“विवाह करने की वैधानिक क्षमता (Legal Capacity to Marry) एक मूल शर्त है — विवाहित पुरुष के साथ संबंध को कानूनी दर्जा नहीं दिया जा सकता” — बॉम्बे हाईकोर्ट का स्पष्ट और सख़्त संदेश
भारतीय समाज और क़ानूनी व्यवस्था में विवाह केवल एक निजी रिश्ता नहीं, बल्कि एक वैधानिक संस्था (Legal Institution) है। हाल ही में Bombay High Court ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट कर दिया कि यदि किसी पुरुष की पहले से वैध शादी मौजूद है, तो उसके साथ किसी अन्य महिला के संबंध को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती — चाहे वह संबंध कितना ही लंबा, भावनात्मक या सामाजिक रूप से स्वीकार्य क्यों न हो।
यह फैसला न केवल लिव-इन रिलेशनशिप, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और वैवाहिक अधिकारों पर बहस को नई दिशा देता है, बल्कि यह भी रेखांकित करता है कि क़ानून की सीमाएँ भावनाओं से ऊपर होती हैं।
भूमिका (Introduction)
आज के दौर में रिश्तों के स्वरूप तेज़ी से बदल रहे हैं। लिव-इन रिलेशनशिप, सहमति आधारित संबंध और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा माना गया है।
लेकिन सवाल यह है —
क्या हर सहमति आधारित रिश्ता अपने-आप कानूनी दर्जा प्राप्त कर सकता है?
क्या विवाहित पुरुष के साथ संबंध को विवाह या विवाह-सदृश (Marriage-like Relationship) माना जा सकता है?
बॉम्बे हाईकोर्ट ने इन सवालों का उत्तर बेहद स्पष्ट शब्दों में दिया — नहीं।
मामले की पृष्ठभूमि (Background of the Case)
इस मामले में एक महिला ने यह दावा किया कि वह लंबे समय से एक पुरुष के साथ रिश्ते में थी और उसे पत्नी-सदृश अधिकार मिलने चाहिए।
हालाँकि, न्यायालय के समक्ष यह तथ्य निर्विवाद था कि संबंधित पुरुष की पहले से वैध शादी मौजूद थी और वह विवाह क़ानूनन समाप्त नहीं हुआ था।
महिला का तर्क था कि —
- रिश्ता सहमति से था
- वह आर्थिक और भावनात्मक रूप से निर्भर थी
- संबंध लंबे समय तक चला
लेकिन कोर्ट ने इन तर्कों को कानूनी कसौटी पर परखा।
मुख्य कानूनी प्रश्न (Key Legal Issue)
क्या किसी विवाहित पुरुष के साथ बना संबंध, विवाह की वैधानिक क्षमता के अभाव में, कानूनी संरक्षण या वैवाहिक दर्जा पा सकता है?
बॉम्बे हाईकोर्ट की निर्णायक टिप्पणी
हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा:
“Legal capacity to marry is a core requirement.
If a man is already married and that marriage subsists in law, a relationship with another woman cannot be elevated to the status of a legal marriage or a marriage-like relationship.”
अर्थात —
विवाह करने की वैधानिक क्षमता (Legal Capacity) के बिना कोई भी रिश्ता विवाह या विवाह-सदृश नहीं बन सकता।
‘Legal Capacity to Marry’ का अर्थ क्या है?
