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ब्रिटानिया के ‘लिटिल हार्ट्स’ की कानूनी जीत — दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा ट्रेडमार्क फैसला, ‘ट्रिपल आइडेंटिटी’ में प्रतिद्वंद्वी पर सख्त रोक

ब्रिटानिया के ‘लिटिल हार्ट्स’ की कानूनी जीत — दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा ट्रेडमार्क फैसला, ‘ट्रिपल आइडेंटिटी’ में प्रतिद्वंद्वी पर सख्त रोक

      भारतीय बौद्धिक संपदा कानून (Intellectual Property Law) के क्षेत्र में दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला निर्णय देते हुए ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड के लोकप्रिय बिस्कुट ब्रांड ‘Little Hearts’ को मज़बूत कानूनी सुरक्षा प्रदान की है। अदालत ने एक प्रतिद्वंद्वी कंपनी को समान नाम, पैकेजिंग और डिज़ाइन के साथ बिस्कुट बेचने से रोकते हुए इसे “ट्रिपल आइडेंटिटी” (Triple Identity) का स्पष्ट मामला बताया।

        यह फैसला न केवल ब्रांड संरक्षण के दृष्टिकोण से अहम है, बल्कि यह उपभोक्ता भ्रम, अनुचित प्रतिस्पर्धा और ट्रेडमार्क उल्लंघन के विरुद्ध भारतीय न्यायपालिका के सख्त रुख को भी दर्शाता है।


मामले की पृष्ठभूमि: ‘लिटिल हार्ट्स’ बनाम नकल ब्रांड

        ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड, जो भारत की अग्रणी एफएमसीजी कंपनियों में से एक है, दशकों से ‘Little Hearts’ नाम से दिल के आकार वाले बिस्कुट का निर्माण और विपणन करती आ रही है। यह उत्पाद न केवल बच्चों बल्कि वयस्कों के बीच भी अत्यंत लोकप्रिय है और इसका नाम, आकार, स्वाद तथा पैकेजिंग भारतीय उपभोक्ताओं के मन में गहराई से अंकित है।

ब्रिटानिया ने अदालत के समक्ष यह शिकायत रखी कि एक अन्य कंपनी द्वारा—

  • ‘Little Hearts’ या उससे मिलते-जुलते नाम
  • दिल के आकार के समान बिस्कुट
  • लगभग समान रंग, पैकेजिंग और लेआउट

का उपयोग कर बाजार में उत्पाद बेचा जा रहा है, जिससे उपभोक्ताओं में भ्रम पैदा हो रहा है और ब्रिटानिया के स्थापित ब्रांड मूल्य को नुकसान पहुँच रहा है।


दिल्ली हाईकोर्ट का हस्तक्षेप

        दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले की प्रारंभिक सुनवाई के दौरान ही यह स्पष्ट कर दिया कि प्रथम दृष्टया (prima facie) यह मामला साधारण समानता का नहीं, बल्कि ट्रेडमार्क उल्लंघन और पासिंग ऑफ (Passing Off) का गंभीर उदाहरण है।

अदालत ने प्रतिद्वंद्वी कंपनी को निर्देश दिया कि वह—

  • विवादित नाम का उपयोग तत्काल बंद करे
  • समान पैकेजिंग और डिज़ाइन वाले उत्पादों की बिक्री रोके
  • उपभोक्ताओं को भ्रमित करने वाले किसी भी प्रचार से बचे

‘ट्रिपल आइडेंटिटी’ सिद्धांत क्या है?

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में इस मामले को “ट्रिपल आइडेंटिटी” का स्पष्ट उदाहरण बताया। ट्रेडमार्क कानून में यह सिद्धांत तब लागू होता है, जब—

  1. मार्क की समानता (Identity of Mark)
  2. उत्पाद की समानता (Identity of Goods)
  3. उपभोक्ता वर्ग की समानता (Identity of Consumers)

— तीनों तत्व एक साथ मौजूद हों।

अदालत ने कहा कि इस मामले में—

  • मार्क: ‘Little Hearts’ और उससे मिलते-जुलते नाम
  • उत्पाद: दिल के आकार के बिस्कुट
  • उपभोक्ता: सामान्य उपभोक्ता, विशेष रूप से बच्चे और परिवार

— पूरी तरह समान हैं। ऐसे में उपभोक्ता भ्रम की संभावना नहीं, बल्कि लगभग निश्चित है।


ट्रेडमार्क उल्लंघन और पासिंग ऑफ

अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल ट्रेडमार्क उल्लंघन (Trademark Infringement) तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पासिंग ऑफ का भी उदाहरण है।

पासिंग ऑफ का अर्थ

पासिंग ऑफ तब होता है जब—

  • कोई व्यापारी
  • अपने उत्पाद को
  • किसी अन्य प्रतिष्ठित ब्रांड के उत्पाद के रूप में प्रस्तुत करे

जिससे उपभोक्ता धोखे में आ जाए।

ब्रिटानिया के मामले में अदालत ने माना कि प्रतिद्वंद्वी कंपनी जानबूझकर ऐसे तत्व अपना रही थी, जो ब्रिटानिया की ब्रांड पहचान से मेल खाते थे, ताकि उसकी प्रतिष्ठा का अनुचित लाभ उठाया जा सके।


