लिव-इन रिलेशनशिप गैर-कानूनी नहीं: सहमति से साथ रह रहे बालिग जोड़ों की रक्षा करना राज्य का संवैधानिक दायित्व — इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक दृष्टिकोण
भूमिका
भारतीय समाज में विवाह को आज भी एक पवित्र और सामाजिक रूप से मान्य संस्था माना जाता है। इसके विपरीत लिव-इन रिलेशनशिप (बिना विवाह के साथ रहना) को लेकर सामाजिक स्वीकार्यता अभी भी सीमित है। कई बार ऐसे रिश्तों में रह रहे जोड़ों को परिवार, समाज और यहां तक कि स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। इसी सामाजिक-कानूनी पृष्ठभूमि में इलाहाबाद हाईकोर्ट का हालिया आदेश न केवल संवैधानिक मूल्यों की पुष्टि करता है, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है।
एक महत्वपूर्ण आदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट की एकल पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप को ‘गैर-कानूनी’ नहीं कहा जा सकता, भले ही यह अवधारणा सभी को स्वीकार्य न हो। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि शादी के बिना साथ रहना कोई अपराध नहीं है और राज्य ऐसे बालिग जोड़ों की जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए बाध्य है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह टिप्पणी उस समय आई जब लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे कई बालिग जोड़ों ने पुलिस सुरक्षा की मांग करते हुए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे आपसी सहमति से साथ रह रहे हैं, किंतु परिवार के सदस्यों और सामाजिक दबाव के कारण उन्हें धमकियां मिल रही हैं, जिससे उनके जीवन और स्वतंत्रता को खतरा है।
इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जस्टिस विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 21 के व्यापक दायरे में इस प्रश्न पर विचार किया कि क्या राज्य ऐसे जोड़ों की सुरक्षा से इंकार कर सकता है।
न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियां
1. लिव-इन रिलेशनशिप गैर-कानूनी नहीं
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि:
“हालांकि लिव-इन रिलेशनशिप का कॉन्सेप्ट सभी को स्वीकार्य नहीं हो सकता, लेकिन इसे गैर-कानूनी नहीं कहा जा सकता और न ही शादी की पवित्रता के बिना साथ रहना कोई अपराध है।”
यह टिप्पणी इस धारणा को खारिज करती है कि केवल सामाजिक असहमति के आधार पर किसी रिश्ते को अवैध ठहराया जा सकता है।
2. जीवन का अधिकार सर्वोच्च है
कोर्ट ने कहा कि इंसान के जीवन का अधिकार ‘बहुत ऊंचे दर्जे’ पर है, चाहे:
- वह व्यक्ति शादीशुदा हो, या
- वह शादी के बिना सहमति से किसी के साथ रह रहा हो
यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है, जिसमें जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता शामिल है।
3. बालिगों की पसंद में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं
न्यायालय ने दो टूक कहा कि:
“एक बार जब कोई बालिग व्यक्ति अपना पार्टनर चुन लेता है, तो किसी अन्य व्यक्ति को — चाहे वह परिवार का सदस्य ही क्यों न हो — आपत्ति करने या उनके शांतिपूर्ण जीवन में बाधा डालने का कोई अधिकार नहीं है।”
यह टिप्पणी व्यक्तिगत स्वायत्तता (Personal Autonomy) की संवैधानिक अवधारणा को मजबूती देती है।
राज्य का संवैधानिक दायित्व
कोर्ट ने संविधान के तहत राज्य पर डाली गई जिम्मेदारियों को रेखांकित करते हुए कहा कि:
- राज्य का कर्तव्य है कि वह हर नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करे
- यह दायित्व व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति पर निर्भर नहीं करता
न्यायालय के अनुसार, राज्य सहमति से रहने वाले बालिगों की सुरक्षा से इनकार नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसा करना संविधान के मूल ढांचे के विपरीत होगा।
पुलिस सुरक्षा और रिट याचिकाएं
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए, जस्टिस विवेक कुमार सिंह की पीठ ने लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों द्वारा दायर कई रिट याचिकाओं को मंजूरी दी और पुलिस को आवश्यक सुरक्षा प्रदान करने के निर्देश दिए।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस और प्रशासन का दायित्व केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों की सक्रिय रूप से रक्षा करना भी है।
संवैधानिक और कानूनी दृष्टिकोण
अनुच्छेद 21 का विस्तृत अर्थ
भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर अनुच्छेद 21 की व्याख्या को व्यापक किया है, जिसमें शामिल हैं:
- गरिमा के साथ जीवन
- निजी पसंद और निर्णय
- व्यक्तिगत संबंध बनाने की स्वतंत्रता
लिव-इन रिलेशनशिप को इसी दायरे में देखा गया है।
नैतिकता बनाम कानून
यह निर्णय एक बार फिर यह स्थापित करता है कि:
- नैतिक असहमति कानून का विकल्प नहीं हो सकती
- जो चीज सामाजिक रूप से अस्वीकार्य हो, वह आवश्यक नहीं कि कानूनन अवैध भी हो
न्यायालय का काम सामाजिक नैतिकता लागू करना नहीं, बल्कि संविधान की रक्षा करना है।
समाज पर निर्णय का प्रभाव
- बालिग जोड़ों को सुरक्षा का भरोसा
यह निर्णय ऐसे जोड़ों को राहत देता है, जो सामाजिक दबाव के कारण असुरक्षित महसूस करते हैं। - प्रशासनिक स्पष्टता
पुलिस और जिला प्रशासन के लिए यह स्पष्ट संदेश है कि वे ऐसे मामलों में तटस्थ रहते हुए सुरक्षा प्रदान करें। - संवैधानिक मूल्यों की पुनर्पुष्टि
व्यक्तिगत स्वतंत्रता, पसंद और गरिमा को सर्वोच्च मान्यता।
आलोचना और बहस
हालांकि यह निर्णय संवैधानिक दृष्टि से मजबूत है, फिर भी समाज के एक वर्ग द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि:
- इससे पारंपरिक पारिवारिक ढांचे पर प्रभाव पड़ सकता है
- सामाजिक मूल्यों का क्षरण हो सकता है
परंतु न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य सामाजिक पसंद थोपना नहीं, बल्कि अधिकारों की रक्षा करना है।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश भारतीय संवैधानिक न्यायशास्त्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह स्पष्ट करता है कि:
- लिव-इन रिलेशनशिप गैर-कानूनी नहीं है
- सहमति से साथ रह रहे बालिगों की सुरक्षा राज्य का दायित्व है
- किसी भी व्यक्ति या परिवार को उनके शांतिपूर्ण जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं
यह निर्णय न केवल लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे जोड़ों के अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के उस मूल सिद्धांत को भी मजबूत करता है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा, सामाजिक असहमति से ऊपर है।
यही संविधान की आत्मा है और यही कानून के शासन की असली पहचान।