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टी. धन्या बनाम राज्य तमिलनाडु एवं अन्य तकनीकी खामी बनाम शिक्षा का अधिकार: NEET-UG प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक हस्तक्षेप

टी. धन्या बनाम राज्य तमिलनाडु एवं अन्य तकनीकी खामी बनाम शिक्षा का अधिकार: NEET-UG प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक हस्तक्षेप

प्रस्तावना

       भारत में मेडिकल शिक्षा में प्रवेश का रास्ता NEET-UG जैसी अत्यंत प्रतिस्पर्धी परीक्षा से होकर गुजरता है। लाखों छात्र-छात्राएँ वर्षों की मेहनत, मानसिक दबाव और आर्थिक संसाधनों के साथ इस परीक्षा में बैठते हैं। ऐसे में यदि किसी छात्र का MBBS में चयन हो जाने के बाद तकनीकी खामी या प्रणालीगत विफलता के कारण प्रवेश रद्द हो जाए, तो यह न केवल व्यक्तिगत अन्याय होता है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।

       ऐसे ही एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने टी. धन्या बनाम राज्य तमिलनाडु एवं अन्य में तीन NEET-UG अभ्यर्थियों को बड़ी राहत देते हुए उनके MBBS प्रवेश को बहाल किया। यह फैसला केवल तीन छात्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह डिजिटल गवर्नेंस, प्रशासनिक जवाबदेही और शिक्षा के अधिकार से जुड़े व्यापक सिद्धांतों को स्थापित करता है।


मामले की पृष्ठभूमि

    तमिलनाडु की तीन छात्राएँ—जिनमें प्रमुख याचिकाकर्ता टी. धन्या थीं—ने NEET-UG परीक्षा उत्तीर्ण कर राज्य कोटे के अंतर्गत MBBS सीट प्राप्त की थी। काउंसलिंग प्रक्रिया के दौरान उन्हें आवंटित कॉलेज में निर्धारित समय-सीमा के भीतर शुल्क (fee) जमा करना अनिवार्य था

      याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने शुल्क भुगतान का प्रयास समय रहते किया, किंतु ऑनलाइन पोर्टल में तकनीकी खराबी (technical glitch) के कारण भुगतान सफल नहीं हो सका। इसके बावजूद, समय-सीमा समाप्त होने के आधार पर उनका प्रवेश रद्द कर दिया गया और सीटें अन्य उम्मीदवारों को दे दी गईं।


मुख्य कानूनी प्रश्न (Issues for Consideration)

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष निम्नलिखित महत्वपूर्ण प्रश्न उठे:

  1. क्या तकनीकी खामी के कारण शुल्क जमा न हो पाने पर छात्र को दंडित किया जा सकता है?
  2. क्या प्रवेश प्रक्रिया में ‘समय-सीमा’ का कठोर पालन, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से ऊपर है?
  3. क्या राज्य और काउंसलिंग प्राधिकरण की यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे डिजिटल प्रणाली की विफलताओं का समाधान करें?
  4. क्या शिक्षा के अधिकार (Article 21 के अंतर्गत) का उल्लंघन हुआ है?

याचिकाकर्ताओं की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से यह तर्क रखा गया कि—

  • उन्होंने समय रहते शुल्क भुगतान का ईमानदार प्रयास किया था।
  • भुगतान विफल होना उनकी गलती नहीं, बल्कि प्रणालीगत त्रुटि का परिणाम था।
  • उन्होंने संबंधित अधिकारियों को ई-मेल और अन्य माध्यमों से समस्या की जानकारी भी दी थी।
  • प्रवेश रद्द करना अनुपातहीन (disproportionate) और मनमाना (arbitrary) कदम है।
  • इससे उनके शैक्षणिक भविष्य पर अपूरणीय क्षति (irreparable harm) हुई।

राज्य सरकार एवं प्राधिकरण की दलीलें

राज्य तमिलनाडु और काउंसलिंग प्राधिकरण की ओर से यह कहा गया कि—

  • प्रवेश प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन और समयबद्ध है।
  • सभी उम्मीदवारों को समान अवसर दिया गया था।
  • यदि समय-सीमा में शुल्क जमा नहीं हुआ, तो सीट स्वतः निरस्त हो जाती है।
  • प्रक्रिया में ढील देने से अन्य उम्मीदवारों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों पर गंभीरता से विचार किया और स्पष्ट शब्दों में कहा कि—

