भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 1: आपराधिक प्रक्रिया में नए युग की संवैधानिक नींव
प्रस्तावना
किसी भी विधायी अधिनियम की आत्मा उसके उद्देश्य और दायरे में निहित होती है, और यह आत्मा सबसे पहले जिस प्रावधान में अभिव्यक्त होती है, वह है उसकी धारा 1। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita – BNSS) की धारा 1 केवल एक औपचारिक प्रारंभिक धारा नहीं है, बल्कि यह भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में एक वैचारिक, दार्शनिक और संवैधानिक परिवर्तन का उद्घोष करती है।
दशकों से लागू दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (Criminal Procedure Code – CrPC) औपनिवेशिक शासन की विरासत थी, जिसका मूल उद्देश्य “राज्य की शक्ति” को प्रभावी बनाना था। इसके विपरीत, BNSS का उद्देश्य “नागरिक की सुरक्षा, गरिमा और अधिकार” को आपराधिक प्रक्रिया के केंद्र में स्थापित करना है। धारा 1 इसी नए दृष्टिकोण की आधारशिला है।
धारा 1 का वैधानिक ढांचा: प्रारंभिक लेकिन निर्णायक
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 1 तीन मुख्य स्तंभों पर आधारित है—
- संक्षिप्त नाम (Short Title)
- विस्तार (Extent)
- प्रवर्तन या प्रारंभ (Commencement)
यद्यपि यह संरचना पारंपरिक प्रतीत होती है, किंतु इसके भीतर छिपा संदेश अत्यंत गहरा और दूरगामी है।
1. संक्षिप्त नाम: ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’—एक वैचारिक बदलाव
धारा 1(1) के अनुसार, इस अधिनियम को “भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023” कहा जाएगा। पहली दृष्टि में यह केवल नाम का परिवर्तन प्रतीत हो सकता है, किंतु विधायी दृष्टिकोण से यह परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पूर्ववर्ती कानून का नाम था—दंड प्रक्रिया संहिता। यहाँ “दंड” (Punishment) शब्द केंद्र में था। BNSS में यह शब्द हटाकर उसकी जगह “नागरिक सुरक्षा” को रखा गया है। यह बदलाव स्पष्ट रूप से यह संकेत देता है कि:
- राज्य की प्राथमिक भूमिका अब केवल अपराधी को दंडित करना नहीं है,
- बल्कि अपराध की प्रक्रिया में पीड़ित, आरोपी और समाज—तीनों के अधिकारों की रक्षा करना है।
यह नाम परिवर्तन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) की आधुनिक व्याख्या के अनुरूप है, जहाँ प्रक्रियात्मक न्याय (Procedural Justice) को मौलिक अधिकार का हिस्सा माना गया है।
2. विस्तार: “सम्पूर्ण भारत” और राष्ट्रीय एकरूपता
धारा 1(2) यह घोषित करती है कि यह संहिता सम्पूर्ण भारत पर लागू होगी। यह वाक्य मात्र चार शब्दों का है, किंतु इसका संवैधानिक महत्व अत्यधिक व्यापक है।
(क) अनुच्छेद 370 के बाद का परिदृश्य
CrPC, 1973 लंबे समय तक जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं थी। वहाँ अलग दंड प्रक्रिया कानून लागू था। किंतु अनुच्छेद 370 के निरसन के बाद भारत के सभी केंद्रीय कानून पूरे देश में समान रूप से लागू हो गए। BNSS की धारा 1 इस “एक राष्ट्र, एक आपराधिक प्रक्रिया” की अवधारणा को विधायी रूप प्रदान करती है।
यह एकरूपता निम्नलिखित लाभ सुनिश्चित करती है—
- न्यायिक प्रक्रिया में समानता
- पुलिस और जांच एजेंसियों के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश
- नागरिकों के लिए कानून की पूर्वानुमेयता (Predictability of Law)
(ख) नागालैंड और जनजातीय क्षेत्रों के लिए विशेष अपवाद
धारा 1(2) में एक महत्वपूर्ण संतुलन भी स्थापित किया गया है। संहिता के सभी प्रावधान नागालैंड और कुछ अधिसूचित जनजातीय क्षेत्रों पर स्वचालित रूप से लागू नहीं होते।
इसका कारण
