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भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 103— हत्या का अपराध, दंड व्यवस्था और ‘मॉब लिंचिंग’ पर कानून का सबसे कठोर प्रहार

भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 103— हत्या का अपराध, दंड व्यवस्था और ‘मॉब लिंचिंग’ पर कानून का सबसे कठोर प्रहार

        भारतीय दंड कानून के इतिहास में भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita – BNS) एक निर्णायक मोड़ के रूप में सामने आई है। इस नई संहिता ने औपनिवेशिक काल की भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) का स्थान लेते हुए अपराध, दंड और न्याय की अवधारणा को समकालीन सामाजिक वास्तविकताओं के अनुरूप ढालने का प्रयास किया है। इसी क्रम में धारा 103 विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह हत्या (Murder) जैसे गंभीरतम अपराध को न केवल परिभाषित करती है, बल्कि भीड़ द्वारा की गई हत्या (Mob Lynching) को पहली बार स्पष्ट और कठोर रूप से कानून के दायरे में लाती है।

       धारा 103 भारतीय समाज में बढ़ती हिंसा, सामूहिक अपराधों और पहचान-आधारित नफरत से उत्पन्न हत्याओं के प्रति कानूनी और नैतिक चेतावनी के रूप में उभरती है।


धारा 103 का स्थान और महत्व

        भारतीय न्याय संहिता में धारा 103, मानव जीवन के विरुद्ध अपराधों से संबंधित अध्याय में आती है। हत्या को हर सभ्य समाज में सबसे घृणित और अक्षम्य अपराध माना गया है, क्योंकि यह सीधे तौर पर जीवन के मौलिक अधिकार का हनन करता है।

संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। धारा 103 इसी संवैधानिक मूल्य की दंडात्मक अभिव्यक्ति है, जो यह सुनिश्चित करती है कि जीवन छीनने वाले अपराध को सबसे कठोर दंड मिले।


धारा 103(1): हत्या की परिभाषा और सामान्य दंड

धारा 103 का उपखंड (1) हत्या के अपराध और उसके दंड को स्पष्ट करता है। इसके अनुसार—

यदि कोई व्यक्ति हत्या का अपराध करता है, तो उसे:

  • मृत्युदंड, या
  • आजीवन कारावास, और
  • जुर्माने से दंडित किया जाएगा।

यह प्रावधान IPC की धारा 302 के समकक्ष है, किंतु भाषा और संरचना के स्तर पर अधिक स्पष्ट और संक्षिप्त है।

हत्या का तात्पर्य क्या है?

हालाँकि हत्या की विस्तृत परिभाषा बीएनएस की अन्य धाराओं (जैसे धारा 101–102) से मिलकर बनती है, लेकिन संक्षेप में हत्या तब मानी जाती है जब—

  • किसी व्यक्ति की मृत्यु जानबूझकर की जाए, या
  • मृत्यु कारित करने के आशय से ऐसा कृत्य किया जाए, या
  • ऐसा कृत्य किया जाए जिसके बारे में यह ज्ञान हो कि उससे मृत्यु होना लगभग निश्चित है।

मृत्युदंड या आजीवन कारावास: न्यायिक विवेक

धारा 103(1) में अदालत को मृत्युदंड और आजीवन कारावास के बीच चयन का विवेकाधिकार दिया गया है। भारतीय न्याय व्यवस्था में यह सिद्धांत स्थापित है कि—

“मृत्युदंड केवल ‘दुर्लभतम से दुर्लभ’ मामलों में ही दिया जाना चाहिए।”

अतः हर हत्या में मृत्युदंड नहीं, बल्कि अपराध की प्रकृति, नीयत, क्रूरता, सामाजिक प्रभाव और परिस्थितियों को देखते हुए दंड तय किया जाएगा।


धारा 103(2): भीड़ द्वारा हत्या (Mob Lynching) — ऐतिहासिक प्रावधान

धारा 103(2) भारतीय न्याय संहिता का सबसे क्रांतिकारी और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रावधान है। यह उपखंड कहता है कि—

यदि पाँच या अधिक व्यक्ति मिलकर किसी व्यक्ति की हत्या करते हैं, और यह हत्या—

  • जाति
  • धर्म
  • लिंग
  • जन्म स्थान
  • भाषा
  • या किसी अन्य समान पहचान-आधारित कारण

पर आधारित हो, तो ऐसे समूह का प्रत्येक सदस्य हत्या का दोषी माना जाएगा।

दंड क्या होगा?

