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भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 1 : नामकरण से लेकर क्षेत्राधिकार तक — आपराधिक कानून की संवैधानिक नींव

भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 1 : नामकरण से लेकर क्षेत्राधिकार तक — आपराधिक कानून की संवैधानिक नींव

प्रस्तावना : हर कानून की आत्मा उसकी धारा 1 में

      किसी भी विधि का वास्तविक परिचय उसकी पहली धारा से होता है। धारा 1 केवल एक औपचारिक प्रावधान नहीं होती, बल्कि वही यह निर्धारित करती है कि कानून कब, कहाँ, किन पर और किन परिस्थितियों में लागू होगा। इसी दृष्टि से देखा जाए तो भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 1 इस संहिता की रीढ़ और आधारशिला है।

     यह धारा स्पष्ट करती है कि भारत का नया आपराधिक कानून केवल औपनिवेशिक IPC का स्थानापन्न नहीं है, बल्कि यह आधुनिक भारत की संप्रभुता, तकनीकी यथार्थ और वैश्विक अपराधों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया विधायी ढांचा है।


धारा 1 का शीर्षक : “संक्षिप्त नाम, प्रारंभ और विस्तार”

धारा 1 तीन मूल प्रश्नों का उत्तर देती है—

  1. इस कानून को क्या कहा जाएगा?
  2. यह कब से लागू होगा?
  3. यह कहाँ और किन परिस्थितियों में लागू होगा?

यही तीन प्रश्न किसी भी आपराधिक कानून की वैधता और प्रभावशीलता तय करते हैं।


भाग – I

संक्षिप्त नाम (Short Title) : पहचान और वैधानिक अस्तित्व

1. आधिकारिक नाम का महत्व

धारा 1(1) के अनुसार इस कानून का नाम है—

“भारतीय न्याय संहिता, 2023”

यह नामकरण अपने आप में एक वैचारिक परिवर्तन को दर्शाता है। “दंड” (Penal) शब्द के स्थान पर “न्याय” (Nyaya) शब्द का प्रयोग यह संकेत देता है कि—

  • कानून का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं
  • बल्कि न्याय सुनिश्चित करना है

यह परिवर्तन संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अवधारणा के अधिक निकट है।


2. IPC से BNS तक : नाम में निहित दर्शन

पुरानी भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) औपनिवेशिक शासन की आवश्यकता के अनुरूप बनाई गई थी, जहाँ प्राथमिक उद्देश्य शासन बनाए रखना था। इसके विपरीत, BNS—

  • लोकतांत्रिक भारत
  • नागरिक अधिकारों
  • और संवैधानिक मूल्यों

को केंद्र में रखती है।

इस प्रकार, संक्षिप्त नाम केवल पहचान नहीं, बल्कि कानून के चरित्र को भी दर्शाता है।


भाग – II

प्रारंभ (Commencement) : कब से लागू हुआ कानून

1. प्रभावी तिथि

धारा 1(2) के अनुसार—

भारतीय न्याय संहिता, 2023, 1 जुलाई 2024 से प्रभावी हुई।

इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि—

  • 1 जुलाई 2024 के बाद किए गए अपराधों पर
  • IPC नहीं, बल्कि BNS लागू होगी

यह सिद्धांत पूर्वव्यापी दंड निषेध (Ex post facto law) के संवैधानिक नियम के अनुरूप है।


2. अनुच्छेद 20(1) से सामंजस्य

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 20(1) कहता है कि—

किसी व्यक्ति को उस कृत्य के लिए दंडित नहीं किया जा सकता, जो अपराध के समय कानूनन अपराध नहीं था।

BNS की धारा 1 इस संवैधानिक सुरक्षा का पूर्ण सम्मान करती है।
अर्थात—

  • IPC के समय का अपराध → IPC के तहत
  • BNS के लागू होने के बाद का अपराध → BNS के तहत

यह स्पष्टता कानूनी निश्चितता (Legal Certainty) को सुनिश्चित करती है।


भाग – III

क्षेत्राधिकार और विस्तार : कानून की भौगोलिक और विधिक सीमा

धारा 1 का सबसे महत्वपूर्ण और व्यापक भाग इसका क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) है। यहीं से BNS, IPC से कहीं आगे निकल जाती है।


1. संपूर्ण भारत पर लागू

धारा 1(3) स्पष्ट करती है कि—

यह संहिता संपूर्ण भारत पर लागू होगी।

यह प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि—

  • कोई राज्य या क्षेत्र इससे बाहर नहीं है
  • जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्रों को लेकर कोई अस्पष्टता नहीं

यह 2019 के बाद के संवैधानिक ढांचे के अनुरूप एकीकृत आपराधिक कानून की स्थापना करता है।


