डॉ. सोहेल मलिक बनाम भारत संघ एवं अन्य: कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न, तीसरे पक्ष की भूमिका और महिला कर्मियों के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट का मार्गदर्शक निर्णय
भूमिका
कार्यस्थल पर महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और समानता भारतीय संविधान के मूल मूल्यों में निहित हैं। इसके बावजूद, यौन उत्पीड़न की घटनाएँ आज भी विभिन्न क्षेत्रों में सामने आती रहती हैं। ऐसे मामलों में केवल अपराध का प्रश्न ही नहीं उठता, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि पीड़िता को न्याय पाने के लिए सही मंच कौन-सा है। डॉ. सोहेल मलिक बनाम भारत संघ एवं अन्य के मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इसी प्रश्न का उत्तर देते हुए यौन उत्पीड़न कानून की व्याख्या को अधिक व्यावहारिक, महिला-केन्द्रित और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप बनाया है।
इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी महिला के साथ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाता है जो उसके अपने संगठन का कर्मचारी नहीं है, तब भी वह महिला अपनी शिकायत अपने ही कार्यस्थल की आंतरिक शिकायत समिति (Internal Complaints Committee – ICC) के समक्ष दर्ज करा सकती है। यह फैसला महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
मामले की पृष्ठभूमि
डॉ. सोहेल मलिक बनाम भारत संघ एवं अन्य का मामला कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से संबंधित कानून, विशेष रूप से कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 (POSH Act) की व्याख्या से जुड़ा हुआ है। इस अधिनियम का उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षित कार्य वातावरण प्रदान करना और शिकायत निवारण की एक प्रभावी प्रणाली स्थापित करना है।
विवाद का मूल प्रश्न यह था कि यदि किसी महिला कर्मचारी का यौन उत्पीड़न किसी “तीसरे पक्ष” (जैसे—किसी अन्य संगठन के कर्मचारी, ठेकेदार, विज़िटर, ग्राहक या सहयोगी संस्था से जुड़े व्यक्ति) द्वारा किया जाता है, तो वह महिला अपनी शिकायत किस आईसीसी के समक्ष दर्ज कराए—अपने नियोक्ता की आईसीसी के सामने या उस तीसरे पक्ष के संगठन की आईसीसी के सामने, जिससे आरोपी संबंधित है।
कानूनी विवाद और मुख्य प्रश्न
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष मुख्य कानूनी प्रश्न यह था—
क्या कार्यस्थल पर किसी महिला के साथ यौन उत्पीड़न यदि उसके संगठन से बाहर के व्यक्ति द्वारा किया जाता है, तो क्या वह महिला अपनी शिकायत अपने ही कार्यस्थल की आंतरिक शिकायत समिति के समक्ष दर्ज करा सकती है?
यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि व्यवहारिक जीवन में महिलाओं को अकसर विभिन्न संगठनों, संस्थानों और बाहरी व्यक्तियों के साथ संपर्क में रहना पड़ता है। यदि कानून की व्याख्या संकीर्ण होती, तो पीड़िता को न्याय पाने के लिए अनावश्यक प्रक्रियात्मक बाधाओं का सामना करना पड़ता।
POSH अधिनियम की प्रासंगिक धाराएँ
इस मामले में न्यायालय ने POSH अधिनियम की कई महत्वपूर्ण धाराओं पर विचार किया, जिनमें प्रमुख हैं—
- धारा 2(o) – “कार्यस्थल” की परिभाषा
इसमें न केवल कार्यालय परिसर बल्कि यात्रा, सम्मेलन, प्रशिक्षण, और ऐसे सभी स्थान शामिल हैं जहाँ कार्य के दौरान महिला उपस्थित होती है। - धारा 4 – आंतरिक शिकायत समिति (ICC) का गठन
प्रत्येक नियोक्ता को अपने संगठन में आईसीसी गठित करना अनिवार्य है। - धारा 9 – शिकायत दर्ज करने का अधिकार
पीड़ित महिला को यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज करने का स्पष्ट अधिकार दिया गया है। - धारा 19 – नियोक्ता के कर्तव्य
नियोक्ता का दायित्व है कि वह कार्यस्थल पर सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करे, भले ही उत्पीड़न करने वाला व्यक्ति संगठन का कर्मचारी न हो।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में कानून की शाब्दिक व्याख्या के बजाय उद्देश्यपरक (purposive interpretation) दृष्टिकोण अपनाया। न्यायालय ने कहा कि POSH अधिनियम का मूल उद्देश्य महिलाओं को कार्यस्थल पर सुरक्षित, सम्मानजनक और भय-मुक्त वातावरण प्रदान करना है।
