महामारी और सार्वजनिक स्वास्थ्य कानून: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम, लॉकडाउन–वैक्सीन शासन तथा नागरिक अधिकारों की संवैधानिक कसौटी
प्रस्तावना: महामारी — केवल स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि कानूनी चुनौती
महामारी (Pandemic) केवल एक चिकित्सकीय या जैविक संकट नहीं होती, बल्कि यह कानून, शासन, मानवाधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों की भी गंभीर परीक्षा लेती है। कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि जब संक्रामक रोग समाज को जकड़ लेता है, तब राज्य को असाधारण शक्तियाँ ग्रहण करनी पड़ती हैं।
भारत में महामारी के दौरान राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 (NDMA), महामारी रोग अधिनियम, 1897, तथा विभिन्न कार्यपालिका आदेशों के माध्यम से लॉकडाउन, मास्किंग और वैक्सीनेशन जैसे कठोर उपाय लागू किए गए।
यह लेख महामारी और सार्वजनिक स्वास्थ्य कानून के संवैधानिक, वैधानिक और नैतिक पहलुओं का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
1. सार्वजनिक स्वास्थ्य कानून की अवधारणा और विकास
(क) सार्वजनिक स्वास्थ्य कानून क्या है?
सार्वजनिक स्वास्थ्य कानून वह विधिक ढाँचा है जिसके माध्यम से राज्य नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा, रोगों की रोकथाम और स्वास्थ्य सेवाओं के नियमन का कार्य करता है। इसका उद्देश्य केवल उपचार नहीं, बल्कि रोकथाम (Prevention) और सामूहिक सुरक्षा है।
(ख) भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य कानून का ऐतिहासिक विकास
भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य कानून का प्रारंभ औपनिवेशिक काल से हुआ—
- महामारी रोग अधिनियम, 1897
- नगर निगम व नगरपालिका कानून
- खाद्य सुरक्षा एवं औषधि कानून
- आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005
हालाँकि, भारत में अब तक एक समग्र सार्वजनिक स्वास्थ्य संहिता का अभाव रहा है।
2. महामारी की संवैधानिक पृष्ठभूमि
(क) स्वास्थ्य: राज्य सूची का विषय
संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार “सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता” राज्य सूची का विषय है, किंतु महामारी जैसे राष्ट्रीय संकट में केंद्र की भूमिका निर्णायक हो जाती है।
(ख) अनुच्छेद 21 और स्वास्थ्य का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने अनेक निर्णयों में माना है कि—
“स्वास्थ्य का अधिकार, जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का अभिन्न अंग है।”
अतः महामारी के दौरान राज्य का दायित्व केवल प्रतिबंध लगाना नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सुविधाएँ सुनिश्चित करना भी है।
3. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 (NDMA): महामारी में भूमिका
(क) अधिनियम की संरचना
NDMA का उद्देश्य प्राकृतिक एवं मानव निर्मित आपदाओं का प्रबंधन है। इसके अंतर्गत—
- राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण
- राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण
- जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण
(ख) महामारी को “आपदा” घोषित करना
कोविड-19 के दौरान महामारी को “आपदा” मानते हुए NDMA लागू किया गया, जिससे—
- पूरे देश में एकसमान नीति
- केंद्र को निर्देशात्मक शक्ति
- राज्यों पर बाध्यकारी आदेश
लागू हो सके।
(ग) आलोचना
कानूनी विद्वानों का मत है कि—
- NDMA मूलतः महामारी के लिए नहीं बना
- सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए अलग कानून होना चाहिए
- कार्यपालिका को अत्यधिक विवेकाधिकार मिला
4. लॉकडाउन: कानूनी वैधता और प्रभाव
(क) लॉकडाउन क्या है?
लॉकडाउन वह स्थिति है जिसमें—
- आवागमन प्रतिबंधित
- व्यवसाय बंद
- सामाजिक गतिविधियाँ स्थगित
(ख) लॉकडाउन का कानूनी आधार
- NDMA, 2005
- आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 144
- कार्यपालिका आदेश
(ग) मौलिक अधिकारों पर प्रभाव
लॉकडाउन से प्रभावित हुए—
- अनुच्छेद 19(1)(d) – आवागमन की स्वतंत्रता
- अनुच्छेद 19(1)(g) – व्यवसाय की स्वतंत्रता
- अनुच्छेद 21 – आजीविका का अधिकार
(घ) न्यायिक दृष्टिकोण
न्यायालयों ने सामान्यतः माना कि—
“सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा हेतु अस्थायी प्रतिबंध उचित हो सकते हैं, बशर्ते वे अनुपातिक (Proportionate) हों।”
5. मास्किंग और सामाजिक दूरी: वैधानिक अनुशासन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अतिक्रमण?