2. भारत के भीतर किए गए अपराध

(a) व्यक्ति की राष्ट्रीयता अप्रासंगिक

यदि—

  • कोई भारतीय नागरिक
  • कोई विदेशी नागरिक
  • कोई Stateless व्यक्ति

भारत की भौगोलिक सीमा के भीतर ऐसा कार्य करता है जो BNS के अंतर्गत अपराध है, तो—

उस पर BNS के अंतर्गत मुकदमा चलेगा।

यह Territorial Jurisdiction का क्लासिक सिद्धांत है, जिसे अंतरराष्ट्रीय कानून भी मान्यता देता है।


3. भारत के बाहर किए गए अपराध : विधिक विस्तार

धारा 1(4) और 1(5) BNS को एक वैश्विक दृष्टिकोण प्रदान करती हैं।

यह उप-धाराएँ यह स्पष्ट करती हैं कि कुछ परिस्थितियों में भारत का आपराधिक कानून देश की सीमाओं से बाहर भी प्रभावी होगा।


भाग – IV

विशेष विस्तार (Extraterritorial Jurisdiction) : आधुनिक अपराधों का उत्तर

1. भारतीय नागरिक द्वारा विदेश में अपराध

यदि कोई भारतीय नागरिक

  • विदेश में रहते हुए
  • ऐसा अपराध करता है
  • जो BNS के अनुसार दंडनीय है

तो भारत में उसके विरुद्ध मुकदमा चलाया जा सकता है, मानो अपराध भारत में ही किया गया हो।

यह सिद्धांत राज्य और नागरिक के बीच निरंतर विधिक संबंध को दर्शाता है।


2. भारत में पंजीकृत जहाज और विमान

धारा 1(5) के अंतर्गत—

  • भारत में पंजीकृत जहाज (Ship)
  • भारत में पंजीकृत विमान (Aircraft)

पर किए गए अपराध, चाहे वह—

  • अंतरराष्ट्रीय समुद्र में हों
  • या विदेशी वायु-क्षेत्र में

फिर भी BNS के अधीन आएंगे।

यह अंतरराष्ट्रीय कानून के Flag State Principle के अनुरूप है।


3. डिजिटल और साइबर अपराध : सबसे बड़ा परिवर्तन

BNS की धारा 1 का सबसे आधुनिक और क्रांतिकारी पहलू है—

कंप्यूटर संसाधनों पर किए गए विदेशी हमलों को शामिल करना।

यदि कोई व्यक्ति—

  • भारत से बाहर बैठकर
  • भारत में स्थित किसी कंप्यूटर, सर्वर, नेटवर्क या डिजिटल सिस्टम को
  • निशाना बनाता है

तो—

वह व्यक्ति BNS के अंतर्गत उत्तरदायी होगा।

यह प्रावधान भारत की डिजिटल संप्रभुता की रक्षा का विधायी घोषणा-पत्र है।


भाग – V

IPC बनाम BNS : धारा 1 में संरचनात्मक परिवर्तन

IPC में क्षेत्राधिकार से संबंधित प्रावधान—

  • धारा 1
  • धारा 2
  • धारा 3
  • धारा 4

में बिखरे हुए थे।

BNS ने इन सभी को—

एक ही धारा (धारा 1) के विभिन्न उप-खंडों में समाहित कर दिया है।

इसके लाभ—

  • कानून अधिक सरल और सुलभ
  • व्याख्या में कम भ्रम
  • छात्रों, पुलिस और न्यायालय के लिए सुविधा

यह विधायी सरलीकरण आधुनिक कानून-निर्माण की एक महत्वपूर्ण विशेषता है।


भाग – VI

संवैधानिक और व्यावहारिक महत्व

धारा 1 यह सुनिश्चित करती है कि—

  • अपराधी केवल भौगोलिक सीमा का लाभ उठाकर
  • या तकनीकी माध्यमों से
  • भारतीय कानून से नहीं बच सकता

यह प्रावधान—

  • संविधान की संप्रभुता
  • राज्य की सुरक्षा
  • और नागरिकों के अधिकार

तीनों के बीच संतुलन स्थापित करता है।


निष्कर्ष : धारा 1 — केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि शक्ति का स्रोत

भारतीय न्याय संहिता की धारा 1 केवल एक प्रारंभिक धारा नहीं है। यह—

  • कानून की पहचान
  • उसकी वैधता
  • उसका विस्तार
  • और उसकी आधुनिक दृष्टि

सभी को एक साथ परिभाषित करती है।

संक्षेप में—

धारा 1 यह सुनिश्चित करती है कि न्याय की पहुँच
सीमाओं, तकनीक या नागरिकता से बाधित न हो।

यदि BNS को एक इमारत माना जाए, तो धारा 1 उसकी नींव है—मजबूत, व्यापक और भविष्य-उन्मुख।