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दिव्यांगों की गरिमा बनाम व्यावसायिक लालच: ऑटिज़्म केयर होम्स पर सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप

ऑटिज़्म और बौद्धिक दिव्यांगों के केयर होम्स में शोषण पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी देश-भर में दुरुपयोग, उपेक्षा और व्यावसायिक शोषण के आरोपों पर PIL; सख्त विनियमन और जवाबदेही की माँग पर नोटिस जारी


भारत में दिव्यांगजनों के अधिकार, विशेष रूप से ऑटिज़्म (Autism) और बौद्धिक दिव्यांगता (Intellectual Disability) से ग्रस्त व्यक्तियों की देखभाल, लंबे समय से सामाजिक और संवैधानिक चिंता का विषय रही है। हाल ही में Supreme Court ने इस विषय पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए एक जनहित याचिका (PIL) पर नोटिस जारी किया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि देश के विभिन्न हिस्सों में संचालित रेज़िडेंशियल केयर होम्स में गंभीर स्तर पर शारीरिक-मानसिक शोषण, उपेक्षा और व्यावसायिक दोहन हो रहा है।

यह मामला न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि यह भी प्रश्न उठाता है कि क्या भारत की आपराधिक न्याय और सामाजिक कल्याण प्रणाली, सबसे कमजोर वर्ग—दिव्यांग नागरिकों—की रक्षा करने में विफल हो रही है।


1. जनहित याचिका का मूल आरोप: देखभाल नहीं, व्यापार

याचिका में यह गंभीर आरोप लगाए गए हैं कि—

  • कई निजी और अर्ध-निजी केयर होम्स लाभ कमाने के उद्देश्य से संचालित हो रहे हैं
  • दिव्यांग व्यक्तियों को मानव गरिमा के विपरीत परिस्थितियों में रखा जा रहा है
  • पर्याप्त चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक सहायता और पुनर्वास सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं
  • परिवारों से भारी शुल्क वसूला जाता है, लेकिन सेवाएँ न्यूनतम या नाममात्र की होती हैं

याचिकाकर्ता के अनुसार, इन संस्थानों में रहने वाले व्यक्ति अपनी स्थिति के कारण स्वयं शिकायत करने में असमर्थ होते हैं, जिससे शोषण वर्षों तक छिपा रहता है।


2. सुप्रीम कोर्ट की प्रारंभिक चिंता और हस्तक्षेप

मामले की प्रारंभिक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि—

“यदि आरोप सही हैं, तो यह एक गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन है, जो संविधान के मूल मूल्यों पर सीधा आघात करता है।”

अदालत ने केंद्र सरकार, संबंधित राज्यों और सामाजिक न्याय मंत्रालय को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि दिव्यांगों की देखभाल केवल नीति का विषय नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व है।


3. संविधान और दिव्यांगों का अधिकार

भारतीय संविधान के अंतर्गत—

  • अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार
  • अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
  • अनुच्छेद 41 – राज्य की सामाजिक सुरक्षा की जिम्मेदारी

इन सभी प्रावधानों का लाभ दिव्यांग व्यक्तियों को समान रूप से प्राप्त है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कई मामलों में स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 21 केवल शारीरिक अस्तित्व नहीं, बल्कि सम्मानपूर्ण जीवन का अधिकार सुनिश्चित करता है।

ऑटिज़्म और बौद्धिक दिव्यांगता से ग्रस्त व्यक्ति समाज का वह वर्ग हैं, जिनकी रक्षा के लिए राज्य को अतिरिक्त संवेदनशीलता दिखानी चाहिए।


4. मौजूदा कानूनी ढाँचा और उसकी सीमाएँ

भारत में दिव्यांगजनों के लिए कई कानून मौजूद हैं, जैसे—

  • दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम
  • मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित कानून
  • बाल संरक्षण से जुड़े प्रावधान

लेकिन याचिका में कहा गया है कि—

  • इन कानूनों का जमीनी स्तर पर पालन नहीं हो रहा
  • केयर होम्स के पंजीकरण, निरीक्षण और निगरानी की कोई एकीकृत व्यवस्था नहीं है
  • कई संस्थान बिना पर्याप्त लाइसेंस या मानकों के चल रहे हैं