न्यायालय ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जोर दिया—
- महिला-केन्द्रित दृष्टिकोण
कानून की व्याख्या ऐसी होनी चाहिए जो पीड़िता को सशक्त बनाए, न कि उसे प्रक्रियात्मक उलझनों में फँसाए। - कार्यस्थल की व्यापक परिभाषा
कार्यस्थल केवल भौतिक कार्यालय तक सीमित नहीं है। जहाँ भी कार्य के सिलसिले में महिला जाती है, वहाँ उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उसके नियोक्ता की होती है। - तीसरे पक्ष द्वारा उत्पीड़न की स्थिति
यदि उत्पीड़न करने वाला व्यक्ति महिला के संगठन का हिस्सा नहीं है, तब भी यह नियोक्ता की जिम्मेदारी है कि वह शिकायत का संज्ञान ले और उचित कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू करे।
न्यायालय का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से निर्णय दिया कि—
जब किसी महिला को कार्यस्थल पर किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है जो उसके अपने संगठन का कर्मचारी नहीं है, तब भी वह महिला अपनी शिकायत अपने ही कार्यस्थल की आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) के समक्ष दर्ज करा सकती है।
न्यायालय ने यह भी कहा कि तीसरे पक्ष के प्रतिष्ठान की आईसीसी के समक्ष शिकायत दर्ज कराना अनिवार्य नहीं है और न ही यह पीड़िता पर थोपा जा सकता है।
निर्णय का संवैधानिक आधार
इस फैसले का आधार केवल POSH अधिनियम ही नहीं, बल्कि भारतीय संविधान के मूल अधिकार भी हैं—
- अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार
महिलाओं को समान संरक्षण और समान कानूनी उपचार मिलना चाहिए। - अनुच्छेद 15 – लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध
महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव असंवैधानिक है। - अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार, जिसमें सुरक्षित कार्यस्थल भी शामिल है।
व्यावहारिक महत्व और प्रभाव
इस निर्णय के दूरगामी प्रभाव हैं—
- महिलाओं के लिए शिकायत प्रक्रिया सरल
अब पीड़िता को यह चिंता नहीं करनी होगी कि आरोपी किस संगठन से जुड़ा है। - नियोक्ताओं की जिम्मेदारी बढ़ी
नियोक्ता अब तीसरे पक्ष के मामलों में भी हाथ झाड़कर नहीं बैठ सकते। - POSH कानून की प्रभावशीलता में वृद्धि
कानून का उद्देश्य केवल कागज़ी न रहकर वास्तविक सुरक्षा प्रदान करना बनता है। - कार्यस्थल संस्कृति में सुधार
यह फैसला संगठनों को अधिक संवेदनशील और उत्तरदायी बनने के लिए प्रेरित करता है।
पूर्ववर्ती न्यायिक दृष्टांतों से सामंजस्य
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997) के ऐतिहासिक फैसले की भावना के अनुरूप है, जिसमें पहली बार कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना गया था। डॉ. सोहेल मलिक का निर्णय उसी संवैधानिक परंपरा को आगे बढ़ाता है।
आलोचनात्मक दृष्टि
हालाँकि यह निर्णय महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की दिशा में अत्यंत सराहनीय है, फिर भी इसकी प्रभावी क्रियान्वयन के लिए—
- आईसीसी सदस्यों को उचित प्रशिक्षण देना
- शिकायतों की समयबद्ध जांच सुनिश्चित करना
- नियोक्ताओं द्वारा निष्पक्षता बनाए रखना
जैसे पहलुओं पर विशेष ध्यान देना आवश्यक होगा।
निष्कर्ष
डॉ. सोहेल मलिक बनाम भारत संघ एवं अन्य का निर्णय भारतीय श्रम और सेवा कानून के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह न केवल POSH अधिनियम की व्याख्या को स्पष्ट करता है, बल्कि महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों को मजबूत आधार भी प्रदान करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि कानून का उद्देश्य महिलाओं को न्याय दिलाना है, न कि उन्हें प्रक्रियात्मक जटिलताओं में उलझाना। यह फैसला एक सुरक्षित, समान और गरिमापूर्ण कार्यस्थल की दिशा में एक मजबूत कदम है, जो आने वाले समय में महिला सशक्तिकरण और न्यायिक संवेदनशीलता का मार्ग प्रशस्त करेगा।