(क) मास्क अनिवार्यता
राज्य सरकारों ने मास्क न पहनने पर—
- जुर्माना
- चालान
- कभी-कभी गिरफ्तारी
जैसे उपाय अपनाए।
(ख) कानूनी औचित्य
मास्किंग को—
- सामूहिक सुरक्षा
- न्यूनतम हस्तक्षेप
- वैज्ञानिक प्रमाण
के आधार पर न्यायसंगत ठहराया गया।
(ग) आलोचनात्मक दृष्टि
कुछ विशेषज्ञों ने प्रश्न उठाया कि—
- जुर्माने का अत्यधिक प्रयोग
- गरीब वर्ग पर असमान प्रभाव
- स्पष्ट कानून का अभाव
6. वैक्सीन शासन: अनिवार्यता बनाम सहमति
(क) वैक्सीनेशन नीति
सरकार ने—
- मुफ्त वैक्सीनेशन
- प्राथमिकता समूह
- डिजिटल प्रमाणपत्र
की व्यवस्था की।
(ख) वैक्सीन अनिवार्यता का प्रश्न
कई राज्यों ने—
- कार्यस्थल प्रवेश
- यात्रा
- शैक्षणिक संस्थान
को वैक्सीन से जोड़ा।
(ग) न्यायालयों का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया—
“वैक्सीनेशन स्वैच्छिक होना चाहिए, बलपूर्वक नहीं; किंतु सार्वजनिक स्वास्थ्य हित में कुछ प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।”
(घ) सूचित सहमति (Informed Consent)
वैक्सीनेशन में—
- जोखिम की जानकारी
- विकल्प की स्वतंत्रता
- पारदर्शिता
अत्यंत आवश्यक मानी गई।
7. सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल: अवधारणा और कानूनी शक्तियाँ
(क) सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल क्या है?
यह वह स्थिति है जब—
- रोग व्यापक रूप से फैलता है
- सामान्य प्रशासन अपर्याप्त हो जाता है
- असाधारण शक्तियाँ आवश्यक हो जाती हैं
(ख) भारत में विधिक रिक्तता
भारत में—
- “Public Health Emergency” की स्पष्ट संवैधानिक परिभाषा नहीं
- न ही इसके लिए पृथक अधिनियम
यह एक गंभीर विधायी कमी है।
8. नागरिक अधिकार बनाम राज्य की शक्ति
(क) संतुलन का सिद्धांत
महामारी में मुख्य प्रश्न यह होता है—
कितनी स्वतंत्रता छोड़ी जाए, ताकि जीवन सुरक्षित रहे?
(ख) अनुपातिकता का सिद्धांत
न्यायालयों ने बार-बार कहा—
- प्रतिबंध आवश्यक हों
- न्यूनतम हों
- समयबद्ध हों
- तर्कसंगत हों
(ग) कमजोर वर्गों पर प्रभाव
प्रवासी मजदूर, महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग—
- सबसे अधिक प्रभावित
- कानूनी संरक्षण अपर्याप्त
9. न्यायपालिका की भूमिका
न्यायालयों ने—
- ऑक्सीजन आपूर्ति
- अस्पताल व्यवस्था
- वैक्सीन नीति
- प्रवासी मजदूर अधिकार
पर सक्रिय भूमिका निभाई, जिससे न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) का नया आयाम उभरा।
10. भविष्य की दिशा: सुधार और सुझाव
(क) समग्र सार्वजनिक स्वास्थ्य कानून
भारत को चाहिए—
- पृथक Public Health Act
- स्पष्ट अधिकार और सीमाएँ
- मानवाधिकार-केंद्रित दृष्टिकोण
(ख) पारदर्शिता और जवाबदेही
- डेटा की पारदर्शिता
- निर्णयों का वैज्ञानिक आधार
- संसदीय निगरानी
(ग) संवैधानिक नैतिकता
महामारी में भी—
- लोकतंत्र
- स्वतंत्रता
- गरिमा
से समझौता नहीं होना चाहिए।
निष्कर्ष
महामारी और सार्वजनिक स्वास्थ्य कानून का संबंध राज्य की शक्ति और नागरिक स्वतंत्रता के बीच एक नाजुक संतुलन का प्रश्न है। कोविड-19 ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत को न केवल बेहतर स्वास्थ्य अवसंरचना, बल्कि स्पष्ट, मानवीय और संवैधानिक सार्वजनिक स्वास्थ्य कानून की भी आवश्यकता है।
यदि भविष्य की महामारियों से प्रभावी ढंग से निपटना है, तो कानून को सिर्फ नियंत्रण का साधन नहीं, बल्कि संरक्षण का माध्यम बनाना होगा।