1. तकनीकी खामी का भार छात्र पर नहीं डाला जा सकता

न्यायालय ने माना कि जब कोई छात्र समय रहते भुगतान का प्रयास करता है और विफलता तकनीकी कारणों से होती है, तो उसका दुष्परिणाम छात्र पर नहीं थोपा जा सकता।
डिजिटल युग में प्रशासन को यह स्वीकार करना होगा कि तकनीकी प्रणालियाँ त्रुटिरहित नहीं होतीं


2. प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन

कोर्ट ने कहा कि बिना यह जांच किए कि भुगतान क्यों विफल हुआ, सीधे प्रवेश रद्द करना प्राकृतिक न्याय (Principles of Natural Justice) के विरुद्ध है।
छात्रों को सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए था।


3. शिक्षा का अधिकार और अनुच्छेद 21

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि शिक्षा का अधिकार, विशेषकर उच्च शिक्षा में निष्पक्ष अवसर, अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।
प्रशासनिक लापरवाही या तकनीकी विफलता से इस अधिकार का हनन नहीं किया जा सकता।


4. प्रशासनिक जवाबदेही (Administrative Accountability)

कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि जब राज्य डिजिटल माध्यमों का उपयोग करता है, तो उसकी यह कर्तव्यपरक जिम्मेदारी बनती है कि प्रणाली सुचारु रूप से कार्य करे और विफलता की स्थिति में वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हों।


सुप्रीम कोर्ट का निर्णय (Judgment)

इन सभी तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने—

  • तीनों NEET-UG अभ्यर्थियों को तत्काल राहत प्रदान की।
  • उनके MBBS प्रवेश को बहाल करने का निर्देश दिया।
  • संबंधित कॉलेजों और राज्य प्राधिकरणों को आदेश दिया कि वे आवश्यक प्रशासनिक कदम उठाएँ।
  • यह भी स्पष्ट किया कि यह राहत असाधारण परिस्थितियों में दी गई है, जहाँ छात्रों की कोई गलती नहीं थी।

फैसले का महत्व (Significance of the Judgment)

1. छात्रों के अधिकारों की रक्षा

यह फैसला उन हजारों छात्रों के लिए आशा की किरण है, जो डिजिटल प्रक्रियाओं की खामियों के शिकार होते हैं।

2. डिजिटल गवर्नेंस पर दिशा-निर्देश

न्यायालय ने अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत दिया कि ऑनलाइन सिस्टम के साथ मानवीय दृष्टिकोण आवश्यक है।

3. मेडिकल प्रवेश प्रक्रिया में सुधार

यह निर्णय भविष्य में NEET काउंसलिंग और अन्य राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश प्रक्रियाओं में लचीलापन और पारदर्शिता लाने की दिशा में मील का पत्थर है।

4. न्यायिक सक्रियता का उदाहरण

सुप्रीम कोर्ट ने दिखाया कि वह केवल नियमों का यांत्रिक पालन नहीं करता, बल्कि न्याय, समानता और विवेक को सर्वोपरि रखता है।


आलोचनात्मक दृष्टि

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि—

  • इस प्रकार की राहत से समय-सीमा की पवित्रता कमजोर हो सकती है।
  • अन्य उम्मीदवार भी भविष्य में तकनीकी कारणों का हवाला देकर राहत माँग सकते हैं।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला तथ्य-विशेष पर आधारित है और इसे सामान्य छूट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।


निष्कर्ष

       टी. धन्या बनाम राज्य तमिलनाडु एवं अन्य का यह निर्णय भारतीय शिक्षा कानून और प्रशासनिक न्यायशास्त्र में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ता है। यह फैसला बताता है कि—

“प्रणाली मनुष्य के लिए है, मनुष्य प्रणाली के लिए नहीं।”

     जब तकनीक और कानून आमने-सामने हों, तो न्यायालय का कर्तव्य है कि वह मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए अधिकारों की रक्षा करे।
यह निर्णय न केवल तीन छात्रों के भविष्य को सुरक्षित करता है, बल्कि पूरे देश में प्रवेश प्रक्रियाओं को अधिक न्यायपूर्ण, संवेदनशील और उत्तरदायी बनाने का संदेश देता है।