ऐसे मामलों में प्रत्येक आरोपी को:

  • मृत्युदंड, या
  • आजीवन कारावास, और
  • जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।

यह प्रावधान सीधे तौर पर मॉब लिंचिंग को लक्ष्य करता है।


मॉब लिंचिंग: सामाजिक बीमारी से कानूनी अपराध तक

मॉब लिंचिंग कोई साधारण हत्या नहीं होती। यह—

  • कानून के शासन को खुली चुनौती
  • न्यायपालिका पर अविश्वास
  • और भीड़ की हिंसक मानसिकता

का परिणाम होती है।

अक्सर ऐसे मामलों में आरोप यह होता है कि पीड़ित ने—

  • गो-तस्करी की
  • चोरी की
  • अंतरधार्मिक संबंध रखा
  • या किसी विशेष समुदाय से संबंधित था

बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया के, भीड़ स्वयं को न्यायाधीश और जल्लाद बना लेती है।

धारा 103(2) ऐसे हर प्रयास को यह स्पष्ट संदेश देती है कि—

“कानून अपने हाथ में लेने वालों के लिए कोई सहानुभूति नहीं है।”


सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत

धारा 103(2) में सामूहिक उत्तरदायित्व (Collective Liability) का सिद्धांत निहित है। इसका अर्थ यह है कि—

  • जिसने वार किया
  • जिसने उकसाया
  • जिसने रास्ता रोका
  • जिसने पहचान बताई
  • या जिसने भीड़ का हिस्सा बनकर समर्थन किया

— सभी समान रूप से दोषी होंगे।

यह प्रावधान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मॉब लिंचिंग में अक्सर कोई यह नहीं मानता कि “मैंने हत्या नहीं की”। कानून कहता है—

“यदि आप उस भीड़ का हिस्सा थे, तो आप भी उतने ही जिम्मेदार हैं।”


पहचान-आधारित अपराध और संविधान

धारा 103(2) में जिन आधारों का उल्लेख है— जाति, धर्म, लिंग, जन्म स्थान— ये सभी संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 से सीधे जुड़े हुए हैं।

इस प्रकार यह प्रावधान:

  • समानता के अधिकार
  • भेदभाव निषेध
  • और जीवन के अधिकार

की दंडात्मक सुरक्षा करता है।


IPC से BNS तक: क्या बदला?

IPC में मॉब लिंचिंग के लिए कोई स्वतंत्र और स्पष्ट धारा नहीं थी। अदालतें इसे—

  • धारा 302 (हत्या)
  • धारा 34 (सामान्य अभिप्राय)
  • धारा 149 (अवैध जमावड़ा)

के माध्यम से देखती थीं।

लेकिन BNS की धारा 103(2) ने पहली बार इसे स्वतंत्र पहचान दी, जिससे—

  • अभियोजन मजबूत होगा
  • सजा सुनिश्चित होगी
  • और अपराध की गंभीरता स्पष्ट होगी

न्यायालयों के लिए मार्गदर्शन

धारा 103 न्यायालयों को यह स्पष्ट संकेत देती है कि—

  • पहचान-आधारित हत्याएँ साधारण अपराध नहीं
  • समाज को अस्थिर करने वाले कृत्य हैं
  • और इनसे कठोरता से निपटना आवश्यक है

इससे निचली अदालतों और हाईकोर्ट को दंड निर्धारण में स्पष्ट दिशा मिलेगी।


आलोचनाएँ और चिंताएँ

हालाँकि धारा 103(2) का व्यापक स्वागत हुआ है, फिर भी कुछ कानूनी चिंताएँ भी व्यक्त की गई हैं:

  • क्या हर भीड़ में मौजूद व्यक्ति समान रूप से दोषी होगा?
  • निर्दोष दर्शकों और वास्तविक अपराधियों में अंतर कैसे किया जाएगा?
  • क्या इसका दुरुपयोग संभव है?

इन प्रश्नों का उत्तर न्यायालयों द्वारा साक्ष्य के सूक्ष्म मूल्यांकन और न्यायिक विवेक से दिया जाएगा।


निष्कर्ष: जीवन की सर्वोच्च सुरक्षा

भारतीय न्याय संहिता की धारा 103 केवल एक दंडात्मक प्रावधान नहीं, बल्कि यह एक नैतिक और संवैधानिक घोषणा है कि—

  • मानव जीवन सर्वोच्च है
  • भीड़ की हिंसा अस्वीकार्य है
  • और पहचान के आधार पर हत्या लोकतंत्र पर हमला है

यह धारा स्पष्ट करती है कि भारत में कानून का शासन भीड़ के शासन से कहीं ऊपर है।

धारा 103 आने वाले समय में न केवल हत्या के मामलों में, बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और मानव गरिमा की रक्षा में एक मजबूत स्तंभ सिद्ध होगी।