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बिजली बोर्ड की मनमानी पर कानूनी चाबुक — बिना निरीक्षण ₹4.55 करोड़ का बिल अवैध

बिजली बोर्ड की मनमानी पर कानूनी चाबुक — बिना निरीक्षण ₹4.55 करोड़ का बिल अवैध

प्रस्तावना: जब “संदेह” को बना दिया जाता है “सबूत”

       भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में अक्सर एक गंभीर समस्या देखने को मिलती है— विभागीय अधिकारियों द्वारा प्रक्रिया को बोझ समझना। बिजली विभाग (Electricity Distribution Companies) द्वारा जारी किए जाने वाले भारी-भरकम “डिमांड नोटिस” इसी प्रवृत्ति का उदाहरण हैं। उपभोक्ता को करोड़ों रुपये का बिल थमा दिया जाता है, और बाद में उससे कहा जाता है कि वह अपनी बेगुनाही साबित करे।

परंतु कानून का सिद्धांत इससे बिल्कुल उलट है—
“जो आरोप लगाता है, प्रमाण देने की जिम्मेदारी उसी की होती है।”

       हाल के एक महत्वपूर्ण न्यायिक फैसले में उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि बिना भौतिक निरीक्षण (Physical Inspection) के धारा 126 के तहत किया गया आकलन न केवल अवैध है, बल्कि विभाग के अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) से बाहर है। ₹4.55 करोड़ का बिल इसी आधार पर निरस्त कर दिया गया। यह निर्णय केवल एक उपभोक्ता की जीत नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा उदाहरण है।


1. मामला क्या था?

        बिजली वितरण कंपनी ने एक औद्योगिक परिसर के खिलाफ यह आरोप लगाया कि वहां “अनधिकृत रूप से बिजली का उपयोग” (Unauthorized Use of Electricity) किया गया है। बिना स्थल निरीक्षण किए, पुराने लोड डेटा, मीटर रिकॉर्ड और आंतरिक गणनाओं के आधार पर कंपनी ने ₹4.55 करोड़ का आकलन बिल जारी कर दिया।

उपभोक्ता का मुख्य तर्क था:

  • कोई अधिकारी स्थल पर निरीक्षण करने नहीं आया
  • कोई पंचनामा (Inspection Memo) तैयार नहीं हुआ
  • कोई फोटो, सील तोड़ने का प्रमाण, या भौतिक साक्ष्य नहीं
  • सीधे भारी डिमांड नोटिस जारी

यानी पूरा मामला “ऑफिस टेबल पर की गई गणना” पर आधारित था, न कि वास्तविक जांच पर।


2. विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 126 — असली कानूनी ढांचा

धारा 126 का उद्देश्य है अनधिकृत उपयोग का निष्पक्ष निर्धारण, न कि राजस्व बढ़ाने का हथियार।

धारा 126 की मुख्य बातें:

  1. निरीक्षण अनिवार्य है
    “Assessing Officer” को स्वयं या अधिकृत टीम के साथ स्थल का निरीक्षण करना होता है।
  2. भौतिक साक्ष्य जुटाना जरूरी है
    • मीटर की स्थिति
    • तारों की कनेक्टिविटी
    • लोड की प्रकृति
    • सील टूटी या नहीं
    • बाईपासिंग के संकेत
  3. प्रोविजनल आकलन (Provisional Assessment)
    पहले अस्थायी आकलन किया जाता है।
  4. सुनवाई का अवसर (Opportunity of Hearing)
    उपभोक्ता को नोटिस देकर आपत्ति दर्ज करने का मौका देना अनिवार्य है।
  5. अंतिम आदेश (Final Assessment)
    आपत्तियाँ सुनने के बाद ही अंतिम बिल जारी किया जा सकता है।

यदि इन चरणों में से एक भी चरण छोड़ा गया — तो पूरी प्रक्रिया अवैध हो सकती है।


3. निरीक्षण क्यों इतना महत्वपूर्ण है?

