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भ्रष्टाचार कोई “आधिकारिक कर्तव्य” नहीं: झारखंड उच्च न्यायालय का सख़्त संदेश — धारा 197 CrPC की आड़ में भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण नहीं

भ्रष्टाचार कोई “आधिकारिक कर्तव्य” नहीं: झारखंड उच्च न्यायालय का सख़्त संदेश — धारा 197 CrPC की आड़ में भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण नहीं

भूमिका

        भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में लोक सेवकों को एक सीमा तक संरक्षण प्रदान किया गया है, ताकि वे अपने ईमानदार आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन भयमुक्त होकर कर सकें। इसी उद्देश्य से दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 197 में यह प्रावधान किया गया कि किसी लोक सेवक के विरुद्ध अभियोजन चलाने से पहले सक्षम प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति (Sanction) आवश्यक होगी, बशर्ते आरोपित कृत्य उसके आधिकारिक कर्तव्यों से संबंधित हो।

       लेकिन इस संरक्षण का दुरुपयोग वर्षों से भ्रष्टाचार, घोटालों और सार्वजनिक धन की लूट में लिप्त अधिकारियों द्वारा किया जाता रहा है। इसी पृष्ठभूमि में झारखंड उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला है, जिसमें न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि—

“सार्वजनिक धन की हेराफेरी, रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार को किसी भी परिस्थिति में ‘आधिकारिक कर्तव्य’ नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में धारा 197 CrPC के अंतर्गत अभियोजन स्वीकृति का संरक्षण उपलब्ध नहीं है।”

यह निर्णय न केवल विधिक दृष्टि से, बल्कि नैतिक और संवैधानिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।


मामले की पृष्ठभूमि

झारखंड उच्च न्यायालय के समक्ष यह प्रश्न उठा कि क्या एक लोक सेवक, जिस पर सार्वजनिक धन के गबन, वित्तीय अनियमितता और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं, यह तर्क दे सकता है कि उसके विरुद्ध अभियोजन चलाने के लिए धारा 197 CrPC के अंतर्गत पूर्व स्वीकृति आवश्यक है।

आरोपी लोक सेवकों का तर्क था कि—

  • वे सरकारी पद पर कार्यरत थे
  • कथित कृत्य उनके कार्यकाल के दौरान हुए
  • अतः उन्हें अभियोजन से पूर्व वैधानिक संरक्षण मिलना चाहिए

दूसरी ओर, राज्य की ओर से यह दलील दी गई कि—

  • सार्वजनिक धन का दुरुपयोग किसी भी प्रकार से आधिकारिक कर्तव्य नहीं हो सकता
  • भ्रष्टाचार निजी लाभ हेतु किया गया कृत्य है
  • ऐसे मामलों में धारा 197 लागू करना कानून की मंशा के विपरीत होगा

न्यायालय का निर्णायक दृष्टिकोण

झारखंड उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलों पर गहन विचार करते हुए कहा कि—

धारा 197 CrPC का उद्देश्य ईमानदार अधिकारियों को निराधार और प्रतिशोधात्मक अभियोजन से बचाना है, न कि भ्रष्टाचारियों को ढाल प्रदान करना।

न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि—

  • यदि कोई कृत्य लोक सेवक के पद का दुरुपयोग करके किया गया हो
  • यदि वह कृत्य निजी लाभ, अवैध संपत्ति अर्जन या सार्वजनिक धन की हानि से जुड़ा हो
  • तो उसे कभी भी आधिकारिक कर्तव्य के अंतर्गत नहीं लाया जा सकता

धारा 197 CrPC: उद्देश्य और सीमाएँ

धारा 197 का मूल उद्देश्य

धारा 197 CrPC यह कहती है कि—

जब कोई लोक सेवक अपने आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन में कोई ऐसा कार्य करता है, जिससे किसी अपराध का आरोप लगता है, तो उसके विरुद्ध अभियोजन चलाने से पहले सरकार की स्वीकृति आवश्यक होगी।

इसका उद्देश्य है—

  • प्रशासनिक कार्यों में निडरता सुनिश्चित करना
  • ईमानदार अधिकारियों को राजनीतिक या निजी द्वेष से बचाना

