पति-पत्नी के बीच ‘अप्राकृतिक’ यौन संबंध अपराध नहीं? — ग्वालियर हाईकोर्ट के फैसले ने छेड़ी नई कानूनी और सामाजिक बहस
भारतीय समाज में विवाह को केवल एक सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि एक पवित्र बंधन माना जाता है। परंतु जब इसी विवाह के भीतर आपराधिक कानून की सीमाएँ तय करने का प्रश्न उठता है, तो मामला केवल निजी रिश्तों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कानून, नैतिकता और अधिकारों की व्यापक बहस को जन्म देता है। ग्वालियर हाईकोर्ट का हालिया निर्णय इसी तरह की एक गहरी और संवेदनशील बहस का केंद्र बन गया है।
इस फैसले में हाईकोर्ट ने यह कहा कि यदि पति-पत्नी के बीच वैवाहिक संबंध कायम हैं और पत्नी बालिग है, तो पति द्वारा किए गए कथित ‘अप्राकृतिक’ यौन संबंध को भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के अंतर्गत अपराध नहीं माना जा सकता। साथ ही, बलात्कार से संबंधित धारा 376 भी ऐसे वैवाहिक संबंधों में लागू नहीं होगी, क्योंकि धारा 375 के अपवाद के तहत पति-पत्नी के बीच सहवास को बलात्कार नहीं माना गया है।
यह निर्णय न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक और नैतिक स्तर पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
मामला किस पृष्ठभूमि से जुड़ा है
यह मामला मध्य प्रदेश के मुरैना जिले से जुड़ा है, जहाँ पत्नी ने अपने पति के विरुद्ध कोतवाली थाने में गंभीर आरोप लगाए थे। शिकायत में दहेज उत्पीड़न, मारपीट, मानसिक प्रताड़ना, बलात्कार और अप्राकृतिक कृत्य जैसे आरोप शामिल थे। पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर जांच की, चार्जशीट दाखिल की और न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने संज्ञान भी ले लिया।
इसके बाद पति ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत ग्वालियर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका में यह तर्क दिया गया कि यह पूरा मामला वैवाहिक विवाद का परिणाम है और तलाक की कार्यवाही के बाद दबाव बनाने के उद्देश्य से आपराधिक मुकदमा दर्ज कराया गया है।
हाईकोर्ट का कानूनी दृष्टिकोण
ग्वालियर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने मामले पर विचार करते हुए भारतीय दंड संहिता की धाराओं की गहन व्याख्या की। अदालत ने कहा कि:
- धारा 375 के अपवाद के अनुसार, यदि पत्नी बालिग है, तो पति द्वारा किया गया सहवास बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता।
- इसी कारण, धारा 376 के तहत पति पर अभियोजन नहीं चलाया जा सकता।
- जहां तक धारा 377 (अप्राकृतिक कृत्य) का प्रश्न है, वह भी वैवाहिक संबंधों के भीतर लागू नहीं होती, क्योंकि वैवाहिक सहवास को कानून विशेष संरक्षण प्रदान करता है।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह संरक्षण असीमित नहीं है। यदि पति द्वारा पत्नी के साथ क्रूरता, मारपीट, अश्लीलता या मानसिक प्रताड़ना की जाती है, तो ऐसे कृत्य अन्य धाराओं के अंतर्गत अपराध बने रहेंगे और उन पर मुकदमा चलता रहेगा।
किन आरोपों पर ट्रायल जारी रहेगा
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पति के विरुद्ध लगाए गए सभी आरोप स्वतः समाप्त नहीं हो जाते। अदालत ने बलात्कार और अप्राकृतिक कृत्य से संबंधित धाराओं को निरस्त करते हुए कहा कि:
- दहेज उत्पीड़न
- मारपीट
- मानसिक व शारीरिक क्रूरता
- अश्लील आचरण
जैसे आरोपों पर ट्रायल जारी रहेगा और निचली अदालत इन पर स्वतंत्र रूप से निर्णय करेगी।
इस प्रकार, यह निर्णय पति को पूरी तरह दोषमुक्त नहीं करता, बल्कि केवल यह कहता है कि वैवाहिक सहवास को बलात्कार या अप्राकृतिक कृत्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
कानून और विवाह के बीच संतुलन
यह फैसला एक बार फिर यह प्रश्न उठाता है कि विवाह के भीतर सहमति की अवधारणा को कानून किस हद तक स्वीकार करता है। भारतीय दंड संहिता में अब भी वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा गया है। इस कारण पति-पत्नी के बीच सहमति और असहमति की सीमा कानूनी रूप से स्पष्ट नहीं हो पाती।