ब्रांड की प्रतिष्ठा और ‘गुडविल’ का संरक्षण

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि ‘Little Hearts’ केवल एक बिस्कुट नहीं, बल्कि एक स्थापित ब्रांड है, जिसकी अपनी विशिष्ट पहचान (distinctiveness) और गुडविल है।

अदालत ने माना कि—

  • वर्षों की मेहनत
  • निरंतर गुणवत्ता
  • व्यापक प्रचार

के कारण ‘Little Hearts’ ने बाज़ार में एक विशेष स्थान बनाया है, जिसे नकल के ज़रिए कमजोर नहीं किया जा सकता।


उपभोक्ता भ्रम: न्यायालय की मुख्य चिंता

अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि—

“ट्रेडमार्क कानून का उद्देश्य केवल ब्रांड मालिक के अधिकारों की रक्षा करना नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं को भ्रम और धोखे से बचाना भी है।”

यदि कोई आम उपभोक्ता, विशेषकर बच्चा या अभिभावक, समान पैकेजिंग देखकर यह न समझ पाए कि वह किस कंपनी का उत्पाद खरीद रहा है, तो यह कानून और बाज़ार दोनों के लिए हानिकारक है।


एफएमसीजी सेक्टर के लिए अहम संदेश

यह फैसला एफएमसीजी (Fast Moving Consumer Goods) उद्योग के लिए एक मजबूत चेतावनी है कि—

  • लोकप्रिय ब्रांड्स की नकल
  • नाम और डिज़ाइन में मामूली बदलाव
  • या “जैसा दिखता है वैसा ही” रणनीति

अब न्यायालयों द्वारा बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

अदालत ने संकेत दिया कि ब्रांड पहचान की चोरी को ‘व्यापारिक चतुराई’ नहीं, बल्कि ‘कानूनी अपराध’ के रूप में देखा जाएगा।


ट्रेडमार्क अधिनियम, 1999 के तहत संरक्षण

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में ट्रेडमार्क अधिनियम, 1999 के प्रावधानों का संदर्भ लेते हुए कहा कि—

  • पंजीकृत ट्रेडमार्क को विशेष कानूनी संरक्षण प्राप्त है
  • किसी समान या भ्रामक रूप से मिलते-जुलते मार्क का उपयोग अवैध है
  • अदालत अंतरिम स्तर पर भी रोक लगाने के लिए सक्षम है

ब्रिटानिया का ट्रेडमार्क विधिवत पंजीकृत और लंबे समय से उपयोग में होने के कारण, उसका दावा और अधिक मजबूत हो गया।


अंतरिम आदेश का महत्व

अदालत द्वारा दिया गया यह आदेश अंतरिम निषेधाज्ञा (Interim Injunction) है, जिसका उद्देश्य अंतिम निर्णय तक—

  • ब्रांड को होने वाले नुकसान को रोकना
  • बाज़ार में भ्रम को समाप्त करना
  • और यथास्थिति बनाए रखना

है।

न्यायालय ने माना कि यदि ऐसी रोक न लगाई जाए, तो ब्रिटानिया को अपूरणीय क्षति (Irreparable Injury) हो सकती है, जिसकी भरपाई केवल हर्जाने से संभव नहीं होगी।


भारतीय आईपी कानून में बढ़ती सख्ती

यह निर्णय इस बात का प्रमाण है कि भारतीय न्यायपालिका अब—

  • बौद्धिक संपदा अधिकारों को गंभीरता से ले रही है
  • अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप फैसले दे रही है
  • और ब्रांड सुरक्षा को व्यापारिक विकास का अभिन्न हिस्सा मान रही है

विशेष रूप से दिल्ली हाईकोर्ट, जो आईपी मामलों का प्रमुख केंद्र बन चुका है, लगातार ऐसे निर्णय दे रहा है।


प्रतिस्पर्धा बनाम नकल: अदालत की रेखा

अदालत ने यह स्पष्ट किया कि—

  • स्वस्थ प्रतिस्पर्धा कानून द्वारा प्रोत्साहित है
  • लेकिन नकल और भ्रम पैदा करना प्रतिस्पर्धा नहीं है

यदि कोई कंपनी गुणवत्ता, मूल्य या नवाचार के आधार पर प्रतिस्पर्धा करे, तो वह वैध है। किंतु यदि वह किसी स्थापित ब्रांड की पहचान पर सवारी करे, तो यह अवैध है।


निष्कर्ष: ब्रांड की जीत, कानून की पुष्टि

      दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला ब्रिटानिया के ‘Little Hearts’ के लिए एक बड़ी कानूनी जीत है, लेकिन इससे भी अधिक यह—

  • ट्रेडमार्क कानून की मजबूती
  • उपभोक्ता संरक्षण
  • और निष्पक्ष व्यापार

की जीत है।

        यह निर्णय स्पष्ट करता है कि भारत में अब ब्रांड पहचान की चोरी के लिए कोई जगह नहीं है। जो कंपनियाँ लोकप्रिय ब्रांड्स की साख पर अपनी दुकान चलाने की कोशिश करेंगी, उन्हें कानून के सख्त हाथों का सामना करना पड़ेगा।