भारतीय कराधान व्यवस्था : विकास, सुधार और भविष्य की दिशा
प्रस्तावना
किसी भी आधुनिक राष्ट्र की आर्थिक शक्ति उसके कराधान (Taxation) पर आधारित होती है। कर न केवल सरकार के लिए राजस्व जुटाने का साधन है, बल्कि यह आर्थिक समानता, सामाजिक न्याय और विकास का उपकरण भी है। भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक और विकासशील देश में कराधान व्यवस्था विशेष महत्व रखती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से अब तक भारत में कराधान कानून में अनेक सुधार हुए हैं, जिन्होंने इसे अधिक पारदर्शी और आधुनिक बनाने का प्रयास किया है।
भारत में कराधान का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
भारत में कर वसूलने की परंपरा बहुत प्राचीन है।
- मनुस्मृति और अर्थशास्त्र (कौटिल्य) में कर व्यवस्था का उल्लेख मिलता है।
- मुगल काल में जजिया कर और भूमि कर प्रमुख थे।
- ब्रिटिश शासनकाल में आधुनिक कराधान कानून की नींव पड़ी। 1860 में भारत में पहला आयकर अधिनियम लाया गया।
- स्वतंत्रता के बाद 1961 में आयकर अधिनियम लागू किया गया, जो आज भी प्रत्यक्ष कर व्यवस्था का आधार है।
कराधान का संवैधानिक ढाँचा
भारतीय संविधान ने कराधान शक्तियों को केंद्र और राज्यों में विभाजित किया है।
- संघ सूची (Union List) – आयकर (कृषि को छोड़कर), सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क, कॉर्पोरेट टैक्स आदि।
- राज्य सूची (State List) – भूमि राजस्व, कृषि कर, बिजली शुल्क आदि।
- समवर्ती सूची – सीमित अधिकार।
अनुच्छेद 265 कहता है कि विधि के प्राधिकार के बिना कोई कर न लगाया जाएगा, न वसूला जाएगा।
अनुच्छेद 279A के तहत जी.एस.टी. परिषद का गठन हुआ।
भारतीय कराधान व्यवस्था के प्रमुख घटक
- प्रत्यक्ष कर (Direct Tax) – आयकर, कॉर्पोरेट टैक्स, पूँजीगत लाभ कर।
- अप्रत्यक्ष कर (Indirect Tax) – जी.एस.टी., सीमा शुल्क, सेवा कर (अब समाप्त)।
- अन्य कर व शुल्क – स्टाम्प शुल्क, उपकर, सेस आदि।
स्वतंत्र भारत में कर सुधार
भारत ने समय-समय पर कर सुधार की दिशा में अनेक कदम उठाए।
1. प्रत्यक्ष कर सुधार
- 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद कर दरों में कमी की गई।
- छूट और रियायतें दी गईं ताकि निवेश को प्रोत्साहन मिले।
- PAN प्रणाली लागू कर पारदर्शिता बढ़ाई गई।
2. अप्रत्यक्ष कर सुधार
- पहले राज्य और केंद्र के अलग-अलग कर थे (वैट, सेवा कर, उत्पाद शुल्क, ऑक्ट्रॉय आदि)।
- 2017 में जी.एस.टी. (GST) लागू हुआ, जिसने “एक राष्ट्र – एक कर” की अवधारणा को जन्म दिया।
जी.एस.टी. : भारत का ऐतिहासिक सुधार
जी.एस.टी. भारत की कर व्यवस्था में सबसे बड़ा सुधार माना जाता है।
- 1 जुलाई 2017 से लागू।
- केंद्र और राज्य दोनों को समान रूप से अधिकार।
- CGST + SGST + IGST ढाँचा।
- टैक्स चोरी पर रोक, व्यापार में पारदर्शिता।
हालाँकि, दरों की जटिलता, छोटे व्यवसायियों की परेशानियाँ और रिफंड की समस्या आज भी चुनौतियाँ बनी हुई हैं।
कराधान और सामाजिक न्याय
कर केवल राजस्व का साधन नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय का भी उपकरण है।
- अमीरों पर अधिक कर लगाकर गरीबी कम करना।
- शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचे पर कर से प्राप्त धन खर्च करना।
- “प्रोग्रेसिव टैक्सेशन” नीति आर्थिक असमानता घटाने में सहायक।
उदाहरण: धारा 80C, 80D के अंतर्गत आम नागरिक को छूट, ताकि वे निवेश और बीमा को बढ़ावा दें।
कर चोरी और कर बचाव
भारत की कराधान व्यवस्था में सबसे बड़ी समस्या कर चोरी (Tax Evasion) रही है।
- नकली बिल, हवाला लेन-देन, कैश ट्रांजैक्शन।
- विदेशों में काला धन जमा करना।
McDowell & Co. केस (1985) में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कर चोरी अवैध है, जबकि कर नियोजन (Tax Planning) वैध है।
कराधान और वैश्वीकरण
वैश्वीकरण के दौर में कराधान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चुनौती बन गया है।
- बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (MNCs) लाभ को टैक्स हेवन देशों में शिफ्ट करती हैं।
- Vodafone केस (2012) में भारत ने अंतरराष्ट्रीय कर विवाद का अनुभव किया।
- OECD के BEPS प्रोजेक्ट (Base Erosion and Profit Shifting) के अंतर्गत भारत सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
- डिजिटल सेवाओं पर कर लगाने हेतु Equalisation Levy लागू की गई।
कराधान और आर्थिक विकास
कराधान सीधे-सीधे आर्थिक विकास से जुड़ा है।
- कर से प्राप्त धन से सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और उद्योगों में निवेश करती है।
- निवेशकों को आकर्षित करने के लिए कर रियायतें।
- “स्टार्टअप इंडिया” जैसी योजनाओं में टैक्स हॉलिडे और विशेष छूट।
- पर्यावरण संरक्षण हेतु “ग्रीन टैक्स” और “कार्बन टैक्स” जैसी पहल।
न्यायपालिका की भूमिका
भारतीय न्यायपालिका ने कर कानूनों की व्याख्या कर कई बार महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दिया है।
- Kesoram Industries केस (1964) – Tax और Fee में अंतर।
- McDowell केस (1985) – Tax Avoidance और Tax Evasion का फर्क।
- Vodafone केस (2012) – अप्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर कर।
भारतीय कराधान की चुनौतियाँ
- जटिलता – आम नागरिक के लिए कानून समझना कठिन।
- कर चोरी – ईमानदार करदाता पर अधिक बोझ।
- अनुपालन की लागत – छोटे व्यवसायियों को दिक्कत।
- अंतरराष्ट्रीय कर विवाद – बहुराष्ट्रीय कंपनियों से जुड़ी समस्याएँ।
- न्यायसंगतता – अभी भी अमीर-गरीब पर कर भार में असमानता।
भविष्य की दिशा
भारत को अपनी कराधान व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी, सरल और न्यायसंगत बनाना होगा।
- डिजिटल कराधान – ऑनलाइन रिटर्न, ई-इनवॉइसिंग।
- समान दरें – जी.एस.टी. में दरों को सरल बनाना।
- करदाताओं की सुविधा – आसान भाषा में कानून, हेल्पलाइन और जागरूकता।
- वैश्विक सहयोग – OECD और G20 स्तर पर समन्वय।
- काला धन नियंत्रण – सख्त नियम और अंतरराष्ट्रीय समझौते।
निष्कर्ष
भारतीय कराधान व्यवस्था ने प्राचीन काल से अब तक लंबा सफर तय किया है। स्वतंत्रता के बाद आयकर अधिनियम 1961 और हाल के वर्षों में जी.एस.टी. इसके बड़े मील के पत्थर हैं। कर केवल राजस्व का साधन नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास का मार्ग भी है।
फिर भी, कर चोरी, जटिलता और अंतरराष्ट्रीय विवाद जैसी चुनौतियाँ आज भी मौजूद हैं। भविष्य में भारत को “साधारण, पारदर्शी और न्यायसंगत कराधान व्यवस्था” की दिशा में आगे बढ़ना होगा ताकि यह विकासशील से विकसित राष्ट्र की यात्रा को मजबूती प्रदान कर सके।
प्रश्न 1. कराधान कानून की परिभाषा और उद्देश्य क्या हैं?
उत्तर: कराधान कानून उन विधिक प्रावधानों का समूह है, जिनके अंतर्गत सरकार नागरिकों और संस्थाओं से कर वसूल करती है। इसका उद्देश्य केवल राजस्व जुटाना नहीं है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक समानता स्थापित करना भी है। कर से प्राप्त राशि का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, अधोसंरचना और सुरक्षा पर किया जाता है। साथ ही, कराधान व्यवस्था के माध्यम से सरकार आय और संपत्ति का पुनर्वितरण करती है, जिससे अमीर-गरीब के बीच अंतर कम किया जा सके।
प्रश्न 2. प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष कर में क्या अंतर है?
उत्तर: प्रत्यक्ष कर सीधे करदाता की आय, संपत्ति या लाभ पर लगाया जाता है जैसे—आयकर, कॉर्पोरेट टैक्स। इसमें कर का बोझ वही व्यक्ति वहन करता है जिस पर कर लगाया गया है। अप्रत्यक्ष कर वस्तुओं और सेवाओं की खपत पर लगाया जाता है जैसे—GST, सीमा शुल्क। इसमें कर का बोझ अंतिम उपभोक्ता पर पड़ता है, जबकि व्यापारी इसे सरकार को जमा करता है।
प्रश्न 3. संविधान में कराधान शक्तियों का विभाजन कैसे किया गया है?