कानून “संदेह” पर नहीं, “साक्ष्य” पर चलता है।

भौतिक निरीक्षण इसलिए आवश्यक है क्योंकि:

  • लोड में बदलाव अस्थायी भी हो सकता है
  • मशीनें बंद हो सकती हैं
  • मीटर में तकनीकी गड़बड़ी हो सकती है
  • रिकॉर्ड और वास्तविकता में अंतर हो सकता है

बिना निरीक्षण के आकलन करना वैसा ही है जैसे बिना मौके पर गए दुर्घटना का पंचनामा बना देना।


4. न्यायालय का दृष्टिकोण: अधिकार बनाम प्रक्रिया

उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा:

“धारा 126 की शक्ति केवल तभी प्रयोग की जा सकती है जब अधिकारी ने विधिवत निरीक्षण किया हो। अन्यथा उसके पास आकलन करने का कोई अधिकार ही नहीं बचता।”

यहाँ अदालत ने एक महत्वपूर्ण सिद्धांत लागू किया —

“Procedure is the soul of power”

(प्रक्रिया ही शक्ति की आत्मा है)

यदि प्रक्रिया नहीं, तो शक्ति भी नहीं।


5. प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) का उल्लंघन

न्यायालय ने माना कि:

  • उपभोक्ता को पहले दोषी मान लिया गया
  • बिना साक्ष्य भारी आर्थिक दंड लगाया गया
  • सुनवाई का वास्तविक अवसर नहीं दिया गया

यह “Audi Alteram Partem” सिद्धांत का उल्लंघन है —
“दूसरी पक्ष को सुने बिना निर्णय नहीं।”


6. विभाग की सामान्य दलीलें — और उनकी कानूनी कमजोरी

विभाग की दलील अदालत का दृष्टिकोण
“डेटा से स्पष्ट है” डेटा निरीक्षण का विकल्प नहीं
“तकनीकी रिपोर्ट है” तकनीकी रिपोर्ट भी स्थल जांच पर आधारित होनी चाहिए
“मीटर रीडिंग ज्यादा थी” अधिक खपत = अनधिकृत उपयोग, यह स्वतः सिद्ध नहीं

7. Jurisdictional Error क्या होता है?

यदि अधिकारी वह कदम उठाए जो कानून ने अनुमति ही नहीं दी, तो उसे Jurisdictional Error कहा जाता है।

यहां निरीक्षण के बिना आकलन करना वैसा ही है जैसे:

  • बिना FIR जांच पूरी करना
  • बिना मेडिकल रिपोर्ट पोस्टमार्टम निष्कर्ष देना

इसलिए अदालत ने कहा — यह अधिकार क्षेत्र से बाहर की कार्रवाई है।


8. उपभोक्ताओं के लिए व्यावहारिक कानूनी उपाय

स्थिति 1: निरीक्षण के समय

✔ निरीक्षण रिपोर्ट की प्रति मांगें
✔ फोटो / वीडियो का रिकॉर्ड रखें
✔ मीटर सील की स्थिति नोट करें

स्थिति 2: भारी बिल मिले

✔ धारा 126 के तहत आपत्ति दाखिल करें
✔ निरीक्षण रिपोर्ट की कॉपी मांगें
✔ सुनवाई का लिखित अनुरोध करें

स्थिति 3: प्रक्रिया नहीं अपनाई गई

✔ उच्च न्यायालय में रिट याचिका
✔ आदेश निरस्त (Quashing) की मांग
✔ Natural Justice के आधार पर चुनौती


9. इस फैसले का व्यापक प्रभाव

यह फैसला केवल एक उपभोक्ता तक सीमित नहीं। इसके प्रभाव:

  • विभागीय मनमानी पर रोक
  • “Revenue Target” आधारित आकलन पर प्रश्न
  • निरीक्षण प्रक्रिया को मजबूत करना
  • उपभोक्ताओं का कानूनी सशक्तिकरण

10. प्रशासनिक कानून का बड़ा सिद्धांत लागू

यह मामला बिजली कानून से आगे बढ़कर प्रशासनिक कानून का मूल सिद्धांत दोहराता है:

“राज्य भी कानून के अधीन है, उससे ऊपर नहीं।”


11. निष्कर्ष: कागजों पर बना बिल अदालत में नहीं टिकता

₹4.55 करोड़ का यह बिल एक उदाहरण है कि:

  • कानून प्रक्रिया मांगता है
  • शक्ति का प्रयोग सीमित है
  • संदेह पर्याप्त नहीं
  • निरीक्षण आवश्यक है

जब प्रक्रिया का पालन नहीं, तो पूरा केस ढह सकता है।


अंतिम सलाह

यदि आपके साथ ऐसा हो:

  1. निरीक्षण रिपोर्ट मांगें
  2. पंचनामा की कॉपी मांगें
  3. सुनवाई का अधिकार प्रयोग करें
  4. जरूरत पड़े तो हाईकोर्ट जाएँ

क्योंकि कानून कहता है —
“सरकार भी नियमों से बंधी है।”