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दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र सरकार का अहम बयान सरकारी वकीलों के Empanelment में पारदर्शिता की दिशा में बड़ा कदम

दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र सरकार का अहम बयान सरकारी वकीलों के Empanelment में पारदर्शिता की दिशा में बड़ा कदम

       भारत की न्यायिक व्यवस्था में सरकारी वकीलों (Government Lawyers) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वे न केवल सरकार का पक्ष अदालतों में रखते हैं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों, कानून के शासन और सार्वजनिक हित की रक्षा में भी अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में यदि उनकी नियुक्ति (Empanelment) की प्रक्रिया ही अस्पष्ट, अपारदर्शी या नियमों के विपरीत हो, तो यह पूरे न्यायिक तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है। इसी पृष्ठभूमि में दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार द्वारा दिया गया हालिया बयान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


1. जनहित याचिका (PIL) की पृष्ठभूमि

दिल्ली हाईकोर्ट में दायर इस PIL में गंभीर आरोप लगाए गए थे कि केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई सरकारी वकीलों की empanelment list में ऐसे वकीलों के नाम भी शामिल हैं, जिन्होंने अभी तक AIBE (All India Bar Examination) पास नहीं किया है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि—

  • AIBE पास करना वकालत के पेशे में सक्रिय रूप से प्रैक्टिस करने के लिए अनिवार्य शर्त है
  • बिना AIBE पास किए किसी वकील को सरकारी वकील के रूप में नियुक्त करना नियमों का उल्लंघन है
  • इससे योग्य और मेहनती युवा वकीलों के अधिकारों का हनन होता है

इस याचिका ने सीधे तौर पर सरकारी वकीलों की नियुक्ति प्रक्रिया की वैधता और पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए।


2. AIBE (All India Bar Examination) का कानूनी महत्व

AIBE वह परीक्षा है, जिसे Bar Council of India द्वारा अधिसूचित किया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि—

  • वकील को कानून का न्यूनतम व्यावहारिक ज्ञान है
  • वह अदालतों में प्रभावी ढंग से पेश होने के योग्य है
  • पेशेवर नैतिकता और जिम्मेदारियों को समझता है

AIBE पास करने के बाद ही वकील को Certificate of Practice मिलता है। ऐसे में यदि कोई वकील AIBE पास किए बिना सरकारी वकील के रूप में empanel होता है, तो यह न केवल नियमों के विपरीत है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की गुणवत्ता को भी प्रभावित कर सकता है।


3. केंद्र सरकार का पक्ष: Solicitor General का बयान

PIL की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से तुषार मेहता ने अदालत के समक्ष एक महत्वपूर्ण और संतुलित रुख अपनाया। उन्होंने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि—

  • याचिका में उठाए गए कुछ तथ्य सही हैं
  • सरकार इस मुद्दे को हल्के में नहीं ले रही
  • empanelment प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता है

Solicitor General ने यह भी आश्वासन दिया कि केंद्र सरकार एक स्पष्ट, पारदर्शी और नियमों के अनुरूप mechanism / policy तैयार करेगी, ताकि भविष्य में सरकारी वकीलों की नियुक्ति में किसी भी प्रकार की अनियमितता न हो।

यह स्वीकारोक्ति अपने आप में महत्वपूर्ण थी, क्योंकि आमतौर पर सरकारें ऐसी PILs में रक्षात्मक रुख अपनाती हैं। लेकिन यहां सरकार ने समस्या को स्वीकार कर समाधान की दिशा में कदम बढ़ाने का संकेत दिया


4. Empanelment Policy: अब तक की स्थिति

अब तक केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों और मंत्रालयों में सरकारी वकीलों का empanelment—

  • अलग-अलग guidelines के आधार पर
  • कई बार बिना एक समान मानक (Uniform Criteria) के
  • और सीमित पारदर्शिता के साथ

किया जाता रहा है। इससे अक्सर यह शिकायतें सामने आती रही हैं कि—

  • merit के बजाय संपर्क (influence) को तरजीह मिलती है
  • युवा और योग्य वकीलों को पर्याप्त अवसर नहीं मिलते
  • चयन प्रक्रिया स्पष्ट नहीं होती

