“जमानत का दुरुपयोग न्याय पर सीधा हमला है” — गवाह की हत्या के आरोपी को जमानत देने वाला आदेश रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट का सख़्त संदेश
मामले का नाम
लक्ष्मणन बनाम राज्य, पुलिस उपाधीक्षक एवं अन्य के माध्यम से
प्रस्तावना
भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में जमानत (Bail) को सामान्य नियम और कारावास को अपवाद माना जाता है। किंतु यह सिद्धांत तब कठोर हो जाता है जब आरोपी जमानत का दुरुपयोग करे, गवाहों को डराए या न्यायिक प्रक्रिया को ही निष्प्रभावी करने का प्रयास करे।
इसी संवेदनशील प्रश्न पर Supreme Court of India ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कड़ा निर्णय देते हुए, गवाह की हत्या के आरोपी को जमानत देने वाले आदेश को “स्पष्ट रूप से अनुचित, मनमाना और विवेकहीन” करार देते हुए रद्द कर दिया।
यह फैसला न केवल जमानत के सिद्धांत को पुनः परिभाषित करता है, बल्कि एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के मामलों में न्यायालयों की विशेष जिम्मेदारी को भी रेखांकित करता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 24 फरवरी 2020 की एक गंभीर घटना से जुड़ा है, जब दो अनुसूचित जाति के व्यक्तियों पर घातक हथियारों से लैस एक गैरकानूनी भीड़ ने हमला किया। इस हमले की गंभीरता को देखते हुए निम्न धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई—
- IPC की धारा 147, 148 (दंगा)
- IPC की धारा 307 (हत्या का प्रयास)
- IPC की धारा 324, 323 (चोट पहुँचाना)
- SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(2)(va)
आरोपियों को सितंबर 2020 में जमानत मिल गई। यहीं से न्यायिक विवेक की परीक्षा शुरू होती है।
जमानत का दुरुपयोग और गवाह की हत्या
जमानत पर रहते हुए, चार आरोपियों ने एक प्रमुख गवाह की हत्या कर दी। यह घटना न्यायिक प्रक्रिया के लिए एक खुली चुनौती थी।
इस हत्या के बाद:
- IPC की धारा 302 (हत्या) के तहत दूसरी एफआईआर दर्ज हुई
- मार्च 2023 में Madras High Court की मदुरै बेंच ने जमानत रद्द की
- आरोपियों ने आत्मसमर्पण किया
यह स्थिति स्पष्ट रूप से दर्शाती थी कि आरोपी न्याय में बाधा डालने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।
मद्रास हाईकोर्ट का विवादित आदेश
इसके बावजूद, मदुरै बेंच ने:
- पहले मामले में नवीन जमानत दे दी
- हत्या के प्रयास और हत्या—दोनों मामलों की संयुक्त सुनवाई का निर्देश दिया
इस आदेश ने पीड़ित पक्ष को स्तब्ध कर दिया। एक जीवित पीड़ित ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और तर्क दिया कि:
- उसकी आपत्तियों पर समुचित विचार नहीं हुआ
- यह SC/ST Act की धारा 15A(5) का उल्लंघन है, जो पीड़ित को जमानत कार्यवाही में सुने जाने का अधिकार देती है
पीड़ित को सुने जाने का अधिकार: धारा 15A(5)
सुप्रीम कोर्ट ने इस बिंदु पर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक स्पष्टता दी—
- धारा 15A(5) पीड़ित को सुने जाने का अधिकार देती है
- यह अनुकूल निर्णय की गारंटी नहीं है
- रिकॉर्ड से स्पष्ट था कि पीड़ित की आपत्तियाँ दर्ज की गई थीं
अतः, तकनीकी रूप से प्रक्रियात्मक उल्लंघन नहीं पाया गया।
लेकिन मामला यहीं समाप्त नहीं हुआ।
जमानत आदेश क्यों ‘स्पष्ट रूप से अनुचित’ ठहराया गया?
हालाँकि धारा 15A(5) का तर्क स्वीकार नहीं किया गया, फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने मौलिक और ठोस आधारों पर जमानत आदेश को रद्द कर दिया। न्यायालय ने पाया कि उच्च न्यायालय—
1. पूर्व जमानत दुरुपयोग की अनदेखी
- यह तथ्य नज़रअंदाज़ किया गया कि
- आरोपी पहले जमानत पर था
- उसी अवधि में प्रमुख गवाह की हत्या हुई
- जमानत पहले ही इसी कारण रद्द हो चुकी थी
2. अपराधों की गंभीरता का सही आकलन नहीं
- IPC 307 और SC/ST Act के तहत अपराध
- सामाजिक संरचना और सामूहिक शांति पर गहरा प्रभाव
3. गवाहों को धमकाने और न्याय में बाधा
- गवाह की हत्या स्वयं इस खतरे का सबसे ठोस प्रमाण है
- भविष्य में भी मुकदमे को प्रभावित करने की प्रबल संभावना
4. अप्रासंगिक कारणों पर भरोसा
- लंबित नागरिक विवादों जैसे पहलुओं को आधार बनाना
- जिनका जमानत से कोई सीधा संबंध नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा—
“केवल आपराधिक इतिहास दर्ज कर देना, बिना यह परखे कि आरोपी मुकदमे में हस्तक्षेप करेगा या अपराध दोहराएगा—यह न्यायिक विवेक का प्रयोग नहीं, बल्कि उसका अभाव है।”
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश
न्यायालय ने आदेश दिया—
- उच्च न्यायालय का जमानत आदेश रद्द
- अभियुक्त को दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश
- यह स्पष्ट किया गया कि
- जमानत यांत्रिक रूप से नहीं दी जा सकती
- विशेषकर तब, जब
- पूर्व दुरुपयोग हो
- गवाहों की सुरक्षा खतरे में हो
- मुकदमे की निष्पक्षता प्रभावित होने की आशंका हो
निष्कर्ष: जमानत, अधिकार नहीं—जिम्मेदारी के साथ दिया जाने वाला विवेक
यह निर्णय भारतीय आपराधिक न्यायशास्त्र में एक मजबूत नज़ीर है। यह स्पष्ट करता है कि—
- जमानत न्यायिक विवेकाधिकार है, स्वचालित अधिकार नहीं
- SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के मामलों में
- सामाजिक संदर्भ
- पीड़ित की सुरक्षा
- गवाहों की स्वतंत्रता
को सर्वोपरि रखा जाना चाहिए
- जमानत का दुरुपयोग न्याय व्यवस्था पर हमला है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता