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“मध्यस्थता में ‘मौन सहमति’ नहीं चलेगी”: अयोग्य मध्यस्थ पर आपत्ति के त्याग में स्पष्ट लिखित सहमति अनिवार्य —

“मध्यस्थता में ‘मौन सहमति’ नहीं चलेगी”: अयोग्य मध्यस्थ पर आपत्ति के त्याग में स्पष्ट लिखित सहमति अनिवार्य — निष्पक्षता और पक्षकारों की समानता की रक्षा में सुप्रीम कोर्ट की निर्णायक रेखा

भूमिका

        भारतीय मध्यस्थता कानून का मूल उद्देश्य तेज़, निष्पक्ष और विश्वासयोग्य विवाद समाधान प्रदान करना है। लेकिन यह उद्देश्य तभी साकार हो सकता है जब मध्यस्थ (Arbitrator) की निष्पक्षता, स्वतंत्रता और योग्यता पर कोई संदेह न हो। हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि मध्यस्थता प्रक्रिया की सफलता केवल दक्षता पर नहीं, बल्कि प्रक्रियात्मक न्याय (Procedural Fairness) और पक्षकारों की समानता (Equality of Parties) पर निर्भर करती है।

इसी संवैधानिक और विधिक पृष्ठभूमि में, सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय में यह साफ़ रेखा खींच दी है कि—

“मध्यस्थता में मात्र भागीदारी (Participation) को सहमति (Consent) नहीं माना जा सकता।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई मध्यस्थ कानूनन अयोग्य (Ineligible Arbitrator) है, तो उसके विरुद्ध आपत्ति का त्याग (Waiver) केवल और केवल स्पष्ट लिखित समझौते (Express Written Agreement) से ही संभव है। मौन, आचरण या प्रक्रिया में भाग लेना—इनमें से कोई भी “मानी हुई सहमति” (Deemed Waiver) नहीं बनाता।

यह फैसला भारतीय मध्यस्थता कानून, विशेषकर Arbitration and Conciliation Act, 1996 की धारा 12(5) और सातवीं अनुसूची (Seventh Schedule) की व्याख्या में एक मील का पत्थर है।


मामले की पृष्ठभूमि

विवाद की जड़ में वह स्थिति थी जहाँ—

  • एक पक्ष ने
  • ऐसे मध्यस्थ के समक्ष
  • मध्यस्थता कार्यवाही में भाग लिया
  • जो कानून के अनुसार अयोग्य था

बाद में जब उस पक्ष ने मध्यस्थ की नियुक्ति को चुनौती दी, तो यह तर्क दिया गया कि—

  • उसने कार्यवाही में भाग लेकर
  • अपनी आपत्ति छोड़ दी है
  • अर्थात् उसने “deemed waiver” कर दिया है

दूसरे पक्ष का कहना था कि—

  • यदि आपत्ति थी तो प्रारंभ में ही उठाई जानी चाहिए थी
  • प्रक्रिया में भागीदारी से यह माना जाए कि पक्ष ने सहमति दे दी

इसी प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मूल विधिक मुद्दा आया।


सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न

न्यायालय के सामने केंद्रीय प्रश्न था—

क्या किसी अयोग्य मध्यस्थ के समक्ष कार्यवाही में भाग लेना, अपने-आप में आपत्ति के त्याग (Waiver) के समान है?

इसके साथ जुड़े अन्य प्रश्न थे—

  • क्या धारा 12(5) के तहत निषेध को
    • मौन सहमति
    • या आचरण
      के आधार पर हटाया जा सकता है?
  • क्या निष्पक्ष मध्यस्थ का अधिकार
    • प्रक्रियात्मक सुविधा
      से कमतर हो सकता है?

धारा 12(5) और सातवीं अनुसूची का महत्व

Arbitration and Conciliation Act, 1996 की धारा 12(5) कहती है कि—

  • यदि कोई व्यक्ति
    • सातवीं अनुसूची में वर्णित
    • किसी भी श्रेणी में आता है
  • तो वह मध्यस्थ नियुक्त होने के लिए अयोग्य होगा

हालाँकि, एक अपवाद है—

  • यदि विवाद उत्पन्न होने के बाद
  • पक्षकार
  • स्पष्ट लिखित समझौते द्वारा
  • इस अयोग्यता को छोड़ने पर सहमत हों

यही वह बिंदु था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने ज़ोर दिया।


