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दहेज, मेहर और मुस्लिम विवाह व्यवस्था : ऐतिहासिक विकृति, सामाजिक समावेशन और सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक दृष्टि

दहेज, मेहर और मुस्लिम विवाह व्यवस्था : ऐतिहासिक विकृति, सामाजिक समावेशन और सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक दृष्टि

भूमिका

          भारत में विवाह केवल एक सामाजिक संस्था नहीं बल्कि धार्मिक, आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं से गहराई से जुड़ा हुआ संस्कार है। विभिन्न धर्मों में विवाह से जुड़ी आर्थिक व्यवस्थाएँ अलग-अलग रही हैं। हिंदू समाज में जहाँ दहेज प्रथा का ऐतिहासिक विकास हुआ, वहीं इस्लाम में मेहर (Mehr) को महिला के आर्थिक सशक्तिकरण का साधन माना गया। किंतु समय के साथ सामाजिक समावेशन (Cultural Assimilation), सामाजिक अनुकरण (Social Emulation) और अंतर-सामुदायिक प्रभाव (Inter-community Influence) के कारण भारत में मुस्लिम समाज के विवाह व्यवहार में भी दहेज जैसी प्रवृत्तियाँ प्रवेश कर गईं।

        यह परिवर्तन न केवल धार्मिक सिद्धांतों के विरुद्ध है, बल्कि महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों और गरिमा पर भी सीधा आघात करता है। Supreme Court of India ने समय-समय पर इस सामाजिक विकृति पर गंभीर टिप्पणी की है और इसे महिलाओं के अधिकारों के लिए घातक बताया है।


दहेज प्रथा : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

        दहेज प्रथा का उद्भव मुख्यतः हिंदू जाति व्यवस्था से जुड़ा रहा है। प्रारंभिक काल में इसे स्त्रीधन के रूप में देखा जाता था, जिसका उद्देश्य विवाह के बाद महिला को आर्थिक सुरक्षा देना था। किंतु समय के साथ यह प्रथा एक अनिवार्य सामाजिक मांग में परिवर्तित हो गई। विवाह अब सामाजिक सम्मान, प्रतिष्ठा और आर्थिक लेन-देन का माध्यम बन गया।

         औपनिवेशिक काल और उसके बाद शहरीकरण, संपत्ति-केंद्रित सोच तथा उपभोक्तावाद ने दहेज को और अधिक हिंसक तथा शोषणकारी बना दिया। दहेज हत्या, उत्पीड़न और घरेलू हिंसा जैसी समस्याएँ इसी सामाजिक विकृति का परिणाम हैं।


इस्लाम में मेहर की अवधारणा

        इस्लामी कानून में मेहर विवाह का एक अनिवार्य तत्व है। यह वह धन या संपत्ति है जिसे पति विवाह के समय पत्नी को देता है। इसका उद्देश्य स्पष्ट है—

  1. महिला को आर्थिक स्वतंत्रता देना
  2. विवाह में उसकी स्वायत्तता और सम्मान सुनिश्चित करना
  3. तलाक या वैवाहिक संकट की स्थिति में सुरक्षा प्रदान करना

मेहर इस्लामी दर्शन में महिला का पूर्ण और अनन्य अधिकार है, जिस पर पति या ससुराल पक्ष का कोई दावा नहीं होता।


सांस्कृतिक समावेशन और विकृति की प्रक्रिया

       भारत में मुस्लिम समाज बहुसंख्यक हिंदू सामाजिक संरचना के बीच विकसित हुआ। इसके परिणामस्वरूप कुछ ऐसी सामाजिक प्रक्रियाएँ उत्पन्न हुईं जिनका प्रभाव मुस्लिम विवाह प्रथाओं पर भी पड़ा—

1. सांस्कृतिक समावेशन (Cultural Assimilation)

हिंदू समाज में प्रचलित दहेज प्रथा धीरे-धीरे मुस्लिम समाज में भी प्रवेश करने लगी।

2. सामाजिक अनुकरण (Social Emulation)

सामाजिक प्रतिष्ठा बनाए रखने की होड़ में मुस्लिम परिवारों ने भी विवाह में धन, आभूषण और उपहार देना शुरू किया।

3. अंतर-सामुदायिक प्रभाव (Inter-community Influence)