परंतु इसकी सीमाएँ भी हैं

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि—

  • यह संरक्षण असीमित (absolute) नहीं है
  • हर वह कृत्य जो कार्यालय के समय हुआ हो, आधिकारिक नहीं हो जाता
  • भ्रष्टाचार, रिश्वत, गबन, धोखाधड़ी जैसे कृत्य निजी लाभ से प्रेरित होते हैं

भ्रष्टाचार और “आधिकारिक कर्तव्य” के बीच अंतर

झारखंड उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण अंतर रेखांकित किया—

आधिकारिक कर्तव्य भ्रष्ट कृत्य
कानून द्वारा अधिकृत कानून द्वारा निषिद्ध
सार्वजनिक हित में निजी लाभ के लिए
कर्तव्य निर्वहन पद का दुरुपयोग
संरक्षित असंरक्षित

न्यायालय के अनुसार—

“भ्रष्टाचार सत्ता का दुरुपयोग है, न कि सत्ता का प्रयोग।”


सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों से सामंजस्य

झारखंड उच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के अनेक ऐतिहासिक निर्णयों के अनुरूप है, जिनमें कहा गया है कि—

  • Prakash Singh Badal v. State of Punjab
  • Parkash Singh Badal Case
  • State of Kerala v. V. Padmanabhan Nair

इन मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने दो टूक कहा कि—

“भ्रष्टाचार को कभी भी आधिकारिक कर्तव्य नहीं कहा जा सकता।”

झारखंड HC ने इन्हीं सिद्धांतों को दोहराते हुए यह सुनिश्चित किया कि निचली अदालतों में कोई भ्रम न रहे।


लोक प्रशासन पर प्रभाव

इस निर्णय के प्रशासनिक प्रभाव अत्यंत व्यापक हैं—

  1. भ्रष्ट अधिकारियों का मनोबल टूटेगा
  2. जांच एजेंसियों को मजबूती मिलेगी
  3. अभियोजन में अनावश्यक देरी समाप्त होगी
  4. जनता का न्याय व्यवस्था पर विश्वास बढ़ेगा

अब यह स्पष्ट हो गया है कि—

“सरकारी पद भ्रष्टाचार का लाइसेंस नहीं है।”


न्यायिक नैतिकता और संविधानिक मूल्य

न्यायालय ने अपने निर्णय में संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 21 (गरिमा व निष्पक्ष न्याय) की भावना को भी रेखांकित किया।

यदि भ्रष्ट अधिकारी को केवल पद के कारण संरक्षण दिया जाए, तो—

  • यह आम नागरिक के साथ अन्याय होगा
  • कानून के समक्ष समानता का सिद्धांत प्रभावित होगा

जनता और लोकतंत्र के लिए संदेश

झारखंड उच्च न्यायालय का यह फैसला आम जनता के लिए एक सकारात्मक संकेत है कि—

  • न्यायालय भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता रखते हैं
  • कानूनी तकनीकीताओं की आड़ में अब अपराध छिपाना आसान नहीं होगा

यह निर्णय लोकतंत्र को मजबूत करता है, क्योंकि—

लोकतंत्र की आत्मा पारदर्शिता और जवाबदेही में निहित है।


आलोचनात्मक दृष्टि

कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि—

  • इससे अधिकारियों में भय उत्पन्न होगा
  • वे निर्णय लेने से कतराएंगे

लेकिन न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि—

  • ईमानदार निर्णयों को डरने की आवश्यकता नहीं
  • केवल वही अधिकारी भयभीत होंगे, जिनके कार्य दागदार हैं

भविष्य की दिशा

यह निर्णय आने वाले समय में—

  • भ्रष्टाचार निरोधक कानूनों को मजबूती देगा
  • ट्रायल कोर्ट्स को स्पष्ट मार्गदर्शन प्रदान करेगा
  • लोक सेवकों को जवाबदेह प्रशासन की ओर प्रेरित करेगा

निष्कर्ष

झारखंड उच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय न्यायिक इतिहास में एक मजबूत नैतिक और विधिक घोषणा के रूप में दर्ज होगा।

“भ्रष्टाचार कोई आधिकारिक कर्तव्य नहीं, बल्कि लोकतंत्र पर आघात है।”

धारा 197 CrPC का उपयोग ढाल के रूप में नहीं, बल्कि न्याय के संतुलन के लिए होना चाहिए। इस निर्णय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि—

कानून भ्रष्टाचारियों का रक्षक नहीं, बल्कि जनता का संरक्षक है।