न्याय का नया संतुलन: यदि पत्नी के आचरण से पति की कमाई रुकी, तो भरण-पोषण का अधिकार नहीं—इलाहाबाद उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला
प्रस्तावना: संरक्षण से संतुलन की ओर भारतीय पारिवारिक कानून
भारतीय पारिवारिक कानूनों का मूल उद्देश्य सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना रहा है, विशेषकर उन महिलाओं के लिए जो विवाह विच्छेद या वैवाहिक उपेक्षा के बाद आर्थिक रूप से असहाय हो जाती हैं। इसी उद्देश्य से दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144) को एक त्वरित, संक्षिप्त और कल्याणकारी उपाय के रूप में विकसित किया गया।
किन्तु समय के साथ न्यायालयों के समक्ष यह प्रश्न बार-बार आया कि क्या भरण-पोषण का अधिकार पूर्ण (Absolute) है, या वह आचरण, परिस्थितियों और निष्पक्षता के अधीन भी है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में दिए गए एक महत्वपूर्ण निर्णय में इसी प्रश्न का उत्तर देते हुए स्पष्ट किया है कि—
यदि पत्नी के स्वयं के कृत्यों के कारण पति की नौकरी, व्यवसाय या कमाने की क्षमता समाप्त हो जाती है, तो पत्नी बाद में उसी स्थिति का लाभ उठाकर भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती।
यह फैसला केवल एक वैवाहिक विवाद का समाधान नहीं है, बल्कि भारतीय भरण-पोषण कानून में न्यायिक संतुलन (Judicial Balance) की दिशा में एक निर्णायक कदम है।
मामले की पृष्ठभूमि: वैवाहिक विवाद से आर्थिक विनाश तक
यह मामला एक ऐसे पति से संबंधित था जिसने न्यायालय के समक्ष यह तर्क रखा कि—
- पत्नी द्वारा लगातार झूठे आपराधिक मुकदमे दर्ज कराए गए
- कार्यस्थल पर बार-बार जाकर हंगामा और दबाव बनाया गया
- वरिष्ठ अधिकारियों, ग्राहकों और समाज में मानहानि की गई
- परिणामस्वरूप उसकी नौकरी छूट गई / व्यवसाय बंद हो गया
पति का यह कहना था कि उसकी बेरोजगारी स्वैच्छिक नहीं, बल्कि पत्नी के आचरण का प्रत्यक्ष परिणाम है।
दूसरी ओर, पत्नी ने धारा 125 CrPC के तहत यह तर्क रखा कि—
- पति सक्षम और शिक्षित है
- उसकी अर्जन क्षमता (Earning Capacity) बनी हुई है
- इसलिए भरण-पोषण देना उसका वैधानिक दायित्व है
यही वह बिंदु था जहाँ न्यायालय को कानून और न्याय के बीच संतुलन स्थापित करना पड़ा।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का केंद्रीय सिद्धांत: अपनी गलती का लाभ नहीं
1. ‘No One Can Take Advantage of His or Her Own Wrong’
न्यायालय ने अपने निर्णय में कानून के एक मौलिक सिद्धांत को पुनः स्थापित किया—
कोई भी व्यक्ति अपनी ही गलती या अवैध आचरण से उत्पन्न स्थिति का लाभ नहीं उठा सकता।
यदि यह सिद्ध कर दिया जाए कि—
- पत्नी के कार्यों ने पति की कमाने की क्षमता को नष्ट किया
- या उसे सामाजिक/व्यावसायिक रूप से अपंग बना दिया
तो पत्नी यह नहीं कह सकती कि—
“अब पति कमा नहीं रहा, इसलिए मुझे भरण-पोषण दिया जाए।”
यह दृष्टिकोण भरण-पोषण कानून को दंडात्मक औजार बनने से रोकता है।
अर्जन क्षमता बनाम वास्तविक अर्जन: न्यायालय की सूक्ष्म व्याख्या
2. Earning Capacity कोई काल्पनिक अवधारणा नहीं
भारतीय न्यायालय सामान्यतः यह मानते रहे हैं कि—
- पति की वास्तविक आय न हो
- फिर भी उसकी अर्जन क्षमता के आधार पर भरण-पोषण तय किया जा सकता है
लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण अपवाद स्पष्ट किया—
👉 यदि वह अर्जन क्षमता पत्नी के कृत्यों के कारण नष्ट हुई है,
👉 तो उसे आधार बनाकर पति को भुगतान के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
यह एक व्यावहारिक और यथार्थवादी दृष्टिकोण है, क्योंकि—
- कमाई केवल डिग्री या योग्यता से नहीं होती
- बल्कि मानसिक शांति, सामाजिक साख और कार्यस्थल की स्थिरता से होती है
भरण-पोषण का अधिकार: पूर्ण नहीं, सशर्त
3. आचरण (Conduct) अब निर्णायक तत्व
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि—
- भरण-पोषण एक कल्याणकारी अधिकार है
- लेकिन यह अनुशासनहीन या प्रतिशोधात्मक आचरण को प्रोत्साहित नहीं कर सकता
पत्नी का आचरण अब निम्नलिखित प्रश्नों के अधीन होगा—
- क्या उसने पति के विरुद्ध कानून का दुरुपयोग किया?