उत्तर: भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत कराधान शक्तियों का विभाजन केंद्र और राज्यों के बीच किया गया है।
- केंद्रीय सूची – आयकर, सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क आदि।
- राज्य सूची – भूमि कर, राज्य उत्पाद शुल्क, स्टाम्प ड्यूटी आदि।
- समवर्ती सूची – सीमित कर शक्तियाँ।
यह विभाजन संघीय ढांचे के अनुरूप है और विवाद की स्थिति में संसद का कानून प्रधान होता है।
प्रश्न 4. आयकर अधिनियम, 1961 की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर: आयकर अधिनियम, 1961 भारत में प्रत्यक्ष कर से संबंधित मुख्य कानून है। इसके अंतर्गत व्यक्तियों, कंपनियों, साझेदारी फर्मों और अन्य संस्थाओं की आय पर कर लगाया जाता है। इसमें आय के पाँच मुख्य स्रोत बताए गए हैं—वेतन, गृह संपत्ति, व्यवसाय या पेशा, पूँजीगत लाभ और अन्य स्रोत। यह अधिनियम कर दरें, छूट, रियायतें और कर प्रशासन की प्रक्रिया निर्धारित करता है।
प्रश्न 5. वस्तु एवं सेवा कर (GST) की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर: GST 1 जुलाई 2017 से लागू हुआ। इसकी मुख्य विशेषताएँ हैं—
- एक राष्ट्र, एक कर की अवधारणा।
- केंद्र और राज्य दोनों द्वारा साझा रूप से वसूला जाना।
- अप्रत्यक्ष करों (जैसे वैट, एक्साइज, सर्विस टैक्स) को समाहित करना।
- पारदर्शिता और कर चोरी में कमी।
- व्यापार के लिए सरल और डिजिटलीकृत प्रक्रिया।
यह उपभोग आधारित कर है, जिसका अंतिम बोझ उपभोक्ता पर पड़ता है।
प्रश्न 6. कर चोरी और कर अपवंचन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
- कर चोरी (Tax Evasion): अवैध तरीके से कर से बचना, जैसे आय छुपाना, नकली बिल बनाना। यह दंडनीय अपराध है।
- कर अपवंचन (Tax Avoidance): कानूनी प्रावधानों का उपयोग करके कर दायित्व को कम करना, जैसे टैक्स प्लानिंग। यह अवैध नहीं है लेकिन नैतिक दृष्टि से आलोचनीय है।
दोनों ही कराधान प्रणाली की निष्पक्षता को प्रभावित करते हैं।
प्रश्न 7. कराधान प्रशासन में CBDT और CBIC की भूमिका क्या है?
उत्तर:
- CBDT (Central Board of Direct Taxes): प्रत्यक्ष करों का प्रशासन करता है। यह आयकर अधिनियम के क्रियान्वयन, नीतिगत सुझाव और कर संग्रह की निगरानी करता है।
- CBIC (Central Board of Indirect Taxes and Customs): अप्रत्यक्ष करों और सीमा शुल्क का प्रशासन करता है। यह GST और कस्टम्स से जुड़े प्रावधानों की देखरेख करता है।
दोनों बोर्ड वित्त मंत्रालय के अधीन कार्य करते हैं और कर प्रणाली को प्रभावी व पारदर्शी बनाने में सहायक हैं।
प्रश्न 8. कराधान और सामाजिक न्याय के बीच संबंध स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: कराधान केवल राजस्व जुटाने का साधन नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय प्राप्त करने का उपकरण भी है। प्रगतिशील कर प्रणाली (जिसमें आय बढ़ने पर कर दरें बढ़ती हैं) अमीरों से अधिक कर वसूल कर गरीबों के हित में खर्च करती है। अप्रत्यक्ष करों से भी विकास योजनाओं को वित्त पोषण मिलता है। इस प्रकार कराधान से आय असमानता कम होती है और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा मजबूत होती है।
प्रश्न 9. हाल के वर्षों में कर सुधारों के प्रमुख कदम कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
- GST का लागू होना – अप्रत्यक्ष करों का एकीकरण।
- फेसलेस असेसमेंट – पारदर्शिता और करदाताओं की सुविधा।
- डिजिटल टैक्सेशन – ऑनलाइन सेवाओं और ई-कॉमर्स पर कर।
- त्वरित रिफंड प्रणाली – करदाताओं को राहत।
- कर आधार बढ़ाने के प्रयास – अधिक नागरिकों को कर के दायरे में लाना।
इन सुधारों ने कर प्रणाली को आधुनिक और पारदर्शी बनाया है।
प्रश्न 10. कराधान कानून की प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
उत्तर: भारत की कराधान व्यवस्था में कुछ गंभीर चुनौतियाँ हैं—
- कर चोरी और भ्रष्टाचार – राजस्व हानि और प्रणाली पर अविश्वास।
- जटिल प्रक्रियाएँ – छोटे व्यवसायियों और मध्यम वर्ग को कठिनाई।
- कर आधार का सीमित होना – केवल कुछ प्रतिशत लोग ही आयकर भरते हैं।
- अंतरराष्ट्रीय कर विवाद – बहुराष्ट्रीय कंपनियों का टैक्स नियोजन।
इन चुनौतियों के समाधान हेतु पारदर्शिता, डिजिटलीकरण और कड़े कानूनी प्रावधान आवश्यक हैं।