राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा दया याचिका खारिज: ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ अपराध, मृत्युदंड और संवैधानिक विवेक का कठोर प्रयोग
महाराष्ट्र की 2012 की जघन्य घटना, सुप्रीम कोर्ट की पुष्टि और राष्ट्रपति की संवैधानिक भूमिका का विस्तृत विश्लेषण
भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में दया याचिका (Mercy Petition) अंतिम संवैधानिक उपाय मानी जाती है। यह न केवल दोषी के जीवन और मृत्यु का प्रश्न होती है, बल्कि इसमें संविधान, मानवीय संवेदना, समाज की सुरक्षा और न्याय—इन सभी का संतुलन निहित रहता है। हाल ही में द्रौपदी मुर्मू, राष्ट्रपति भारत ने महाराष्ट्र में वर्ष 2012 में दो वर्षीय बच्ची के अपहरण, बलात्कार और हत्या के दोषी की दया याचिका को खारिज कर दिया है।
25 जुलाई 2022 को राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद यह तीसरी दया याचिका है, जिसे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अस्वीकार किया है। इस निर्णय ने एक बार फिर मृत्युदंड, ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ सिद्धांत और राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों पर देशव्यापी बहस को केंद्र में ला दिया है।
1. मामला क्या था: 2012 की वह जघन्य घटना
यह मामला महाराष्ट्र का है, जहाँ वर्ष 2012 में एक दो साल की मासूम बच्ची का अपहरण किया गया। इसके बाद उसके साथ निर्मम बलात्कार किया गया और अंततः उसकी हत्या कर दी गई। यह अपराध न केवल कानूनी दृष्टि से, बल्कि मानवीय दृष्टि से भी समाज की आत्मा को झकझोर देने वाला था।
जांच में यह स्पष्ट हुआ कि अपराध की प्रकृति अत्यंत क्रूर, अमानवीय और नृशंस थी। पीड़िता की आयु, अपराध की हिंसा और दोषी की मानसिक प्रवृत्ति—इन सभी ने इस मामले को सामान्य अपराधों से अलग श्रेणी में ला खड़ा किया।
2. ट्रायल कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक: न्यायिक यात्रा
(क) निचली अदालत और हाईकोर्ट
ट्रायल कोर्ट ने दोषी को मृत्युदंड की सजा सुनाई। अदालत ने माना कि यह मामला सुधार की संभावना से परे है। बाद में हाईकोर्ट ने भी सजा को बरकरार रखा।
(ख) सुप्रीम कोर्ट का निर्णायक फैसला
अंततः मामला Supreme Court of India पहुँचा।
दिनांक 3 अक्टूबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड को बरकरार रखते हुए अत्यंत कड़े शब्दों में टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि—
“दोषी का अपनी कामुक इच्छाओं पर कोई नियंत्रण नहीं था। उसने अपनी यौन भूख को शांत करने के लिए सभी प्राकृतिक, सामाजिक और कानूनी सीमाओं को पार कर लिया।”
सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ (दुर्लभतम दुर्लभ) मामलों की श्रेणी में रखते हुए कहा कि यदि ऐसे मामलों में मृत्युदंड नहीं दिया गया, तो यह न्याय व्यवस्था की विफलता होगी।
3. ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ सिद्धांत: कानूनी कसौटी
भारत में मृत्युदंड को सामान्य सजा नहीं माना जाता। बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) के निर्णय के बाद यह सिद्धांत स्थापित हुआ कि मृत्युदंड केवल रेयरेस्ट ऑफ रेयर मामलों में ही दिया जाएगा।
इस सिद्धांत के प्रमुख तत्व हैं—
- अपराध की अत्यधिक क्रूरता
- पीड़ित की असहाय स्थिति
- अपराध का सामाजिक प्रभाव
- दोषी के सुधार की संभावना का अभाव
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ये सभी तत्व पूर्ण रूप से मौजूद हैं।
4. दया याचिका: अंतिम संवैधानिक उपाय
जब न्यायालयों से सभी अपीलें समाप्त हो जाती हैं, तब दोषी के पास संविधान के अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दाखिल करने का अधिकार रहता है।
दया याचिका में क्या देखा जाता है?
- दोषी का आचरण
- मानसिक और शारीरिक स्थिति
- अपराध की प्रकृति
- समाज और पीड़ित पक्ष पर प्रभाव
- देरी या मानवीय आधार
यह कोई न्यायिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि संवैधानिक और कार्यकारी विवेक का विषय होता है।
5. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का निर्णय
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सभी संबंधित रिकॉर्ड, गृह मंत्रालय की सलाह और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का अवलोकन करने के बाद दया याचिका को खारिज कर दिया।
यह निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि—
- यह उनके कार्यकाल में तीसरी अस्वीकृत दया याचिका है
- यह दर्शाता है कि राष्ट्रपति ने केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि संविधान और समाज के हित को प्राथमिकता दी
6. राष्ट्रपति की भूमिका: संवैधानिक लेकिन निर्णायक
अक्सर यह धारणा होती है कि राष्ट्रपति केवल सरकार की सलाह पर कार्य करते हैं। लेकिन दया याचिका के मामलों में राष्ट्रपति के पास विवेकाधीन शक्ति होती है, हालाँकि वह मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे होते हैं।
फिर भी, अंतिम हस्ताक्षर राष्ट्रपति के होते हैं, और यही कारण है कि यह निर्णय नैतिक और संवैधानिक दोनों स्तरों पर अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
7. समाज और पीड़ित के अधिकार
ऐसे मामलों में चर्चा केवल दोषी के अधिकारों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
- पीड़िता का न्याय पाने का अधिकार
- समाज की सुरक्षा
- कानून के प्रति विश्वास
ये सभी तत्व समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति—दोनों ने यह स्पष्ट किया कि न्याय केवल आरोपी के लिए नहीं, बल्कि पीड़ित और समाज के लिए भी होता है।
8. मृत्युदंड पर बहस: समर्थक और विरोधी
विरोधी तर्क:
- जीवन का अधिकार
- सुधार की संभावना
- अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानक
समर्थक तर्क:
- जघन्य अपराधों में कठोर दंड आवश्यक
- समाज में निवारक प्रभाव
- पीड़ित को न्याय
यह मामला उन लोगों के लिए एक उदाहरण है जो मानते हैं कि कुछ अपराध इतने अमानवीय होते हैं कि समाज उन्हें क्षमा नहीं कर सकता।
9. अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
कई देश मृत्युदंड समाप्त कर चुके हैं, लेकिन भारत ने अब भी इसे रेयरेस्ट ऑफ रेयर मामलों में बनाए रखा है। भारत का दृष्टिकोण यह है कि—
“मानवाधिकार का अर्थ केवल अपराधी का अधिकार नहीं, बल्कि पीड़ित की गरिमा भी है।”
10. निष्कर्ष: न्याय, संवैधानिक विवेक और सामाजिक संदेश
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा दया याचिका का खारिज किया जाना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है। यह—
- संविधान की गरिमा
- न्यायपालिका की दृढ़ता
- और समाज के प्रति राज्य की जिम्मेदारी
इन सभी का समन्वित प्रतीक है।
यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि—
“मासूमों के खिलाफ जघन्य अपराध करने वालों के लिए कानून में कोई सहानुभूति नहीं है।”
महाराष्ट्र की उस दो वर्षीय बच्ची को न्याय अब कानूनी प्रक्रिया के अंतिम चरण में पहुँचा है। यह फैसला बताता है कि भारत की न्याय व्यवस्था, चाहे कितनी ही लंबी क्यों न हो, अंततः न्याय के साथ खड़ी रहती है।