किसी व्यक्ति को विवाह करने के लिए निम्नलिखित शर्तों को पूरा करना आवश्यक है:
- पहले से कोई वैध विवाह अस्तित्व में न हो
- विवाह योग्य आयु (Age of Marriage)
- मानसिक क्षमता (Soundness of Mind)
- निषिद्ध संबंधों (Prohibited Relationships) में न होना
यदि इनमें से कोई भी शर्त पूरी नहीं होती, तो विवाह शून्य (Void) या अवैध हो सकता है।
लिव-इन रिलेशनशिप बनाम विवाह
भारतीय न्यायपालिका ने कई मामलों में लिव-इन रिलेशनशिप को सीमित कानूनी संरक्षण दिया है, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सीमा रेखा खींच दी:
- अविवाहित पुरुष + अविवाहित महिला → सीमित संरक्षण संभव
- विवाहित पुरुष + अन्य महिला → विवाह-सदृश संबंध नहीं
कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसे रिश्तों को कानूनी मान्यता दी जाए, तो यह —
- वैध पत्नी के अधिकारों का हनन होगा
- बहुविवाह (Bigamy) को परोक्ष रूप से बढ़ावा देगा
- पारिवारिक कानूनों की मूल संरचना को कमजोर करेगा
संविधान का अनुच्छेद 21 और उसकी सीमा
अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्ति को अपनी पसंद से जीवन जीने का अधिकार है।
लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया:
व्यक्तिगत स्वतंत्रता निरंकुश नहीं है।
यह क़ानून द्वारा लगाए गए युक्तियुक्त प्रतिबंधों के अधीन है।
अर्थात, कोई भी मौलिक अधिकार ऐसा नहीं हो सकता जो —
- किसी अन्य के वैधानिक अधिकारों को समाप्त कर दे
- विधिक ढांचे को ही कमजोर कर दे
वैध पत्नी के अधिकारों की रक्षा
इस निर्णय का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह वैध पत्नी (Legally Wedded Wife) के अधिकारों को प्राथमिकता देता है।
यदि विवाहित पुरुष के बाहरी संबंधों को कानूनी मान्यता दी जाए, तो:
- भरण-पोषण (Maintenance)
- उत्तराधिकार (Succession)
- वैवाहिक गरिमा (Marital Dignity)
जैसे अधिकारों पर सीधा आघात होगा।
क्या महिला को कोई संरक्षण नहीं मिलेगा?
यह समझना ज़रूरी है कि कोर्ट ने यह नहीं कहा कि महिला पूरी तरह से अधिकारविहीन है।
यदि परिस्थितियाँ उपयुक्त हों, तो महिला को:
- घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत सीमित संरक्षण
- धोखाधड़ी या शोषण की स्थिति में अन्य वैधानिक उपाय
मिल सकते हैं।
लेकिन उसे पत्नी या पत्नी-सदृश दर्जा नहीं दिया जा सकता।
समाज पर निर्णय का प्रभाव
यह फैसला भारतीय समाज के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है कि:
- भावनात्मक संबंध और कानूनी संबंध अलग-अलग चीज़ें हैं
- क़ानून भावनाओं से नहीं, तथ्यों और विधिक क्षमता से चलता है
यह निर्णय विशेष रूप से उन मामलों में मार्गदर्शक होगा जहाँ:
- लंबे समय के अवैध संबंधों को वैधानिक रंग देने की कोशिश होती है
- विवाह संस्था की मूल अवधारणा को चुनौती दी जाती है
महिला अधिकार बनाम वैवाहिक संस्था
कुछ आलोचक इस निर्णय को महिला-विरोधी बता सकते हैं, लेकिन न्यायालय का दृष्टिकोण स्पष्ट है:
यह फैसला महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ नहीं, बल्कि वैधानिक विवाह संस्था की रक्षा में है।
यदि विवाह संस्था कमजोर होगी, तो अंततः —
- महिलाएँ
- बच्चे
- परिवार व्यवस्था
सबसे अधिक प्रभावित होंगे।
भविष्य के मामलों के लिए मिसाल (Precedent)
यह निर्णय भविष्य में:
- लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े मुकदमों
- भरण-पोषण के दावों
- वैवाहिक दर्जे की मांग
में एक मजबूत न्यायिक मिसाल के रूप में उद्धृत किया जाएगा।
निष्कर्ष (Conclusion)
नमस्ते के साथ एक स्पष्ट संदेश —
भारतीय क़ानून में विवाह भावना से नहीं, वैधानिक क्षमता से बनता है।
बॉम्बे हाईकोर्ट का यह निर्णय यह स्थापित करता है कि:
- विवाहित पुरुष के साथ संबंध को कानूनी विवाह नहीं कहा जा सकता
- विवाह करने की वैधानिक क्षमता एक अनिवार्य शर्त है
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी क़ानून की सीमाओं के भीतर ही मान्य है
यह फैसला रिश्तों की आज़ादी और क़ानून की मजबूती — दोनों के बीच संतुलन बनाता है।