हाईकोर्ट ने इस निर्णय में कानून की वर्तमान स्थिति को आधार बनाया, न कि किसी नए सिद्धांत को स्थापित किया। अदालत ने यह नहीं कहा कि पत्नी के साथ जबरन या अपमानजनक व्यवहार उचित है, बल्कि केवल यह कहा कि मौजूदा कानून के तहत ऐसे मामलों में 376 और 377 लागू नहीं होतीं।
सामाजिक प्रतिक्रिया और विवाद
इस फैसले के बाद समाज में दो तरह की प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं।
एक वर्ग का कहना है कि यह निर्णय वैवाहिक संस्था की रक्षा करता है और यह सुनिश्चित करता है कि वैवाहिक विवादों को आपराधिक कानून का हथियार बनाकर न बदला जाए।
दूसरा वर्ग इसे महिलाओं के अधिकारों के विरुद्ध मानता है और कहता है कि विवाह के भीतर भी महिला की सहमति उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी विवाह के बाहर।
इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच यह फैसला एक संवेदनशील संतुलन की कोशिश करता हुआ प्रतीत होता है, लेकिन यह भी स्पष्ट करता है कि जब तक कानून में संशोधन नहीं होता, तब तक अदालतें वर्तमान प्रावधानों से बंधी रहेंगी।
धारा 377 और उसका परिवर्तित स्वरूप
धारा 377 को लेकर पहले ही सुप्रीम कोर्ट कई बार स्पष्ट कर चुका है कि सहमति से बने समलैंगिक संबंध अपराध नहीं हैं। परंतु वैवाहिक संबंधों के संदर्भ में इसका प्रयोग अब भी कानूनी बहस का विषय बना हुआ है।
ग्वालियर हाईकोर्ट ने यह संकेत दिया कि धारा 377 का उद्देश्य वैवाहिक सहवास को आपराधिक बनाने का नहीं है, बल्कि समाज में जबरन या हिंसक यौन अपराधों को रोकना है।
धारा 482 का महत्व
इस मामले में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। यह धारा हाईकोर्ट को यह शक्ति देती है कि वह न्याय के हित में किसी भी कार्यवाही को निरस्त कर सके, यदि वह कानून का दुरुपयोग प्रतीत हो।
हाईकोर्ट ने माना कि बलात्कार और अप्राकृतिक कृत्य के आरोप वैवाहिक संबंधों की कानूनी परिभाषा के भीतर टिक नहीं पाते, इसलिए उन्हें निरस्त करना न्यायोचित है।
न्यायिक विवेक और कानून की सीमाएँ
यह निर्णय यह भी दर्शाता है कि अदालतें भावनात्मक या सामाजिक दबाव से नहीं, बल्कि कानून की भाषा और उसकी व्याख्या के आधार पर निर्णय देती हैं। न्यायालय का काम कानून बनाना नहीं, बल्कि कानून की व्याख्या करना है। जब तक संसद द्वारा वैवाहिक बलात्कार या वैवाहिक अप्राकृतिक कृत्य को अपराध घोषित नहीं किया जाता, तब तक अदालतें मौजूदा प्रावधानों के अनुसार ही निर्णय देने के लिए बाध्य हैं।
महिलाओं के अधिकारों पर प्रभाव
यह फैसला महिलाओं के अधिकारों की बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आया है। कई कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि विवाह के भीतर महिला की सहमति को भी स्वतंत्र और सम्मानजनक माना जाना चाहिए। वहीं, कुछ विशेषज्ञों का मत है कि हर वैवाहिक विवाद को आपराधिक रंग देना भी उचित नहीं है।
हाईकोर्ट का यह निर्णय इस द्वंद्व को पूरी तरह हल नहीं करता, लेकिन यह स्पष्ट करता है कि कानून में सुधार की आवश्यकता अब और अधिक महसूस की जा रही है।
भविष्य के लिए संकेत
यह फैसला आने वाले समय में कई मामलों के लिए मिसाल बन सकता है। ट्रायल कोर्ट और निचली अदालतें अब ऐसे मामलों में इस निर्णय को आधार बनाकर विचार करेंगी। साथ ही, यह निर्णय विधायिका के लिए भी एक संकेत है कि वैवाहिक संबंधों और आपराधिक कानून के बीच स्पष्ट सीमा रेखा तय करने की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
ग्वालियर हाईकोर्ट का यह निर्णय केवल एक मुकदमे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज, कानून और वैवाहिक रिश्तों के बीच संतुलन की गहरी तस्वीर प्रस्तुत करता है। अदालत ने कानून की वर्तमान स्थिति के अनुरूप फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया कि वैवाहिक सहवास को बलात्कार या अप्राकृतिक कृत्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि पति को क्रूरता, मारपीट और अश्लीलता जैसे अपराधों से कोई कानूनी संरक्षण नहीं मिलता।
यह फैसला यह संदेश देता है कि विवाह कानून से ऊपर नहीं है, लेकिन कानून भी विवाह की वास्तविकताओं को नजरअंदाज नहीं कर सकता। जब तक कानून में स्पष्ट संशोधन नहीं होता, तब तक ऐसे फैसले भारतीय न्याय व्यवस्था में बहस और विमर्श को आगे बढ़ाते रहेंगे।