- क्या उसके कार्यों से पति का करियर नष्ट हुआ?
- क्या पति जानबूझकर बेरोजगार है या परिस्थितियों का शिकार?
धारा 125 CrPC (अब BNSS धारा 144) पर दूरगामी प्रभाव
यह निर्णय निचली अदालतों और पारिवारिक न्यायालयों के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करता है।
अब न्यायालयों को केवल यह नहीं देखना होगा कि—
- पति कमा रहा है या नहीं
बल्कि यह भी जांचना होगा कि—
- उसकी बेरोजगारी के पीछे कारण क्या है
- और उसमें पत्नी की भूमिका क्या रही है
तुलनात्मक दृष्टिकोण
| मापदंड | पूर्व की सामान्य स्थिति | इलाहाबाद हाईकोर्ट का नया दृष्टिकोण |
|---|---|---|
| भरण-पोषण का आधार | पति की आय/योग्यता | पत्नी का आचरण + कारण |
| बेरोजगारी | अक्सर अनदेखी | यदि पत्नी के कारण है, तो निर्णायक |
| न्यायिक दृष्टि | संरक्षण-प्रधान | संतुलन और निष्पक्षता |
पुरुषों के अधिकारों के संदर्भ में निर्णय का महत्व
हाल के वर्षों में न्यायालयों ने यह स्वीकार किया है कि—
- वैवाहिक कानूनों का दुरुपयोग भी एक वास्तविक समस्या है
- झूठे मुकदमों से पुरुषों का मानसिक, सामाजिक और आर्थिक शोषण होता है
यह निर्णय उस न्यायिक प्रवृत्ति को मजबूत करता है जिसमें—
- कानून को हथियार नहीं, ढाल बनाया जा रहा है
- वास्तविक पीड़ित की पहचान की जा रही है
वकालत के दृष्टिकोण से व्यावहारिक सीख
यदि आप वकालत के क्षेत्र में हैं या प्रवेश करने जा रहे हैं, तो यह फैसला आपको तीन महत्वपूर्ण बातें सिखाता है—
1. धाराएं नहीं, तथ्य मुकदमा जिताते हैं
धारा 125 एक जैसी होती है,
लेकिन तथ्य (Facts) हर केस को अलग बना देते हैं।
यदि पति यह सिद्ध कर दे कि—
- उसकी आर्थिक दुर्दशा पत्नी के कारण है
तो यह फैसला आपके लिए एक सशक्त न्यायिक आधार बनेगा।
2. साक्ष्य का महत्व
इस प्रकार के मामलों में—
- ईमेल
- कार्यस्थल की शिकायतें
- गवाह
- मेडिकल/मानसिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड
निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
3. संतुलित तर्क ही टिकता है
अदालतें अब एकतरफा सहानुभूति से आगे बढ़कर—
- संतुलन
- निष्पक्षता
- सामाजिक यथार्थ
पर निर्णय दे रही हैं।
निष्कर्ष: संरक्षण से न्याय की ओर एक परिपक्व कदम
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय पारिवारिक कानून के विकास में एक मील का पत्थर है।
यह स्पष्ट करता है कि—
- भरण-पोषण कोई स्वचालित अधिकार नहीं
- कानून प्रतिशोध का माध्यम नहीं
- और न्याय का अर्थ केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि निष्पक्षता है
यह फैसला—
- झूठे मुकदमों पर अंकुश लगाएगा
- वास्तविक पीड़ितों को न्याय देगा
- और भारतीय न्यायपालिका की परिपक्वता को दर्शाएगा
कानून का उद्देश्य किसी एक वर्ग को लाभ पहुंचाना नहीं, बल्कि न्याय का संतुलन स्थापित करना है—और यही इस निर्णय की सबसे बड़ी उपलब्धि है।