IndianLawNotes.com

विलंब की क्षमा और ‘न्यायसंगत आधार’ की सीमाएँ: पर्याप्त कारण के बिना केवल सहानुभूति पर विलंब माफ नहीं किया जा सकता — पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय

विलंब की क्षमा और ‘न्यायसंगत आधार’ की सीमाएँ: पर्याप्त कारण के बिना केवल सहानुभूति पर विलंब माफ नहीं किया जा सकता — पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय

       विधिक प्रक्रिया में समय-सीमा (Limitation) का पालन न्याय के सुचारु संचालन के लिए अत्यंत आवश्यक है। हाल ही में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने विलंब की क्षमा (Condonation of Delay) से संबंधित एक महत्वपूर्ण और सिद्धांतात्मक निर्णय में यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल ‘न्यायसंगतता’ या ‘किसी को भी अनसुना नहीं किया जाना चाहिए’ जैसे सामान्य और भावनात्मक आधारों पर विलंब को माफ नहीं किया जा सकता, जब तक कि विलंब के लिए पर्याप्त कारण (Sufficient Cause) विधिवत स्थापित न किया गया हो।

       न्यायालय ने ऐसे ही एक मामले में निचली अदालत द्वारा केवल सहानुभूति के आधार पर माफ किए गए विलंब को रद्द करते हुए कहा कि न्यायसंगतता कानून का स्थान नहीं ले सकती और यदि ऐसा किया गया, तो यह सीमा अधिनियम की पूरी अवधारणा को ही निष्प्रभावी कर देगा।


मामले की पृष्ठभूमि

       इस प्रकरण में एक पक्षकार द्वारा निर्धारित समय-सीमा के काफी बाद अपील/याचिका दायर की गई थी। विलंब को माफ कराने के लिए दायर आवेदन में कोई ठोस, विशिष्ट और प्रमाणित कारण प्रस्तुत नहीं किया गया। इसके बावजूद, निचली अदालत ने यह कहते हुए विलंब को माफ कर दिया कि “किसी को भी अनसुना नहीं किया जाना चाहिए और न्यायसंगतता की माँग है कि मामले को गुण-दोष के आधार पर सुना जाए।”

      इस आदेश को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई। याचिकाकर्ता का तर्क था कि—

  • विलंब अत्यधिक है,
  • विलंब के लिए कोई पर्याप्त कारण नहीं दर्शाया गया है, और
  • केवल सहानुभूति या न्यायसंगतता के नाम पर विलंब माफ करना विधि के विपरीत है।

मुख्य विधिक प्रश्न

उच्च न्यायालय के समक्ष विचारणीय प्रमुख प्रश्न यह था—

क्या केवल ‘न्यायसंगत आधार’ या ‘किसी को भी अनसुना नहीं किया जाना चाहिए’ जैसे सामान्य सिद्धांतों के आधार पर, बिना पर्याप्त कारण के, विलंब को माफ किया जा सकता है?


विलंब की क्षमा (Condonation of Delay): विधिक अवधारणा

विलंब की क्षमा का सिद्धांत सीमा अधिनियम, 1963 से जुड़ा हुआ है, जिसके अनुसार न्यायालय तभी विलंब माफ कर सकता है जब आवेदक यह साबित करे कि—

  • विलंब अनजाने में हुआ,
  • विलंब उसके नियंत्रण से बाहर परिस्थितियों के कारण हुआ, और
  • उसने समुचित सावधानी (Due Diligence) बरती।

यह सिद्धांत न्यायालय को विवेकाधीन शक्ति (Discretionary Power) देता है, लेकिन यह विवेक असीमित या मनमाना नहीं है।


उच्च न्यायालय का विश्लेषण

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने अपने विस्तृत निर्णय में कहा कि—

  • “न्यायसंगतता” (Equity) और “सहानुभूति” (Sympathy) न्यायिक विवेक के तत्व हो सकते हैं,
  • लेकिन वे कानून द्वारा निर्धारित आवश्यकताओं का विकल्प नहीं बन सकते

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ‘पर्याप्त कारण’ एक अनिवार्य शर्त है, और उसके बिना विलंब को माफ करना विधि के विपरीत होगा।