इसी कमी को दूर करने के लिए एक स्पष्ट और लिखित नीति (Policy) की लंबे समय से मांग की जा रही थी।


5. दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश

मामले की सुनवाई के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने एक संतुलित और व्यावहारिक आदेश पारित किया। कोर्ट ने—

  • PIL का निपटारा करते हुए
  • केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह इस याचिका को representation के रूप में ले
  • और सरकारी वकीलों की empanelment नीति पर गंभीरता से विचार करे

कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह नीति निर्माण के क्षेत्र में सीधे हस्तक्षेप नहीं कर रहा, लेकिन संवैधानिक मूल्यों और कानून के शासन के अनुरूप सुधार की अपेक्षा जरूर रखता है


6. कानूनी और संस्थागत महत्व

यह फैसला केवल एक PIL का निपटारा नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी कानूनी और संस्थागत प्रभाव हैं—

(i) Merit-based Empanelment को बढ़ावा

स्पष्ट नीति बनने से चयन में योग्यता, अनुभव और कानूनी दक्षता को प्राथमिकता मिलेगी।

(ii) नियमों का उल्लंघन रोकेगा

AIBE जैसी अनिवार्य शर्तों की अनदेखी पर रोक लगेगी।

(iii) पारदर्शिता और जवाबदेही

नीति सार्वजनिक होने से चयन प्रक्रिया पर निगरानी संभव होगी।

(iv) युवा वकीलों के लिए अवसर

नए और योग्य वकीलों को सरकारी पैनल में शामिल होने का निष्पक्ष मौका मिलेगा।


7. युवा वकीलों के दृष्टिकोण से महत्व

भारत में हर साल हजारों कानून स्नातक वकालत के पेशे में प्रवेश करते हैं। उनके लिए सरकारी वकील के रूप में empanelment—

  • पेशेवर पहचान
  • स्थिर आय
  • और महत्वपूर्ण मुकदमों में अनुभव

का अवसर प्रदान करता है। यदि empanelment प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होती, तो यह युवा वकीलों के मनोबल को तोड़ती है। दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले से उन्हें यह संदेश मिलता है कि—

“योग्यता और नियमों का पालन करने वालों के अधिकारों की रक्षा की जाएगी।”


8. लीगल सिस्टम पर व्यापक प्रभाव

सरकारी वकील न्यायिक तंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। यदि—

  • उनकी नियुक्ति निष्पक्ष होगी
  • वे विधिक रूप से योग्य होंगे
  • और पेशेवर नैतिकता का पालन करेंगे

तो इसका सीधा असर न्याय की गुणवत्ता और न्यायपालिका की साख पर पड़ेगा। इस दृष्टि से यह फैसला पूरे लीगल सिस्टम को मजबूत करने वाला है।


9. भविष्य की दिशा: क्या उम्मीद की जाए?

अब सभी की निगाहें केंद्र सरकार पर टिकी हैं कि—

  • वह कितनी जल्दी empanelment policy तैयार करती है
  • क्या इसमें AIBE, अनुभव, प्रदर्शन और इंटरव्यू जैसे मानदंड स्पष्ट रूप से शामिल होंगे
  • और क्या इसे सार्वजनिक किया जाएगा

यदि सरकार अपने आश्वासन को व्यवहार में उतारती है, तो यह फैसला एक मिसाल (precedent) बन सकता है।


निष्कर्ष

दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र सरकार का यह बयान और उसके बाद दिया गया निर्देश भारतीय लीगल सिस्टम में सुधार की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है। यह दिखाता है कि—

  • न्यायपालिका संवेदनशील है
  • सरकार जवाबदेह है
  • और सार्वजनिक हित में सुधार संभव है

सरकारी वकीलों की empanelment प्रक्रिया में पारदर्शिता न केवल वकीलों के लिए, बल्कि न्याय पाने वाले आम नागरिकों के लिए भी आवश्यक है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में यह पहल एक मजबूत, निष्पक्ष और भरोसेमंद प्रणाली के रूप में सामने आएगी।