भारत का संविधान सांस्कृतिक बहुलता को मान्यता देता है। कई जनजातीय क्षेत्रों में आज भी परंपरागत न्याय प्रणालियाँ (Customary Justice Systems) प्रभावी हैं। यदि आधुनिक आपराधिक प्रक्रिया को बिना संवेदनशीलता के वहाँ लागू किया जाए, तो सामाजिक असंतुलन उत्पन्न हो सकता है।
अपवाद के भीतर अपवाद
हालाँकि, धारा 1 यह भी स्पष्ट करती है कि—
- लोक व्यवस्था, निवारक कार्रवाई और अदालत की अवमानना से संबंधित अध्याय इन क्षेत्रों में भी लागू रहेंगे।
यह दर्शाता है कि राज्य ने संस्कृति और सुरक्षा के बीच संतुलन साधने का प्रयास किया है—जहाँ स्थानीय स्वायत्तता का सम्मान हो, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता न हो।
3. प्रवर्तन: अधिसूचना द्वारा लागू होने की संवैधानिक तकनीक
धारा 1(3) केंद्र सरकार को यह अधिकार देती है कि वह राजपत्र में अधिसूचना जारी करके इस संहिता के लागू होने की तिथि निर्धारित करे।
भारत सरकार ने इस शक्ति का प्रयोग करते हुए 1 जुलाई 2024 को BNSS को प्रभावी घोषित किया। यह तिथि मात्र प्रशासनिक निर्णय नहीं थी, बल्कि इसे इस प्रकार चुना गया कि—
- न्यायिक अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जा सके
- पुलिस व्यवस्था को तकनीकी रूप से तैयार किया जा सके
- लंबित मामलों के संक्रमण (Transition) के लिए दिशा-निर्देश बनाए जा सकें
धारा 1 और औपनिवेशिक विरासत से मुक्ति
CrPC का इतिहास 1898 से जुड़ा है, जब अंग्रेजी शासन को भारत में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कठोर प्रक्रियाओं की आवश्यकता थी। BNSS की धारा 1 उस मानसिकता से औपचारिक और वैचारिक विच्छेद का प्रतीक है।
यह धारा यह संदेश देती है कि:
- भारत अब अपनी आपराधिक प्रक्रिया स्वयं परिभाषित करेगा,
- कानून नागरिकों के लिए होगा, न कि नागरिक कानून के लिए।
धारा 1 और ‘प्रक्रियात्मक न्याय’ की अवधारणा
धारा 1 केवल नाम और क्षेत्र नहीं बताती, बल्कि यह पूरे अधिनियम की दिशा (Orientation) तय करती है। BNSS के अंतर्गत—
- डिजिटल एफआईआर
- ई-समन
- वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग द्वारा बयान
- समयबद्ध जांच
जैसे प्रावधान जोड़े गए हैं। इन सभी सुधारों की वैचारिक नींव धारा 1 में निहित “नागरिक सुरक्षा” के विचार में है।
CrPC की धारा 1 बनाम BNSS की धारा 1: एक तुलनात्मक दृष्टि
| बिंदु | CrPC, 1973 | BNSS, 2023 |
|---|---|---|
| नाम | दंड प्रक्रिया | नागरिक सुरक्षा |
| दर्शन | राज्य-केंद्रित | नागरिक-केंद्रित |
| क्षेत्र | सीमित (पूर्व में) | सम्पूर्ण भारत |
| तकनीक | न्यूनतम | डिजिटल और आधुनिक |
यह तुलना स्पष्ट करती है कि BNSS की धारा 1 केवल सुधार नहीं, बल्कि परिवर्तन (Transformation) है।
क्रियान्वयन की व्यावहारिक चुनौतियाँ
धारा 1 के प्रभावी होने के साथ कुछ व्यावहारिक समस्याएँ भी सामने आई हैं—
- प्रशिक्षण की आवश्यकता: जमीनी स्तर के पुलिसकर्मी और न्यायिक अधिकारी
- तकनीकी असमानता: ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में डिजिटल ढांचे की कमी
- संक्रमण काल: CrPC के अंतर्गत लंबित मामलों का समुचित निपटान
हालाँकि, ये चुनौतियाँ किसी भी बड़े विधायी परिवर्तन का स्वाभाविक हिस्सा होती हैं।
निष्कर्ष
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 1 एक साधारण प्रारंभिक प्रावधान नहीं, बल्कि भारत की आपराधिक न्याय व्यवस्था के नए दर्शन की उद्घोषणा है। यह धारा स्पष्ट करती है कि न्याय अब केवल दंड का माध्यम नहीं, बल्कि सुरक्षा, गरिमा और अधिकारों की प्रक्रिया है।
सम्पूर्ण भारत में इसका विस्तार राष्ट्रीय एकता को मजबूत करता है, जबकि जनजातीय क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान संवैधानिक संवेदनशीलता को दर्शाते हैं।
अंततः कहा जा सकता है कि—
BNSS की धारा 1 ने भारतीय आपराधिक प्रक्रिया को औपनिवेशिक अतीत से निकालकर नागरिक-केंद्रित भविष्य की ओर अग्रसर कर दिया है।