इस कारण, शोषण की घटनाएँ सामने आने के बावजूद, जवाबदेही तय नहीं हो पाती


5. व्यावसायिक शोषण: एक अदृश्य अपराध

याचिका का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कई केयर होम्स—

  • दिव्यांगों को “सेवा” नहीं, बल्कि “उत्पाद” की तरह देखते हैं
  • न्यूनतम खर्च में अधिकतम मुनाफा कमाने का प्रयास करते हैं
  • कर्मचारियों को अपर्याप्त प्रशिक्षण और कम वेतन देते हैं, जिससे दुर्व्यवहार बढ़ता है

यह स्थिति विशेष रूप से उन परिवारों के लिए त्रासदीपूर्ण है, जो मजबूरी में अपने बच्चों या परिजनों को इन संस्थानों में छोड़ते हैं।


6. निगरानी तंत्र की कमी: कौन देखे देखभाल को?

सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से यह प्रश्न उठाया कि—

“जब ये संस्थान बंद दरवाज़ों के पीछे चलते हैं, तो यह सुनिश्चित कौन करता है कि वहाँ मानवीय व्यवहार हो रहा है?”

अदालत ने संकेत दिया कि—

  • नियमित निरीक्षण
  • स्वतंत्र ऑडिट
  • शिकायत निवारण तंत्र

के बिना केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है।


7. अंतरराष्ट्रीय मानदंड और भारत की जिम्मेदारी

भारत संयुक्त राष्ट्र दिव्यांग अधिकार कन्वेंशन (UNCRPD) का हस्ताक्षरकर्ता है, जो दिव्यांग व्यक्तियों के—

  • सम्मान
  • स्वायत्तता
  • सुरक्षा

को सुनिश्चित करने का दायित्व राज्यों पर डालता है।

सुप्रीम कोर्ट ने अतीत में कई बार कहा है कि अंतरराष्ट्रीय दायित्वों को घरेलू कानून की व्याख्या में ध्यान में रखा जाना चाहिए।


8. संभावित निर्देश: क्या बदल सकता है?

इस PIL के परिणामस्वरूप सुप्रीम कोर्ट—

  • केयर होम्स के लिए राष्ट्रीय स्तर के न्यूनतम मानक तय कर सकता है
  • एक केंद्रीकृत निगरानी प्राधिकरण के गठन का आदेश दे सकता है
  • राज्यों को नियमित रिपोर्टिंग और निरीक्षण के लिए बाध्य कर सकता है
  • शोषण के मामलों में कठोर दंडात्मक प्रावधान लागू करने का निर्देश दे सकता है

यदि ऐसा होता है, तो यह दिव्यांग अधिकारों के क्षेत्र में ऐतिहासिक सुधार होगा।


9. समाज और परिवार की भूमिका

केवल राज्य ही नहीं, बल्कि समाज की भी जिम्मेदारी है कि—

  • दिव्यांग व्यक्तियों को बोझ न समझा जाए
  • केयर होम्स को अंतिम विकल्प के रूप में ही चुना जाए
  • किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार की सूचना तुरंत दी जाए

यह मामला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हमने अपने सबसे कमजोर नागरिकों के लिए कैसा समाज बनाया है।


10. निष्कर्ष: गरिमा की रक्षा का प्रश्न

Supreme Court द्वारा इस PIL पर नोटिस जारी करना एक स्पष्ट संकेत है कि—

दिव्यांग व्यक्तियों की उपेक्षा अब ‘अदृश्य मुद्दा’ नहीं रहेगी।

ऑटिज़्म और बौद्धिक दिव्यांगता से ग्रस्त लोग दया नहीं, अधिकार के पात्र हैं। उनका शोषण न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि मानवता पर कलंक भी।

यह मामला यदि अपने तार्किक निष्कर्ष तक पहुँचता है, तो यह सुनिश्चित कर सकता है कि—

देखभाल केंद्र वास्तव में “केयर” करें, न कि “कॉमर्स”।

और यही एक संवेदनशील, न्यायपूर्ण और संवैधानिक समाज की असली पहचान है।