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न्याय के मंदिर में खौफनाक प्रदर्शन जब चीनी मांझे ने काटी पेंसिल, हाई कोर्ट ने पूछा – “त्योहार जरूरी या इंसानी जान?”

न्याय के मंदिर में खौफनाक प्रदर्शन जब चीनी मांझे ने काटी पेंसिल, हाई कोर्ट ने पूछा – “त्योहार जरूरी या इंसानी जान?”


प्रस्तावना : उत्सव के आकाश में लहराता मौत का धागा

      भारत उत्सवों का देश है। यहाँ पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक मेल-जोल, सामूहिक उल्लास और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक हैं। मकर संक्रांति, स्वतंत्रता दिवस, उत्तरायण जैसे अवसरों पर पतंगबाजी वर्षों से हमारी परंपरा का अभिन्न हिस्सा रही है। छतों पर खड़े लोग, रंगीन पतंगें, बच्चों की किलकारियाँ और “वो काटा!” का शोर—यह दृश्य भारतीय समाज की सामूहिक स्मृति में गहराई से अंकित है।

       किन्तु पिछले कुछ दशकों में इस मासूम आनंद में एक ऐसा तत्व प्रवेश कर चुका है, जिसने उत्सव को भय में और आकाश को मौत के जाल में बदल दिया है। यह तत्व है—चीनी मांझा, जिसे आज सिंथेटिक या नायलॉन मांझे के नाम से भी जाना जाता है। यह सिर्फ एक धागा नहीं, बल्कि एक ऐसा अदृश्य हथियार है, जो हर साल सड़कों, छतों और आसमान में निर्दोष लोगों और बेजुबान पक्षियों की जान ले रहा है।

       अखबारों के पन्ने और न्यूज़ चैनलों की सुर्खियाँ हर साल गले कटने, आंखें फूटने, बच्चों के घायल होने और पक्षियों के तड़प-तड़प कर मरने की खबरों से भर जाती हैं। प्रतिबंधों के बावजूद यह जानलेवा मांझा खुलेआम बिकता रहा है। लेकिन हाल ही में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ में जो हुआ, उसने इस समस्या को केवल सामाजिक या प्रशासनिक मुद्दा नहीं रहने दिया—बल्कि इसे न्यायपालिका के सामने एक निर्विवाद, जीवंत और भयावह प्रमाण के रूप में प्रस्तुत कर दिया।


अदालत कक्ष में सन्नाटा : जब एक पेंसिल ने बयान कर दी सच्चाई

       मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में चीनी मांझे पर प्रतिबंध के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर एक जनहित याचिका पर सुनवाई चल रही थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि केंद्र और राज्य सरकारों के आदेशों तथा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के स्पष्ट प्रतिबंध के बावजूद प्रशासन इस खूनी धागे को रोकने में पूरी तरह विफल रहा है।

      बहस के दौरान, खतरे की भयावहता को महज़ शब्दों में नहीं, बल्कि आंखों के सामने साबित करने के लिए अदालत में एक प्रत्यक्ष प्रदर्शन किया गया। एक साधारण लकड़ी की पेंसिल—जिसे हम रोजमर्रा में मजबूती का प्रतीक मानते हैं—को चीनी मांझे के संपर्क में लाया गया। जैसे ही मांझे को पेंसिल पर हल्के से रगड़ा गया, कुछ ही क्षणों में पेंसिल दो टुकड़ों में कटकर गिर पड़ी।

      उस क्षण अदालत कक्ष में पिन-ड्रॉप सन्नाटा छा गया। यह कोई तस्वीर नहीं थी, कोई वीडियो नहीं था, बल्कि न्यायाधीशों की अपनी आंखों के सामने घटित एक सच्चाई थी। खंडपीठ ने जो देखा, उसने पूरी बहस की दिशा बदल दी।


न्यायाधीशों की तीखी टिप्पणी : “अगर पेंसिल कट सकती है…”

      जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस अनिल वर्मा की पीठ ने इस प्रदर्शन के बाद बेहद कड़े शब्दों में प्रतिक्रिया दी। अदालत ने कहा कि यदि यह मांझा एक सख्त लकड़ी की पेंसिल को इतनी आसानी से काट सकता है, तो यह कल्पना करना भी भयावह है कि यह इंसानी गले, त्वचा और धमनियों के साथ क्या कर सकता है।

      अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मानव शरीर—विशेषकर गर्दन, जहाँ प्रमुख रक्त धमनियाँ होती हैं—पेंसिल की तुलना में कहीं अधिक नाजुक है। ऐसे में यह मांझा किसी भी व्यक्ति के लिए तुरंत जानलेवा साबित हो सकता है। यह टिप्पणी केवल एक अवलोकन नहीं थी, बल्कि प्रशासन और समाज दोनों के लिए एक गंभीर चेतावनी थी।


चीनी मांझा : तकनीक में छिपा कातिल

    इस समस्या को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि चीनी मांझा आखिर इतना खतरनाक क्यों है।