समान सामाजिक-आर्थिक वातावरण में रहते हुए विवाह के स्वरूप भी समान होते चले गए।

परिणामस्वरूप, आज अनेक मुस्लिम विवाहों में मेहर केवल नाममात्र का रह गया है, जबकि वास्तविक आर्थिक लेन-देन लड़की के परिवार से लड़के के परिवार की ओर होता है।


मेहर का खोखला होना : महिला सशक्तिकरण पर प्रभाव

इस सामाजिक परिवर्तन का सबसे गंभीर परिणाम यह हुआ कि मेहर की मूल इस्लामी भावना नष्ट हो गई। जहाँ मेहर महिला को संपत्ति अधिकार देता था, वहीं दहेज व्यवस्था ने उसे पुनः आर्थिक रूप से आश्रित बना दिया।

  • मेहर की राशि प्रतीकात्मक कर दी जाती है
  • वास्तविक खर्च और संपत्ति हस्तांतरण लड़की पक्ष से होता है
  • विवाह के बाद महिला के पास स्वतंत्र संपत्ति नहीं रहती
  • उत्पीड़न की स्थिति में उसके पास आर्थिक सुरक्षा नहीं होती

यह स्थिति न केवल धार्मिक सिद्धांतों के विपरीत है, बल्कि संवैधानिक समानता और गरिमा के भी खिलाफ है।


सुप्रीम कोर्ट की दृष्टि

Supreme Court of India ने कई अवसरों पर यह स्पष्ट किया है कि—

  • दहेज सामाजिक अभिशाप है
  • किसी भी धर्म के नाम पर महिलाओं के शोषण को वैध नहीं ठहराया जा सकता
  • व्यक्तिगत कानून भी संविधान के अधीन हैं

न्यायालय ने माना है कि यदि किसी धार्मिक प्रथा का प्रयोग महिलाओं के अधिकारों को कमजोर करने के लिए किया जा रहा है, तो वह संवैधानिक जांच से बच नहीं सकती।


संवैधानिक परिप्रेक्ष्य

भारतीय संविधान महिलाओं को—

  • समानता का अधिकार
  • गरिमा के साथ जीवन का अधिकार
  • शोषण से मुक्ति का अधिकार

प्रदान करता है। जब मुस्लिम विवाहों में मेहर को मात्र औपचारिक बना दिया जाता है और वास्तविक आर्थिक बोझ लड़की पर डाला जाता है, तो यह सीधे-सीधे लैंगिक समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है।


दहेज निषेध कानून और मुस्लिम विवाह

दहेज निषेध अधिनियम, 1961 धर्मनिरपेक्ष कानून है और यह सभी समुदायों पर समान रूप से लागू होता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि—

  • दहेज का लेन-देन किसी भी नाम से हो, अपराध है
  • “रीति-रिवाज” या “परंपरा” के नाम पर इसे वैध नहीं ठहराया जा सकता
  • मेहर के नाम पर दहेज को छिपाना कानून का दुरुपयोग है

समाज सुधार की आवश्यकता

इस समस्या का समाधान केवल कानून से संभव नहीं है। इसके लिए—

  1. सामाजिक जागरूकता
  2. धार्मिक शिक्षा का सही प्रसार
  3. महिलाओं की आर्थिक शिक्षा
  4. सामुदायिक आत्ममंथन

अत्यंत आवश्यक है। मुस्लिम समाज को यह समझना होगा कि मेहर कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि महिला की सुरक्षा का साधन है।


निष्कर्ष

        दहेज की ऐतिहासिक जड़ें भले ही हिंदू समाज में रही हों, किंतु उसका मुस्लिम समाज में प्रवेश एक सांस्कृतिक विकृति है। इससे मेहर जैसी प्रगतिशील इस्लामी व्यवस्था कमजोर हुई है और महिलाओं का सशक्तिकरण प्रभावित हुआ है।

        सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक सोच स्पष्ट है—
महिला की गरिमा, समानता और संपत्ति अधिकार किसी भी सामाजिक या धार्मिक परंपरा से ऊपर हैं।

       जब तक समाज और कानून मिलकर इस विकृति को नहीं रोकते, तब तक विवाह संस्था महिलाओं के लिए सुरक्षा के बजाय बोझ बनी रहेगी।