मेरिट बनाम आरक्षण नहीं, बल्कि मेरिट के भीतर समावेशन: सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
भूमिका : आरक्षण, समानता और योग्यता का संवैधानिक संतुलन
भारत का संविधान सामाजिक न्याय, समानता और अवसर की बराबरी की अवधारणा पर आधारित है। स्वतंत्रता के बाद से ही अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए आरक्षण की व्यवस्था इसी उद्देश्य से लागू की गई कि ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाया जा सके।
लेकिन समय–समय पर यह प्रश्न उठता रहा है कि क्या आरक्षण मेरिट के विरुद्ध है? और क्या आरक्षित वर्ग का कोई अभ्यर्थी, यदि जनरल कट–ऑफ से अधिक अंक प्राप्त करे, फिर भी आरक्षित सीट तक सीमित रहेगा?
इसी संवैधानिक बहस पर सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला निर्णय दिया है, जिसने मेरिट और आरक्षण के बीच संतुलन को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया है।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट संदेश
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट शब्दों में कहा है कि:
यदि SC, ST, OBC या EWS वर्ग का कोई उम्मीदवार जनरल कैटेगरी के कट–ऑफ से अधिक अंक प्राप्त करता है, तो उसे जनरल कैटेगरी की सीट पर चयन या प्रवेश का पूरा अधिकार होगा। उसे केवल आरक्षित श्रेणी की सीटों तक सीमित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर) के विरुद्ध होगा।
फैसले की पृष्ठभूमि : विवाद की जड़
सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में कई बार यह देखा गया कि:
- आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी
- जिन्होंने जनरल कैटेगरी से अधिक अंक प्राप्त किए
- उन्हें भी आरक्षित सीटों में ही समायोजित कर दिया गया
इसका परिणाम यह हुआ कि:
- मेरिट पर चयनित आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के साथ अन्याय हुआ, और
- आरक्षित सीटों की संख्या अनावश्यक रूप से कम हो गई, जिससे अपेक्षाकृत कम अंक पाने वाले आरक्षित अभ्यर्थियों का नुकसान हुआ।
यही प्रश्न बार–बार अदालतों के समक्ष आया कि क्या यह नीति संविधानसम्मत है?
मेरिट का सही अर्थ : सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि—
- मेरिट का अर्थ केवल सामाजिक वर्ग नहीं है
- बल्कि प्राप्तांक, योग्यता और प्रतिस्पर्धा में प्रदर्शन ही मेरिट का आधार है
यदि कोई आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार बिना किसी आरक्षण लाभ के, सामान्य मापदंडों पर चयन योग्य है, तो:
- उसे जनरल कैटेगरी में गिना जाएगा
- आरक्षित कोटे की सीटें अन्य जरूरतमंद अभ्यर्थियों के लिए सुरक्षित रहेंगी
अदालत ने इसे “Merit within Reservation” का सिद्धांत कहा।
संवैधानिक आधार : अनुच्छेद 14, 15 और 16
1. अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार
यह अनुच्छेद राज्य को मनमानी से रोकता है। समान परिस्थितियों में समान व्यवहार अनिवार्य है।
यदि दो उम्मीदवारों के अंक समान या अधिक हैं, तो केवल जाति या वर्ग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता।
2. अनुच्छेद 15(4) और 15(5) – शैक्षणिक आरक्षण
ये प्रावधान सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष व्यवस्था की अनुमति देते हैं,
लेकिन यह अनुमति समानता को नकारने का अधिकार नहीं देती।
3. अनुच्छेद 16(4) – सरकारी नौकरियों में आरक्षण
आरक्षण एक सक्षमकारी प्रावधान है, बाध्यकारी नहीं।
यदि आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार बिना आरक्षण के चयनित हो जाता है, तो उसे आरक्षण की आवश्यकता नहीं मानी जाएगी।
पहले के प्रमुख निर्णयों की निरंतरता
यह फैसला कोई अचानक आया हुआ निर्णय नहीं है, बल्कि यह सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायिक सोच की निरंतरता है।
🔹 इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992)
- मेरिट को प्राथमिकता
- 50% आरक्षण की सीमा
- क्रीमी लेयर सिद्धांत
🔹 आर.के. सब्बारवाल केस
- रोस्टर प्वाइंट का सिद्धांत
- पद आधारित आरक्षण
🔹 जर्नैल सिंह केस
- आरक्षण का उद्देश्य प्रतिनिधित्व है, विशेषाधिकार नहीं
वर्तमान निर्णय इन्हीं सिद्धांतों को और अधिक स्पष्ट करता है।
शैक्षणिक संस्थानों पर प्रभाव
इस निर्णय का प्रभाव विशेष रूप से:
- IITs
- IIMs
- AIIMS
- केंद्रीय विश्वविद्यालय
- राज्य विश्वविद्यालय
पर पड़ेगा।
अब:
- यदि कोई SC/ST/OBC/EWS छात्र
- जनरल कट–ऑफ पार करता है
तो:
- उसे जनरल सीट मिलेगी
- आरक्षित सीटें अन्य छात्रों के लिए बचेंगी
इससे:
- प्रवेश प्रक्रिया अधिक न्यायपूर्ण होगी
- प्रतिभाशाली छात्रों को अनावश्यक वर्गीकरण से मुक्ति मिलेगी
सरकारी नौकरियों में चयन प्रक्रिया पर असर
सरकारी सेवाओं जैसे:
- UPSC
- SSC
- बैंकिंग
- राज्य लोक सेवा आयोग
अब चयन सूची तैयार करते समय यह सुनिश्चित करना होगा कि:
- मेरिट से चयनित आरक्षित उम्मीदवार
- जनरल कैटेगरी में गिने जाएँ
इससे:
- पदों की वास्तविक आरक्षित संख्या बनी रहेगी
- मुकदमों और विवादों में कमी आएगी
आलोचना और समर्थन : सामाजिक दृष्टिकोण
समर्थन में तर्क
- यह निर्णय योग्यता को सम्मान देता है
- आरक्षण का उद्देश्य कमजोरों को अवसर देना है, न कि योग्य को सीमित करना
- इससे आरक्षित वर्ग के भीतर भी आत्मविश्वास बढ़ेगा
आलोचना के तर्क
- कुछ लोगों को आशंका है कि इससे जनरल सीटों पर प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी
- प्रशासनिक स्तर पर रोस्टर प्रबंधन जटिल हो सकता है
हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था सामाजिक न्याय के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसके अनुरूप है।
सामाजिक न्याय और समावेशन का नया दृष्टिकोण
यह निर्णय यह स्थापित करता है कि:
- आरक्षण और मेरिट एक–दूसरे के विरोधी नहीं हैं
- बल्कि दोनों का सह–अस्तित्व संभव है
यह फैसला उस धारणा को तोड़ता है कि आरक्षित वर्ग का व्यक्ति केवल आरक्षण से ही आगे बढ़ सकता है।
निष्कर्ष : संविधान की आत्मा के अनुरूप फैसला
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय:
- संविधान की मूल भावना को मजबूत करता है
- समानता, निष्पक्षता और पारदर्शिता को बढ़ावा देता है
- योग्य उम्मीदवारों के साथ होने वाले भेदभाव को समाप्त करता है
यह कहा जा सकता है कि यह फैसला आरक्षण को कमजोर नहीं, बल्कि अधिक न्यायसंगत और प्रभावी बनाता है।
“आरक्षण का उद्देश्य योग्यता को दबाना नहीं, बल्कि अवसरों की बराबरी सुनिश्चित करना है — और जब अवसर बराबर हों, तो मेरिट स्वयं बोलती है।”