न्याय का मंदिर या भरोसे का मलबा? जब आम आदमी का विश्वास डगमगाने लगे
— Adv. P. K. Nigam
यदि कानून का रास्ता इतना सरल, सुलभ और निष्पक्ष हो जाए कि आम आदमी को यह भरोसा हो जाए कि “हाँ, अभी भी न्याय का मंदिर जीवित है”,
यदि हर पीड़ित यह महसूस करे कि न्याय के देवता आंखों पर बंधी पट्टी के साथ भी सच्चाई देख सकते हैं,
और यदि हर अपराधी यह सोचकर कांप उठे कि कानून से बच पाना असंभव है—
तो समाज से अपराध स्वतः ही कम होने लगेंगे।
परंतु प्रश्न यह है—
क्या आज का आम नागरिक वास्तव में ऐसा महसूस करता है?
आज का कड़वा सत्य यह है कि जिस न्याय के मंदिर पर कभी सबसे अधिक भरोसा था,
उसी मंदिर पर आज सबसे अधिक सवाल उठ रहे हैं।
न्याय का विचार: संविधान से आस्था तक
भारतीय संविधान की प्रस्तावना हमें न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का वचन देती है। न्याय केवल एक कानूनी शब्द नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और नैतिक अवधारणा है।
हमारे समाज में न्यायालय को “न्याय का मंदिर” कहा गया—
जहाँ न्यायाधीश को न्याय का देवता माना गया।
यह कोई साधारण उपमा नहीं थी, बल्कि आम आदमी की अटूट आस्था का प्रतीक थी।
लेकिन आज वही आम आदमी कहता है—
“न्याय है, पर मेरे लिए नहीं।”
आम आदमी की पीड़ा: तारीख़ पर तारीख़
एक गरीब, किसान, मजदूर या मध्यम वर्गीय व्यक्ति जब न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाता है,
तो उसे सबसे पहले मिलता है—
- लंबी प्रक्रियाएँ
- महँगे वकील
- वर्षों तक चलने वाले मुकदमे
- और अंतहीन तारीख़ें
न्याय की यह यात्रा इतनी कठिन हो गई है कि पीड़ित पहले ही हार मान लेता है।
कई मामलों में तो न्याय मिलने से पहले ही—
- पीड़ित की मृत्यु हो जाती है
- सबूत नष्ट हो जाते हैं
- गवाह पलट जाते हैं
और फिर फ़ाइल बंद हो जाती है।
जब न्याय बिकने की चर्चा होने लगे
यह कहना अत्यंत पीड़ादायक है, परंतु आज समाज में यह धारणा तेजी से फैल रही है कि—
“पैसा हो तो न्याय झुक सकता है।”
जब बड़े अपराधों में—
- शक्तिशाली आरोपी आसानी से ज़मानत पा जाते हैं
- सबूतों के बावजूद दोषमुक्त हो जाते हैं
- और पीड़ित को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है
तो जनता के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है—
क्या न्याय के देवता भी बिक सकते हैं?
यह धारणा भले ही पूर्ण सत्य न हो,
लेकिन इसका फैलना ही न्याय प्रणाली के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
न्यायपालिका की बदनामी: असली नुकसान किसका?
जब न्यायालय पर उंगली उठती है, तो नुकसान केवल किसी संस्था का नहीं होता— बल्कि पूरे लोकतंत्र का होता है।
क्योंकि—
- कार्यपालिका गलती करे तो न्यायपालिका सुधार सकती है
- विधायिका चूके तो न्यायपालिका संतुलन बना सकती है
पर यदि न्यायपालिका पर ही भरोसा टूट जाए,
तो आम आदमी के पास जाने के लिए कोई दरवाज़ा नहीं बचता।
यही स्थिति अराजकता को जन्म देती है।
अपराधी क्यों नहीं डरता?
आज अपराधी इसलिए नहीं डरता क्योंकि—
- उसे पता है कि केस सालों चलेगा
- गवाह डरकर मुकर सकते हैं
- जांच एजेंसियाँ कमजोर हैं
- प्रभाव और धन से प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है
जब सज़ा की संभावना कम हो जाती है,
तो अपराध एक जोखिम नहीं बल्कि रणनीति बन जाता है।
न्याय में देरी = न्याय से इनकार
यह सिद्धांत वर्षों पहले स्थापित हो चुका है—
Justice delayed is justice denied
पर आज यह केवल एक किताबों में लिखा वाक्य बनकर रह गया है।
सोचिए— यदि किसी निर्दोष को 15–20 वर्ष बाद बरी किया जाए, तो क्या उसका खोया हुआ जीवन लौटाया जा सकता है? और यदि किसी अपराधी को इतने वर्षों बाद सज़ा मिले, तो क्या पीड़ित का घाव भर जाता है?
क्या न्यायपालिका पूरी तरह दोषी है?
नहीं।
न्यायपालिका को दोष देने से पहले हमें यह भी समझना होगा कि—
- न्यायाधीशों पर मामलों का अत्यधिक बोझ है
- अदालतों में स्टाफ और संसाधनों की कमी है
- कानून पुराने और जटिल हैं
- राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है
परंतु इसके बावजूद,
पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य है।
न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए,
बल्कि दिखना भी चाहिए।
न्याय को बेहतर कैसे बनाया जाए?
1. मुकदमों की समय-सीमा
हर प्रकार के केस के लिए निश्चित समय तय हो।
2. डिजिटल और सरल प्रक्रिया
आम आदमी बिना दलाल और भय के न्याय पा सके।
3. न्यायिक जवाबदेही
भ्रष्टाचार के आरोपों पर स्वतंत्र और प्रभावी जांच हो।
4. गवाह संरक्षण
जब तक गवाह सुरक्षित नहीं, न्याय अधूरा रहेगा।
5. कानूनी शिक्षा
जनता को उसके अधिकारों की जानकारी हो।
न्याय के देवता को फिर से स्थापित करना होगा
न्याय के देवता को बचाने का अर्थ है— न्याय प्रणाली की आत्मा को बचाना।
यदि आम आदमी को फिर से यह भरोसा दिलाना है कि—
“हाँ, न्याय का मंदिर अभी भी जीवित है”
तो हमें—
- ईमानदारी
- साहस
- और सुधार की इच्छा
तीनों को एक साथ लाना होगा।
निष्कर्ष: भरोसा टूटा तो व्यवस्था टूटेगी
न्याय का मंदिर ईंट-पत्थर से नहीं बनता,
वह जनता के विश्वास से खड़ा रहता है।
यदि यह विश्वास टूटा— तो न कानून बचेगा,
न लोकतंत्र,
न समाज।
आज समय आ गया है कि हम पूछें—
क्या हम न्याय को बचाना चाहते हैं,
या केवल उसकी मूर्ति को पूजते रहेंगे?
Adv. P. K. Nigam
(संवैधानिक मूल्यों और न्यायिक सुधारों में विश्वास रखने वाला अधिवक्ता)