      पारंपरिक भारतीय मांझा सूती धागे से बनता था, जिस पर चावल की लेई, गोंद और बारीक कांच का चूर्ण लगाया जाता था। वह धारदार जरूर होता था, लेकिन उसमें एक प्राकृतिक सीमा थी—अधिक तनाव पड़ने पर वह टूट जाता था।

      इसके विपरीत, आधुनिक चीनी या सिंथेटिक मांझा नायलॉन, प्लास्टिक या पॉलीमर फाइबर से बनाया जाता है। इसकी tensile strength अत्यंत अधिक होती है। इस पर कांच के बुरादे के साथ-साथ धातु के कण और रासायनिक पदार्थ लगाए जाते हैं, जिससे यह बेहद धारदार और लगभग न टूटने वाला बन जाता है।

यही गुण पतंगबाजों के लिए आकर्षण है, लेकिन आम जनता के लिए यह एक अदृश्य तलवार है। दोपहिया वाहन की गति के साथ जब यह मांझा किसी के गले या चेहरे से टकराता है, तो यह त्वचा, मांस और नसों को चीरता चला जाता है। कई मामलों में मौके पर ही मौत हो जाती है।


पर्यावरण और पक्षियों के लिए मौत का जाल

चीनी मांझा केवल इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि पर्यावरण के लिए भी एक गंभीर खतरा है। नायलॉन और प्लास्टिक से बना होने के कारण यह नॉन-बायोडिग्रेडेबल है। यह महीनों और वर्षों तक पेड़ों, बिजली के तारों और इमारतों पर लटका रहता है।

पक्षी इसे देख नहीं पाते। उनके पंख कट जाते हैं, वे इसमें उलझकर दम तोड़ देते हैं। हर साल संक्रांति के बाद पक्षी अस्पतालों में घायल परिंदों की संख्या अचानक बढ़ जाती है। कई पक्षी जीवन भर उड़ने में असमर्थ हो जाते हैं।


प्रशासनिक विफलता : कागजों में प्रतिबंध, जमीन पर खुलेआम बिक्री

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने वर्ष 2017 में ही पूरे देश में सिंथेटिक मांझे के निर्माण, बिक्री, भंडारण और उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। कई राज्य सरकारों ने भी इस पर अधिसूचनाएँ जारी कीं।

इसके बावजूद, हर साल त्योहारों से पहले बाजारों में यह मांझा खुलेआम बिकता है। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इसी पर तीखे सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि प्रशासन केवल औपचारिक कार्रवाई कर रहा है—कुछ छापे, कुछ बरामदगी, लेकिन बड़े आपूर्तिकर्ताओं पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं।

यह स्थिति या तो प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाती है या फिर मिलीभगत को।


हाई कोर्ट का अल्टीमेटम : “जरूरत पड़ी तो पतंगबाजी पर ही रोक”

अदालत की सबसे गंभीर टिप्पणी तब आई जब पीठ ने कहा कि यदि प्रशासन इस जानलेवा मांझे को रोकने में असमर्थ है, तो न्यायालय के पास पतंग उड़ाने जैसी गतिविधियों पर ही प्रतिबंध लगाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।

यह कथन भारतीय समाज के लिए झकझोर देने वाला था। पतंगबाजी हमारी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है, लेकिन अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि संविधान का अनुच्छेद 21—जीवन का अधिकार—हर परंपरा से ऊपर है


सड़क पर बहता खून : आंकड़ों से परे की सच्चाई

हर साल ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं जहाँ बाइक सवारों के गले कट जाते हैं, बच्चे घायल हो जाते हैं और परिवार उजड़ जाते हैं। कई बार पीड़ित अस्पताल पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देता है। इन घटनाओं का कोई सटीक राष्ट्रीय आंकड़ा भले न हो, लेकिन हर शहर के अस्पताल इनकी भयावह सच्चाई के गवाह हैं।


निष्कर्ष : अब फैसला समाज को करना है

हाई कोर्ट में कटी पेंसिल केवल एक प्रदर्शन नहीं थी, वह एक प्रतीक थी—हमारी लापरवाही का, हमारी उदासीनता का और हमारी प्राथमिकताओं के विकृत होने का।

अब सवाल यह नहीं है कि पतंग उड़ानी चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि क्या हमारा मनोरंजन किसी की जान से ज्यादा कीमती है? यदि हम स्वयं जिम्मेदारी नहीं लेंगे, तो अदालतें मजबूर होंगी हमारी परंपराओं पर भी लगाम लगाने के लिए।

चीनी मांझे के खिलाफ लड़ाई केवल कानून की नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की लड़ाई है। यदि हम आज नहीं चेते, तो कल पतंग की डोर हमारे हाथों से नहीं—बल्कि न्यायालय के आदेश से छिन जाएगी। और तब हमारे पास शिकायत करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं होगा, क्योंकि चेतावनी तो अदालत में उसी दिन दे दी गई थी, जब एक पेंसिल इंसान की तरह कट गई थी।