर दिया। इस बरी के आदेश को चुनौती देते हुए शिकायतकर्ता ने उच्च न्यायालय में आपराधिक अपील प्रस्तुत की।


अपील में उठाए गए प्रमुख विधिक प्रश्न

इस अपील में उच्च न्यायालय के समक्ष निम्नलिखित महत्वपूर्ण प्रश्न विचारार्थ आए:

  1. क्या जिस ऋण के आधार पर चेक जारी किया गया, वह समय-सीमा (Limitation) के भीतर था?
  2. क्या समय-बाधित ऋण के लिए जारी किया गया चेक धारा 138 के अंतर्गत दंडनीय दायित्व उत्पन्न करता है?
  3. क्या शिकायतकर्ता स्वयं को विधिक रूप से ‘प्राप्तकर्ता’ या ‘यथास्थिति धारक’ सिद्ध कर सका?
  4. क्या ऋण और चेक से संबंधित स्वामित्व एवं अधिकार सिद्ध करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज उपलब्ध थे?

न्यायालय द्वारा किया गया विधिक विश्लेषण

1. परिसीमा (Limitation) का प्रश्न

        न्यायालय ने सर्वप्रथम परिसीमा अधिनियम के सिद्धांतों पर विचार किया। सामान्य दीवानी कानून के अनुसार, ऋण की वसूली के लिए परिसीमा अवधि तीन वर्ष होती है। रिकॉर्ड से यह तथ्य सामने आया कि कथित ऋण तीन वर्ष से अधिक पुराना था और चेक जारी किए जाने तथा उसके प्रस्तुत होने की तिथि पर ऋण पहले ही समय-बाधित हो चुका था।

        न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि ऋण समय-सीमा से बाधित हो चुका है, तो वह कानून की दृष्टि में प्रवर्तनीय (enforceable) नहीं रहता।


2. समय-बाधित ऋण और धारा 138 का संबंध

       धारा 138 का मूल तत्व यह है कि चेक किसी कानूनी रूप से लागू करने योग्य ऋण या दायित्व के निर्वहन हेतु जारी किया गया हो। न्यायालय ने यह दोहराया कि:

“समय-बाधित ऋण के लिए जारी किया गया चेक, अपने आप में कानूनी रूप से प्रवर्तनीय दायित्व नहीं बनाता।”

        अतः केवल चेक का अनादरण होना ही धारा 138 के अंतर्गत अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है, जब तक यह साबित न हो जाए कि ऋण वैध और समय-सीमा के भीतर था।


3. धारा 9 — ‘यथास्थिति धारक’ की अवधारणा

       शिकायतकर्ता ने स्वयं को चेक का वैध धारक बताते हुए धारा 9 का सहारा लिया। किंतु न्यायालय ने कहा कि:

  • ‘यथास्थिति धारक’ होने के लिए
    • चेक का वैध हस्तांतरण
    • मूल्य के बदले प्राप्ति
    • सद्भावना (Good Faith)
    • और विधिक अधिकार
      को सिद्ध करना आवश्यक है।

         इस मामले में शिकायतकर्ता ऐसा कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका जिससे यह साबित हो सके कि वह वास्तव में धारा 9 के अंतर्गत Holder in Due Course है।


4. स्वामित्व और दस्तावेजी साक्ष्य का अभाव

        न्यायालय ने यह भी पाया कि शिकायतकर्ता द्वारा ऋण दिए जाने, उसकी शर्तों, या चेक पर वैध अधिकार से संबंधित कोई विश्वसनीय दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया। न तो कोई लिखित ऋण-समझौता था और न ही ऐसा कोई अभिलेख जिससे स्वामित्व सिद्ध हो सके।

        न्यायालय ने कहा कि आपराधिक कानून में केवल मौखिक दावे के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।


निचली अदालत के निर्णय पर उच्च न्यायालय की टिप्पणी

         उच्च न्यायालय ने निचली अदालत द्वारा दिए गए बरी के आदेश को सही, तार्किक और विधि-सम्मत माना। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि:

  • जब ऋण समय-बाधित हो,
  • शिकायतकर्ता स्वयं को वैध धारक सिद्ध न कर पाए,
  • और आवश्यक दस्तावेजों का अभाव हो,

तो ऐसे मामलों में अभियुक्त को बरी किया जाना न्यायोचित है।


निर्णय के व्यापक विधिक निहितार्थ

  1. धारा 138 के दुरुपयोग पर रोक
    यह निर्णय स्पष्ट करता है कि धारा 138 का प्रयोग दबाव बनाने या पुराने, निष्क्रिय ऋणों की वसूली के लिए नहीं किया जा सकता।
  2. ऋणदाताओं के लिए सावधानी
    ऋणदाताओं को चाहिए कि वे समय-सीमा के भीतर अपने अधिकारों का प्रयोग करें और आवश्यक दस्तावेज सुरक्षित रखें।
  3. व्यापारिक लेन-देन में पारदर्शिता
    यह निर्णय लिखित समझौतों और विधिक दस्तावेजों के महत्व को रेखांकित करता है।
  4. आपराधिक और दीवानी कानून के बीच संतुलन
    न्यायालय ने यह संतुलन बनाए रखा कि हर दीवानी देयता को आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता।

निष्कर्ष

      अश्वनी कुमार बनाम राज कुमार का यह निर्णय परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के दायरे को स्पष्ट रूप से सीमित करता है। यह स्थापित करता है कि समय-बाधित ऋण के लिए जारी किया गया चेक, कानूनन दंडनीय दायित्व उत्पन्न नहीं करता। साथ ही, यह भी आवश्यक है कि शिकायतकर्ता स्वयं को वैध प्राप्तकर्ता या यथास्थिति धारक सिद्ध करे और अपने दावे के समर्थन में ठोस दस्तावेज प्रस्तुत करे।

       यह निर्णय न केवल निचली अदालतों के लिए मार्गदर्शक है, बल्कि अधिवक्ताओं, व्यापारियों और आम नागरिकों के लिए भी एक महत्वपूर्ण चेतावनी है कि कानून केवल सतर्क और विधिसम्मत दावों की ही रक्षा करता है, न कि लापरवाही या विलंब की