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“डाक की सूचना से तलाक नहीं होता” — Jyotsna v. Shailendra में समन की वैध सेवा, एकतरफ़ा तलाक और न्याय तक पहुँच पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

“डाक की सूचना से तलाक नहीं होता” — Jyotsna v. Shailendra में समन की वैध सेवा, एकतरफ़ा तलाक और न्याय तक पहुँच पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

(S.L.P. (Civ.) No. 21696 of 2025 | निर्णय दिनांक: 15 दिसंबर 2025)


प्रस्तावना

      भारतीय न्याय व्यवस्था में समन (Summons) की विधिवत सेवा केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि न्याय, प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) और न्याय तक पहुँच (Access to Justice) का मूल आधार है। यदि किसी पक्ष को यह ही पता न हो कि उसके विरुद्ध कोई मुकदमा चल रहा है, तो उसके अधिकारों की रक्षा कैसे होगी?

      इसी बुनियादी प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट ने Jyotsna v. Shailendra मामले में 15 दिसंबर 2025 को एक दूरगामी और मानवीय दृष्टिकोण वाला निर्णय दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

“मात्र डाक की सूचना या अधूरी तामील के आधार पर किसी महिला के विरुद्ध एकतरफ़ा तलाक का डिक्री टिकाऊ नहीं हो सकता।”

     यह फैसला न केवल सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की व्याख्या करता है, बल्कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अंतर्गत वैवाहिक विवादों में न्यायिक संवेदनशीलता की नई कसौटी भी स्थापित करता है।


मामले की पृष्ठभूमि

     पति शैलेन्द्र ने पत्नी ज्योत्सना के विरुद्ध हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के अंतर्गत तलाक की याचिका दायर की। निचली अदालत ने पत्नी की अनुपस्थिति में एकतरफ़ा (Ex-parte) तलाक डिक्री पारित कर दी।

पत्नी को जब इस डिक्री की जानकारी हुई, तो उसने—

  • Order IX Rule 13 CPC के तहत एकतरफ़ा डिक्री को निरस्त करने का आवेदन किया
  • साथ ही देरी के लिए Limitation Act, 1963 की धारा 5 के अंतर्गत देरी माफी (Condonation of Delay) का आवेदन प्रस्तुत किया

पत्नी का मुख्य तर्क था कि—

  • उसे कभी भी मुकदमे की वास्तविक जानकारी नहीं थी
  • समन की विधिवत सेवा नहीं हुई
  • वह कार्यवाही से पूर्णतः अनभिज्ञ (Bona fide ignorance) थी

निचली अदालत और उच्च न्यायालय ने देरी अधिक होने का हवाला देकर उसका आवेदन खारिज कर दिया।
इसके विरुद्ध मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।


मुख्य विधिक प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष निम्नलिखित महत्वपूर्ण प्रश्न थे—

  1. क्या Registered Post पर “On giving information, not received” का endorsement, Order V Rule 17 CPC के अंतर्गत वैध सेवा माना जा सकता है?
  2. क्या बिना सेवक (Bailiff) के हलफनामे या उसके परीक्षण के समन की सेवा वैध कही जा सकती है?
  3. क्या Order IX Rule 13 CPC के तहत देरी माफी में देरी की अवधि अधिक महत्वपूर्ण है या देरी का कारण?
  4. क्या वास्तविक और bona fide अज्ञानता, देरी माफी के लिए पर्याप्त कारण (Sufficient Cause) हो सकती है?

Order V Rule 17 और 19 CPC की व्याख्या

Order V Rule 17 CPC

यदि प्रतिवादी समन लेने से मना करता है या उपलब्ध नहीं है, तो—

  • सेवक को यह दर्शाना होगा कि उसने किस प्रकार सेवा का प्रयास किया
  • घर के किसी वयस्क सदस्य को समन सौंपा गया या चस्पा किया गया
  • पूरी प्रक्रिया का विवरण स्पष्ट होना चाहिए

Order V Rule 19 CPC

अदालत तब तक सेवा को वैध नहीं मानेगी जब तक—

  • सेवक का हलफनामा (Affidavit) दाखिल न हो
  • या सेवक को परीक्षण (Examination) हेतु अदालत में न बुलाया जाए

सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष

इस मामले में—

  • न तो सेवक का हलफनामा था
  • न ही उसे अदालत में परखा गया
  • Bailiff की रिपोर्ट पर कोई विचार नहीं किया गया

इसलिए सेवा अवैध (Invalid Service) मानी गई।


डाक की सूचना ≠ वैध सेवा

कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा—

“Registered Post पर केवल यह लिख दिया जाना कि ‘सूचना दी गई, पर प्राप्त नहीं किया गया’ — यह स्वयं में वैध सेवा नहीं है।”

यह टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि—

  • कई मामलों में एकतरफ़ा डिक्री केवल डाक रिपोर्ट के आधार पर पारित कर दी जाती है
  • इससे विशेषकर महिलाओं के वैवाहिक अधिकार गंभीर रूप से प्रभावित होते हैं

Order IX Rule 13 CPC और देरी माफी

कानूनी सिद्धांत

Order IX Rule 13 के अंतर्गत—

  • यदि प्रतिवादी यह सिद्ध कर दे कि
    • उसे समन विधिवत सेवा नहीं हुआ
    • या वह पर्याप्त कारण से उपस्थित नहीं हो सका
      तो अदालत को एकतरफ़ा डिक्री निरस्त करनी चाहिए।

Limitation Act की धारा 5

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया—

“देरी की अवधि नहीं, बल्कि देरी का कारण निर्णायक होता है।”

यदि—

  • कारण वास्तविक है
  • अज्ञानता bona fide है
  • कोई दुर्भावना नहीं है

तो लंबी देरी भी माफ की जानी चाहिए


निचली अदालतों की त्रुटि

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि—

  • निचली अदालतों ने केवल देरी की अवधि देखी
  • समन की वैधता की जाँच नहीं की
  • Bailiff की रिपोर्ट को नज़रअंदाज़ किया

 यह दृष्टिकोण कानून और न्याय दोनों के विरुद्ध है।


महिला अधिकार और वैवाहिक न्याय

यह निर्णय विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि—

  • वैवाहिक मुकदमों में महिलाएँ अक्सर
    • आर्थिक
    • सामाजिक
    • भौगोलिक कारणों से
      अदालत से दूर रहती हैं

कोर्ट ने कहा—

“तलाक जैसे गंभीर मामलों में प्रक्रिया की कठोरता नहीं, बल्कि न्याय की संवेदनशीलता प्राथमिक होनी चाहिए।”


सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय

✔️ impugned आदेश अस्थिर (Unsustainable) घोषित
✔️ देरी माफ की गई
✔️ एकतरफ़ा तलाक डिक्री निरस्त
✔️ पत्नी को मुकदमे में सुनवाई का अवसर
✔️ अपील स्वीकार


निर्णय का व्यापक प्रभाव

 1. समन सेवा पर सख़्ती

अब अदालतें बिना ठोस प्रमाण के सेवा को वैध नहीं मानेंगी।

 2. Ex-parte तलाक पर रोक

महज तकनीकी आधार पर तलाक पाना आसान नहीं रहेगा।

 3. देरी माफी में मानवीय दृष्टिकोण

लंबी देरी ≠ स्वतः अस्वीकृति।

 4. महिला न्याय की मजबूती

यह फैसला वैवाहिक न्यायशास्त्र में एक मानवीय मील का पत्थर है।


निष्कर्ष

Jyotsna v. Shailendra का यह निर्णय हमें याद दिलाता है कि—

न्याय केवल आदेश नहीं, अवसर भी है।
और अवसर बिना सूचना के संभव नहीं।

यह फैसला प्रक्रिया को इंसानियत से जोड़ता है और स्पष्ट करता है कि—

  • डाक की सूचना से मुकदमा नहीं चलता
  • अज्ञानता में छीने गए अधिकार न्यायालय लौटा सकता है

भारतीय न्यायपालिका का यह रुख न्याय, समानता और गरिमा के संवैधानिक मूल्यों को और सुदृढ़ करता है।