सुप्रीम कोर्ट का निर्णायक निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा—

“कानून द्वारा निषिद्ध अयोग्यता को केवल स्पष्ट लिखित समझौते से ही छोड़ा जा सकता है। न तो मौन, न आचरण और न ही कार्यवाही में भागीदारी इससे उत्पन्न हो सकती है।”

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि—

  • Participation ≠ Consent
  • प्रक्रिया में भाग लेना
    • मजबूरी
    • समय की कमी
    • या रणनीतिक कारणों से हो सकता है
  • इसे कभी भी
    • निष्पक्षता के अधिकार का त्याग
      नहीं माना जा सकता

‘Deemed Waiver’ की अवधारणा पर रोक

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से “Deemed Waiver” की अवधारणा को खारिज कर दिया।

अदालत ने कहा—

  • यदि deemed waiver को मान्यता दी जाए
    • तो धारा 12(5) अर्थहीन हो जाएगी
    • और शक्तिशाली पक्ष
      • कमजोर पक्ष को
      • अयोग्य मध्यस्थ के समक्ष
      • चुपचाप कार्यवाही में खींच सकता है

यह स्थिति पक्षकारों की समानता और निष्पक्ष प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों के विपरीत होगी।


निष्पक्षता और पक्षकारों की समानता

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि—

  • मध्यस्थता कोई निजी समझौता भर नहीं है
  • यह कानून द्वारा विनियमित न्यायिक प्रक्रिया है
  • जहाँ
    • निष्पक्ष मध्यस्थ
    • प्रक्रिया की आत्मा है

यदि अयोग्य मध्यस्थ को मौन सहमति से वैध मान लिया जाए, तो—

  • कमजोर पक्ष पर अनुचित दबाव पड़ेगा
  • मध्यस्थता “न्याय” से अधिक
    • “सुविधा” का साधन बन जाएगी

पूर्ववर्ती निर्णयों से सामंजस्य

यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट की पूर्ववर्ती न्यायिक सोच के अनुरूप है, जिसमें बार-बार कहा गया है कि—

  • निष्पक्ष मध्यस्थ का अधिकार मौलिक है
  • इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता
  • धारा 12(5)
    • एक अनिवार्य प्रावधान है
    • न कि औपचारिकता

अदालत ने दोहराया कि—

“जहाँ कानून ने स्पष्ट शब्दों में रास्ता बताया है, वहाँ न्यायालय कल्पनाओं के आधार पर अपवाद नहीं बना सकता।”


व्यावहारिक प्रभाव

इस निर्णय के दूरगामी प्रभाव होंगे—

1. मध्यस्थ नियुक्ति में सावधानी

संस्थाएँ और सरकारी निकाय अब—

  • मध्यस्थ नियुक्त करते समय
  • सातवीं अनुसूची का सख़्ती से पालन करेंगे

2. कमजोर पक्ष की सुरक्षा

  • कॉन्ट्रैक्ट्स में
    • एकतरफ़ा मध्यस्थ नियुक्ति
    • अब और अधिक न्यायिक जांच के दायरे में आएगी

3. स्पष्ट Waiver की अनिवार्यता

  • यदि पक्ष अयोग्य मध्यस्थ को स्वीकार करना चाहते हैं
    • तो
    • विवाद उत्पन्न होने के बाद
    • स्पष्ट लिखित समझौता करना होगा

आलोचनात्मक दृष्टि

कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि—

  • इस दृष्टिकोण से
    • मध्यस्थता की गति प्रभावित हो सकती है

लेकिन सुप्रीम कोर्ट का जवाब स्पष्ट है—

“तेज़ न्याय, अन्याय की क़ीमत पर नहीं हो सकता।”


निष्कर्ष

       “No Deemed Waiver in Arbitration” पर सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय मध्यस्थता कानून में एक मजबूत स्तंभ जोड़ता है। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि—

  • निष्पक्ष मध्यस्थ का अधिकार
    • मौलिक है
    • और
    • इसे मौन या आचरण से नहीं छोड़ा जा सकता
  • केवल स्पष्ट लिखित सहमति ही
    • अयोग्यता को हटाने का वैध माध्यम है

यह फैसला मध्यस्थता को
तेज़ तो रखता है, लेकिन न्याय की कीमत पर नहीं,
और यही किसी भी वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणाली की असली सफलता है।