‘पर्याप्त कारण’ का अर्थ और दायरा

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि “पर्याप्त कारण” कोई अमूर्त या सामान्य शब्द नहीं है। इसका अर्थ है—

  • ठोस तथ्य,
  • यथार्थपरक परिस्थितियाँ,
  • और ऐसे कारण, जिन्हें प्रमाणों द्वारा समर्थित किया जा सके।

सिर्फ यह कहना कि—

  • वकील की गलती थी,
  • जानकारी नहीं थी,
  • या न्याय के हित में सुनवाई आवश्यक है,

तब तक पर्याप्त नहीं है, जब तक कि इन दलीलों को ठोस तथ्यों से सिद्ध न किया जाए।


न्यायसंगतता बनाम विधि का शासन

उच्च न्यायालय ने इस निर्णय में विधि के शासन (Rule of Law) पर विशेष बल दिया। न्यायालय ने कहा कि—

यदि हर मामले में केवल इस आधार पर विलंब माफ कर दिया जाए कि किसी को अनसुना नहीं किया जाना चाहिए, तो सीमा अधिनियम का कोई औचित्य ही नहीं बचेगा।

यह दृष्टिकोण भारत का संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुरूप है, जो समानता और मनमानी के निषेध की गारंटी देता है। यदि बिना पर्याप्त कारण के एक पक्षकार को राहत दी जाती है, तो यह दूसरे पक्ष के साथ असमानता और अन्याय होगा।


निचली अदालत के आदेश की आलोचना

उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि—

  • आदेश में कानूनी परीक्षण का अभाव है,
  • केवल भावनात्मक और सामान्य टिप्पणियों के आधार पर निर्णय दिया गया है,
  • यह नहीं बताया गया कि विलंब कैसे और क्यों हुआ।

न्यायालय ने कहा कि ऐसे आदेश न्यायिक विवेक का प्रयोग नहीं, बल्कि उसका दुरुपयोग हैं।


पूर्ववर्ती न्यायिक सिद्धांतों से सामंजस्य

हालाँकि यह निर्णय पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का है, किंतु यह उन सिद्धांतों के अनुरूप है जिन्हें समय-समय पर भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्रतिपादित किया है—कि

  • विलंब की क्षमा कोई अधिकार नहीं, बल्कि अपवाद है,
  • और अपवाद को नियम नहीं बनाया जा सकता।

निर्णय का व्यापक प्रभाव

इस फैसले के कई दूरगामी प्रभाव होंगे:

  1. निचली अदालतों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश
    अब केवल सहानुभूति के आधार पर विलंब माफ करना कठिन होगा।
  2. वादकारियों में सतर्कता
    पक्षकार समय-सीमा के प्रति अधिक सजग होंगे।
  3. न्यायिक अनुशासन की मजबूती
    सीमा अधिनियम की भावना को बल मिलेगा।
  4. अनावश्यक मुकदमेबाजी पर अंकुश
    बिना कारण विलंबित मामलों की संख्या कम होगी।

आलोचनात्मक दृष्टि

कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि इस तरह का कठोर दृष्टिकोण न्याय तक पहुंच (Access to Justice) को सीमित कर सकता है। किंतु न्यायालय ने स्पष्ट किया कि—

  • न्याय तक पहुंच का अर्थ अराजकता नहीं,
  • और समय-सीमा का पालन भी न्याय का ही एक महत्वपूर्ण अंग है।

निष्कर्ष

        पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का यह निर्णय विलंब की क्षमा से संबंधित कानून में एक स्पष्ट और सशक्त संदेश देता है। न्यायालय ने यह स्थापित किया है कि—

पर्याप्त कारण के अभाव में केवल न्यायसंगतता या सहानुभूति के आधार पर विलंब को माफ नहीं किया जा सकता।

       यह फैसला विधि के शासन, न्यायिक अनुशासन और समानता के सिद्धांतों की पुनः पुष्टि करता है तथा यह सुनिश्चित करता है कि कानून भावनाओं से नहीं, बल्कि तर्क, कारण और प्रमाण से संचालित हो।

       इस प्रकार, यह निर्णय न केवल सीमा कानून के क्षेत्र में, बल्कि समग्र न्यायिक प्रक्रिया में संतुलन और निष्पक्षता बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।